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May 10
आज क्यों याद आ रहे हैं शेषन?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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--- क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi

 इस कालम के लिखे जाने के बाद कई और बातें हुईं, जिनकी चर्चा ज़रूरी लगती है. चुनाव आयुक्त एच. एस. ब्रह्मा का इंटरव्यू आया. उन्होंने कहा कि बनारस के बेनियाबाग़ में बीजेपी को रैली की अनुमति न देने के मामले में ज़िलाधिकारी और बीजेपी के बीच संवादहीनता रही और चुनाव आयोग भी इस मुद्दे को सही ढंग से नहीं निबटा सका. आयोग ने बीजेपी के लगातार दबाव के बावजूद ज़िलाधिकारी को हटाया तो नहीं, लेकिन बनारस के लिए एक विशेष पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिया है. ब्रह्मा ने यह भी कहा कि आयोग को थोड़ा दबंग रुख़ अपनाते हुए काम करना चाहिए, ताकि इसकी छवि न बिगड़े. ठीक यही निष्कर्ष इस स्तम्भकार का भी है. उधर, अरुण जेटली ने अपने ब्लाग में लिखा है कि चुनाव आयोग की आलोचना क्यों नहीं की जा सकती. इस स्तम्भकार का मानना है कि चुनाव आयोग या किसी भी सांविधानिक संस्था के काम की आलोचना और समीक्षा में कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन आलोचना करने और राजनीति प्रेरित आरोप लगाने में बहुत अन्तर है. आयोग का फ़ैसला ग़लत है, तो आलोचना कीजिए, विरोध जताइए, लेकिन आयोग को धमकाना, चुनौती देना और अवमानना करना कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता. इस बीच, शनिवार को बीजेपी ने आपत्ति की राहुल गाँधी को उसी इलाक़े में रोड शो की इजाज़त क्यों दे दी गयी, जहाँ बीजेपी को रैली नहीं करने दी गयी थी. तथ्य यह है कि रोड शो मुख्य सड़क से गुज़रा है, लेकिन रैली जिस मैदान में होती, वह चारों ओर से घनी आबादी और सँकरी गलियों से घिरा है. वैसे, बीजेपी ख़ुद बिना किसी अनुमति के नमो का 'अघोषित' रोड शो कर चुनाव आयोग को मुँह चिढ़ा चुकी है! इस कालम को इन्हीं सन्दर्भों में देखें.

बीतेगा भई बीतेगा, चौदह का चुनाव बीतेगा! बस दो दिन की बात और है. बनारस raagdesh आज क्यों याद आ रहे हैं शेषन!का आख़िरी घमासान निबटे, बना रहे बनारस और छुट्टी मिले इस आगबबूले चुनाव से! इतना दहकता, तपता, चुभता, दुखता चुनाव तो पहले कभी हुआ नहीं था. क्या भाषा, क्या मुहावरे, क्या अंगारे, इतनी आग किसको जलाने के लिए? जनता के ही दिल जले, जनता के ही मन बरगलाये, काँटे तो जहाँ चुभने थे, चुभ गये! वोट आप ले गये, चोट जनता के हिस्से आयी! और भी चोट कहाँ-कहाँ आयी? कुछ पता है? चुनाव आयोग का साइनबोर्ड देख कर शेषन बरबस याद आते रहे! क्या सीमाएँ, क्या मर्यादाएँ, किसने नहीं तोड़ीं? चुनाव आयोग दबा तो नहीं, झुका भी नहीं, कहीं नरम भी नहीं पड़ा, फिर भी जाने क्यों बार-बार लगता रहा कि उसका वैसा ख़ौफ़ रहा नहीं. जाने क्यों गाहे-बगाहे टी. एन. शेषन याद आते रहे! गम्भीर सवाल है. चुनाव हो रहे हों और राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव आयोग को भी एक पार्टी बना लें! कोई कुछ भी कह कर निकल जाये? कोई ताल ठोक कर धमकाता फिरे? कोई जानबूझकर 'मासूम' ग़लतियाँ करता रहे? कोई हँसी उड़ाये? और सबको पता हो कि अब क्या होगा? आयोग एक नोटिस जारी करेगा. जवाब नहीं आयेगा. फिर एक 'कड़ी' नोटिस' जारी करेगा. तब कोई गोलमोल-सा जवाब चला जायेगा, खेद-वेद जैसा कुछ लिख दिया जायेगा, फ़ाइल में लग जायेगा. बस! अगली बार, फिर कहीं से कोई और वार! और फिर वही नोटिस-वोटिस! अब बताइए,जो देश का क़ानून मंत्री रहा हो, वह चुनाव आयोग की खिल्ली उड़ाये कि उसकी आचार संहिता को मानें तो चुनाव हारना बिलकुल तय है, जीतने का सवाल ही नहीं उठता? तो मंत्री महोदय, यह आचार संहिता आप लोगों को ऐन चुनाव के वक़्त ही क्यों याद आती है? और उसी चुनाव के वक़्त क्यों याद आती है, जब आपकी हालत ज़रा 'पतली' हो! यह आचार संहिता कोई चार-छह महीने पहले तो बनी नहीं है! बरसों पहले से है. और इसी आचार संहिता के तहत आपकी पार्टी ने दो-दो बार चुनाव जीत कर पिछले दस साल तक सत्ता सुख भोगा! आप कहते हैं कि इस आचार संहिता का पालन कर चुनाव जीता ही नहीं जा सकता! ठीक! तो आपने मान लिया कि पिछले दो चुनावों में आपकी पार्टी के सभी जीते उम्मीदवारों ने आचार संहिता का पालन नहीं किया था? पालन किया होता तो वे हार ही गये होते! शेषन होते तो आपकी हिम्मत ऐसी बात कह पाने की होती? आपने माफ़ी माँग ली और सस्ते में छूट गये! और एक मुख्यमंत्री हैं. बड़ी ममतामयी दीदी हैं. उन्होंने भी चुनाव आयोग को ख़ूब दादागीरी दिखायी. चुनौती दी कि गिरफ़्तार कर लो, हम तो अफ़सरों के तबादले नहीं करेंगे. जब आयोग ने कस कर आँखें तरेरी, तब जा कर मानीं! ठीक है कि दीदी के दिमाग़ बाद में ठिकाने आ गये. लेकिन सवाल वही कि कोई मुख्यमंत्री भला कैसे चुनाव आयोग के काम में अड़ंगा डाल सकता है? उस पर राजनीतिक पक्षधरता के बेबुनियाद आरोप लगा सकता है? 2009 में ऐसे ही उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी चुनाव के ठीक पहले अफ़सरों के तबादले को लेकर आयोग पर ऐसे ही भड़की थीं. लेकिन आयोग ने सारी ऐंठन निकाल दी! और अभी प्रधानमंत्री पद के एक दावेदार महोदय को कई बार आयोग की मंशा के पीछे राजनीति नज़र आयी! आप मतदान के दिन मतदान केन्द्र के बाहर टीवी कैमरों पर अपना चुनाव निशान झमक-झमक कर चमकाते हैं, आपके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हो तो धमकाते हैं कि हिम्मत हो तो चुनाव आयोग गिरफ़्तार करके दिखाये! फिर बनारस में आप जिस अति संवेदनशील जगह पर रैली करना चाहते हैं, वहाँ की इजाज़त नहीं मिली तो उस पर भी राजनीतिक पैंतरे भाँजते हैं, चुनाव आयोग पर 'निष्पक्ष' न होने का आरोप जड़ देते हैं! जो प्रधानमंत्री की कुर्सी का दावेदार हो और घूम-घूम कर कह रहा हो कि तमाम सांविधानिक संस्थाओं को वह मज़बूत करेगा, कितना अजीब है कि वह ख़ुद उन पर हमले करे! क्या मज़बूती का मतलब यह है कि आप जो कहें, वह वही बोली बोलें, तब तो मज़बूत, दूसरों पर चाबुक चलाये, तब तो मज़बूत, आप के कान उमेठे तो वह राजनीति है साहेब! अचानक फिर शेषन याद आ गये! अगर शेषन होते तो 'साहेब' से टक्कर का क्या नज़ारा होता? और पता नहीं टक्कर की होती भी या नहीं? शेषन से कोई मुसीबत मोल लेता भी या नहीं? वैसे, आपको याद दिला दें कि इन्हीं नमो जी ने 2002 में मुख्य चुनाव आयुक्त लिंगदोह के ईसाई मूल को लेकर आपत्तिजनक जुमलेबाज़ी की थी! यानी आदत पुरानी है! क्या सांविधानिक संस्थाएँ ऐसे ही मज़बूत होती हैं! बात समझ में नहीं आयी! और राहुल गाँधी जी की 'मासूमियत' भी कुछ समझ में नहीं आयी? पोलिंग बूथ पर जा कर एक-एक ईवीएम 'देखने' का मतलब? इतनी बड़ी और इतनी पुरानी एक राष्ट्रीय पार्टी के 'सर्वेसर्वा' उपाध्यक्ष को क्या पता नहीं कि जो ख़ुद मतदाता नहीं, वह वहाँ नहीं जा सकता! अगर इतनी छोटी-सी और रोज़मर्रा की बात भी नहीं पता, तो सचमुच बड़ी अजीब बात है! और अगर पता है तो फिर यह वही है, यानी ठेंगे पर चुनाव आयोग! हम तो उन ठेंगों की बात ही नहीं कर रहे हैं, जो अमित शाह, आज़म खाँ, बेनीप्रसाद वर्मा जैसों ने दिखाया! वे तो ठेंगा इसीलिए दिखा पाने की जुर्रत कर रहे हैं कि उनके 'बिग बास' ख़ुद वही कर रहे हैं! पार्टियाँ कोई भी हों, नेता कोई भी हों, सबके सब एक जैसी घटिया राजनीति के दाग़ी, सबके सब चार वोटों के लालच में लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डालने पिले पड़ रहे हैं! हैरानी होती है! इक्कीसवीं सदी के भारत में आज क़रीब तीन-चौथाई लोग साक्षर हैं. ये पढ़े-लिखे हैं. इसलिए कोई ऐसी मर्यादा नहीं जिसे तोड़ने से ये डरें? देश जाय भाड़ में! एक ज़माना वह था, जब तीन-चौथाई लोग निरक्षर हुआ करते थे. फिर भी उन्हें मालूम था कि मर्यादाएँ इसलिए होती हैं कि उन्हें लाँघा न जाये! कौन बड़ा? जो पढ़ा या जिसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर? इसीलिए आज शेषन याद आ रहे हैं. मतलब! चाहिए एक दबंग चुनाव आयोग! नियम सारे वही हैं, क़ायदे-क़ानून, आचार संहिता भी वही है, चुनाव आयोग भी बिलकुल ठीक से काम कर रहा है, अपने काम में कड़क भी है, साफ़-सुथरे चुनाव भी हो रहे हैं, सारी दुनिया में उसकी ज़बर्दस्त साख है, तमाम दूसरे देश यहाँ के चुनाव आयोग से सीख-समझ भी रहे हैं, लेकिन शायद हमारा चुनाव आयोग इधर कुछ ज़्यादा ही शरीफ़ हो गया है! उसकी धाक ज़रूर कुछ कम हुई है. ज़रूरी यह है कि चाहे वह चाबुक मारे या न मारे, लेकिन चाबुक फटकारे ख़ूब, वरना तो आगे बेचारी राजनीति के अच्छे दिन आने से रहे! राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं से सुधरने की उम्मीद करना तो बेवक़ूफ़ी ही होगी. अगर कहीं उम्मीद की जा सकती है तो वह ख़ुद इन्हीं सांविधानिक संस्थाओं से कि वे अपने को ऐसा धाकड़ बना कर रखें कि बड़े-बड़े दबंग भी उनके सामने दुबके रहें! (लोकमत समाचार, 10 मई 2004)              
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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