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Nov 21
आइएसआइएस और औंधी सुरंगें!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 12 

आइएसआइएस दुनिया को 'इसलामी ख़िलाफ़त' बनाना चाहता है. लेकिन वह ख़ुद दुनिया के ज़्यादातर मुसलमानों के ख़िलाफ़ है! क्योंकि वह उन्हें मुसलमान मानने को ही तैयार नहीं! और दुनिया के ज़्यादातर मुसलमान आइएसआइएस को ही इसलाम के ख़िलाफ़ मानते हैं! आइएसआइएस के क़त्लेआम को, तमाम हैवानी अत्याचारों को, यज़ीदी महिलाओं को यौन-दासियाँ बनाने को और इसलाम की उसकी मनगढ़न्त व्याख्याओं को दुनिया के ज़्यादातर मुसलमान 'ग़ैर-इसलामी' मानते हैं!


isis-threat
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ख़िलाफ़त और ख़िलाफ़! लोग अकसर इन्हें एक ही समझ लेते हैं! यही कि ख़िलाफ़ से ख़िलाफ़त बना होगा शायद! लेकिन ऐसा है नहीं! दोनों के अर्थ अलग-अलग हैं! समझने की भूल होती है!

और यह समझने की भूल कहीं भी हो सकती है! मसलन, आइएसआइएस (ISIS) दुनिया को 'इसलामी ख़िलाफ़त' (Islamic Caliphate) बनाना चाहता है. लेकिन वह ख़ुद दुनिया के ज़्यादातर मुसलमानों के ख़िलाफ़ है! क्योंकि वह उन्हें मुसलमान मानने को ही तैयार नहीं! और दुनिया के ज़्यादातर मुसलमान आइएसआइएस (ISIS) को ही इसलाम के ख़िलाफ़ मानते हैं! आइएसआइएस (ISIS) के क़त्लेआम को, तमाम हैवानी अत्याचारों को, यज़ीदी महिलाओं को यौन-दासियाँ बनाने को और इसलाम की उसकी मनगढ़न्त व्याख्याओं को दुनिया के ज़्यादातर मुसलमान 'ग़ैर-इसलामी' मानते हैं! लेकिन कम ही लोग हैं, जो इस अन्तर को समझते हैं कि पूरी दुनिया के मुसलमान आइएसआइएस (ISIS) की 'इसलामी ख़िलाफ़त' (Islamic Caliphate) के ख़िलाफ़ हैं!

Why vast majority of Muslims consider s ISIS an Anti-Islamic Force?

मुसलमानों का विरोधी आइएसआइएस!

आइएसआइएस (ISIS), बोको हराम (Boko Haram), तालिबान (Taliban), अल-क़ायदा (Al-Qaida), यह कुछ छवियाँ हैं जो हाल के कुछ बरसों में मुसलमानों के नाम पर बनीं! और इन सारी छवियों का स्रोत एक ख़ास क़िस्म का पुरातनपंथी शुद्धतावादी और नितान्त असहिष्णु इसलाम है, जो हर आधुनिक विचार का, हर आधुनिक ज्ञान का विरोधी है! यहाँ तक कि उसकी नज़र में दाढ़ी काटना, क़मीज़-पतलून पहनना और वोट देना भी ग़ैर-इसलामी है! उसके लिए समय डेढ़ हज़ार साल पहले थम चुका है. वे दुनिया को वापस वहीं पहुँचाना चाहते हैं! सनक की भी इन्तेहा है!

यक़ीनन यह 'आइएसआइएस मार्का इसलाम' (ISIS' version of Islam) पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है और मुसलमानों के लिए भी! रूसी विमान को मार गिराने और पेरिस जैसी कुछ घटनाओं को छोड़ दें, तो मुसलमानों के इन 'मसीहाओं' ने अभी तक तो मुसलमानों को ही निशाना बनाया है, मुसलिम औरतों को ही अपनी हैवानियत का निशाना बनाया है. क्योंकि उनकी नज़र में वे सब 'इसलाम के गुनाहगार' थे! इसीलिए मुसलमानों के तमाम तबक़े और सम्प्रदाय इस तथाकथित 'इसलामी ख़िलाफ़त' (Islamic Caliphate) के ख़िलाफ़ हैं!

इसलाम का प्रतिनिधि नहीं आइएसआइएस!

पेरिस जैसी शैतानी हिंसा के बाद दुनिया का आगबबूला होना लाज़िमी है. कौन नहीं होगा, जो ऐसी किसी वारदात से क्षोभ से भर नहीं उठेगा. लेकिन यह क्षोभ अगर आइएसआइएस (ISIS) जैसे मुसलिम विरोधी संगठन को ही इसलाम का पर्यायवाची घोषित कर दे तो यह किसकी मदद करता है? पेरिस हमले के बाद यूरोप में और अपने देश में भी कुछ ऐसी ही दक्षिणी हवा चली! चलायी गयी!

यह ठीक है कि आइएसआइएस (ISIS) के लोग मुसलमान हैं और वह जो कर रहे हैं, क़ुरान और इसलाम के नाम पर कर रहे हैं. ठीक है कि दुनिया के कुछ मुसलिम देश और उनकी सेनाएँ, उनके तस्कर आइएसआइएस (ISIS) की मदद कर रहे हैं, लेकिन यह सत्य का एक पहलू है. सत्य का दूसरा पहलू इससे कहीं अति विराट है और वह यह है कि दुनिया के मुसलमानों का बहुत-बहुत बड़ा हिस्सा हर दिन आइएसआइएस (ISIS) की क्रूरताओं की ख़बरें पढ़ कर बेहद चिन्तित होता है. कम से कम उनसे तो ज़्यादा ही चिन्तित होता है जो आइएसआइएस (ISIS) और मुसलमानों को एक समझते हैं! या सोच-समझ कर उन्हें एक दिखाने वाले चश्मे बाँटते फिर रहे हैं!

दुनिया के लिए बहुत बड़ा ख़तरा

आइएसआइएस (ISIS) यक़ीनन आज की दुनिया के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है. वह महज़ एक आतंकवादी संगठन नहीं है, जिसके लक्ष्य सीमित हों, जिसका अभियान किसी एक देश या कुछ देशों के ख़िलाफ़ हो, जो किसी या कुछ भौगोलिक क्षेत्रों के दायरे में अपना कार्यक्षेत्र देखता हो. बल्कि आइएसआइएस (ISIS) पूरी दुनिया को 'इसलामी ख़िलाफ़त', एक इसलामी राज्य और एक 'इसलामी ध्वज' के अन्तर्गत देखना चाहता है! आज की दुनिया में इससे ज़्यादा ख़तरनाक मंसूबा और क्या हो सकता है? दुनिया की किसी परमाणु शक्ति ने आज तक सपने में भी ऐसा सोचने का दुस्साहस नहीं किया! फिर आइएसआइएस (ISIS) ऐसा क्यों सोच रहा है और इतने दिनों से लगातार अपने वर्चस्व वाले इलाक़ों का विस्तार कैसे करता जा रहा है?

धर्म का हथियार

ज़ाहिर है कि उसके पास बाक़ी संसाधनों और हथियारों के साथ धर्म का भी एक हथियार है, जिससे उसे कुछ ज़्यादा ही उम्मीदें हैं. इन उम्मीदों की वजह है. मुसलमान आमतौर पर धर्म के शिकंजों में कहीं ज़्यादा कसे हुए हैं. शिक्षा में पिछड़े, आर्थिक बदहाली के शिकार, मध्ययुगीन सांस्कृतिक रूढ़ियों में जकड़े, आधुनिकता से जाने या अनजाने कटे या ख़ुद को काटे हुए और सदियों के इतिहास से लेकर अब तक आर्थिक-राजनीतिक मोर्चे पर पश्चिम से पिटते रहने के अरब के सतत पराजय- बोध से ग्रस्त उनका अपना अलग ही संसार है! दुनिया की मुसलिम राजनीति बरसों से इन्हीं धुरियों पर घूम रही है, इसलिए आइएसआइएस (ISIS) भी यहीं से शक्ति के स्रोत पाना चाहे, तो आश्चर्य कैसा?

ISIS की ख़तरनाक योजना!

फ़िलहाल आइएसआइएस (ISIS) का सोचना है कि वह पहले सारे 'शुद्धतावादी मुसलमानों' को अपनी 'ख़िलाफ़त' में लाये, फिर इसलाम के दूसरे सम्प्रदायों को अपनी छाप वाले इसलाम को अपनाने पर मजबूर करे और फिर दुनिया के दूसरे हिस्सों और धर्मों पर धावा बोले और लोकतंत्र को सदा सर्वदा के लिए दुनिया से मिटा दे!

साज़िश बड़ी ख़तरनाक है और योजना शायद कई बरसों या सदियों की है. इसलिए आइएसआइएस (ISIS) और उस जैसे विचारोंवाले दूसरे संगठनों का पूरी तरह जड़ से सफ़ाया किया जाना ज़रूरी है. जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी! यह काम ज़्यादा कठिन नहीं है बशर्ते कि एकजुट हो कर आइएसआइएस (ISIS) और उसके मददगारों पर हमला बोला जाये.

लेकिन आइएसआइएस (ISIS) को सारे मुसलमानों या इसलाम की पहचान से जोड़ देना पूरी लड़ाई को कहीं और मोड़ देगा! आप क्या चाहते हैं? आइएसआइएस (ISIS) को 'खल्लास' करना, या बरसों पहले पेश की गयी 'सभ्यताओं के युद्ध' की थ्योरी को साकार करना, जिसे दुनिया जाने कबके रद्दी की टोकरी में फेंक चुकी है! दुनिया भर में भी और भारत में भी मुसलमानों के तमाम बड़े उलेमा आइएसआइएस (ISIS) के ख़िलाफ़ खुल कर आ चुके हैं. हाँ, उन्हें कुछ और मुखर होना चाहिए और लड़ाई की धार को और तेज़ करना चाहिए. साथ ही मुसलिम समाज में आधुनिकता की रोशनियाँ आने देने के लिए कुछ खिड़कियाँ भी खोलनी चाहिए, ताकि 'जिहाद' की ऐसी औंधी सुरंगों के झाँसों में उन्हें फँसाया न जा सके.

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  • MKS

    बहुत उम्मा लेख है! आपने ISIS की आदि-अन्त सब कुछ इतने कम शब्दों में बता दिया जिसका कोई और जबाव नहीं हो सकता। धन्यवाद।

    • qwn

      धन्यवाद मुकेश जी.

  • Jyoti Kumar

    – फ्रांस में पचास लाख मुसलमान रहते हैं. ताज़ा हमले के बाद ISIS स्टाईल जेहाद के खिलाफ आयोजित एक रैली में कितने मुस्लिम एकत्रित हुए?? सिर्फ 30…
    – जुलाई 2015 में आयरलैंड में ISIS के खिलाफ हुई रैली में सिर्फ दस लोग आए थे…
    – अगस्त 2013 में “इस्लाम एक हिंसक मज़हब है” इस भ्रान्ति(?) को दूर करने के लिए बोस्टन में एक रैली आयोजित की गई जिसमें सिर्फ 25 मुस्लिम शामिल हुए…
    – जून 2013 में टोरंटो में “अल-कायदा” के खिलाफ आयोजित रैली में भी 25-30 मुस्लिम ही शामिल हो पाए थे…

    लेकिन…
    लेकिन…
    लेकिन…

    – पैगम्बर मोहम्मद पर बने कार्टून के खिलाफ चेचन्या, लीबिया, और कतर में हुई रैली में कुल आठ लाख लोगों ने हिस्सा लिया…
    – पाकिस्तान में शार्ली हेब्दो के खिलाफ हुई रैली में दस हजार लोग शामिल थे…
    – शार्ली हेब्दो के खिलाफ हुई रैली में ऑस्ट्रेलिया में एक हजार मुस्लिमों ने शिरकत की…
    – किर्गीस्तान में भी ऐसे ही प्रदर्शन में हजारों लोग शामिल थे…
    – ब्रिटेन में भी शार्ली हेब्दो के विरोध में हुई रैली में सैकड़ों मुस्लिम चले आए…

    भारत में बाटला हाउस में मारे गए आतंकवादियों के समर्थन में हजारों लोग आजमगढ़ से चले आए थे… इसी प्रकार मुम्बई के आज़ाद मैदान में भी रज़ा अकादमी ने शहीद स्मारक तोड़ने का दुष्कृत्य करने वाले हजारों को मुस्लिमों को एक आवाज़ पर इकठ्ठा कर लिया था… जबकि बेचारी शाहबानो के पक्ष में सौ मुस्लिम भी मजबूती से नहीं खड़े हुए… तस्लीमा नसरीन के पक्ष में एक हजार मुस्लिम भी जोर से नहीं बोलते… “शाकाहारी बकरीद” की माँग पर भोपाल में सरेआम पिटाई की गई मुस्लिम महिला PETA कार्यकर्ता के बचाव में भी कोई मुसलमान नहीं आया….
    महानुभाव आप चाहें जितनी भी दलील दे लीजिये परंतु सचाई तो यही है की अभी भी दुनिया के ज्यादातर मुस्लमान ISIS को ही अपना आदर्श मानते हैं ।।

    • qwn

      आप मुसलिम समाज की संरचना, उनके विभिन्न सम्प्रदायों व सम्प्रदायों के भीतर के उप-सम्प्रदायों, उनके आन्तरिक द्वन्द्वों, वैचारिक संघर्षों और अलग-अलग पहचानों के बारे में कुछ भी नहीं जानते.
      न आपको मुसलिम समाज के मनोविज्ञान के बारे में कुछ पता है कि किन मुद्दों पर वे एक हो जाते हैं और किन मुद्दों पर उनके विभिन्न समुदायों व सम्प्रदायों में कभी सहमति नहीं बन सकती.
      आइएसआइएस इसलाम की जिस अवधारणा को लेकर चलता है, उस पर वृहत्तर मुसलिम समाज कभी सहमत हो ही नहीं सकता, यह बात आपको पता ही नहीं है.

      • Jyoti Kumar

        चलिए मैंने माना की मुझे मुस्लिम समाज की आंतरिक संरचनाओं के बारे में कुछ भी नहीं मालूम परंतु हाँ वर्तमान परिवेश में उनकी वकृत होती वैचारिक मानसिकता के बारे में मेरे साथ साथ समूची दुनियां को अच्छे से पता है परंतु यदि आप फिर भी मेरी बात से सहमत नहीं है तो कृप्या बताएं की आखिर क्यों अमिरिक, यूरोप और अफ्रीका समेत सारी दुनिया से बड़ी संख्या में युवा ISIS में भर्ती होने जाते हैं ? और किसी बड़े मुस्लिम समुदाय द्वारा इसके विरोध में कोई आवाज उठाई गई है एवं उस आवाज को कितना समर्थन मिला है यह भी बताने की कृपा करें ।

        • Hindu

          Joyti Kumar, आप Fake Secularism, True Hinduism, इस्लाम के खूनी मंसूबे और पूरे world मे hinduism पर आसन्न खतरों के RARE NEWS के बारे मे जानने के लिए देखे:
          https://www.facebook.com/Wakeuphindus57
          जितनी latest और authentic जानकारी आपको यहाँ मिलेगी शायद ही कहीं और मिले| समय निकाल कर पुराने पोस्ट भी जरूर पढ़े|

      • Hindu

        कितने मुस्लिम देशों मे हिंदुओं के त्योहारों पर सरकारी छुट्टी दी जाती है ? छुट्टी तो छोड़िए डर के मारे हिंदू त्योहार भी नहीं मना पाते|

        कितने मुस्लिम देशो के संविधान मे अल्पसंख्य समुदाय (हिंदू या अन्य) के अधिकारों लिए कोई नियम है ?

        कितने मुस्लिम देशो मे कोई हिंदू किसी मुस्लिम लड़की से बिना अपना धर्म त्यागे शादी कर सकता है ?

        कितने मुस्लिम देशो मे कोई हिंदू किसी सरकार या सरकारी दफ़्तर मे उच्च पदो पर है ? कितने मुस्लिम देशो मे कोई हिंदू किसी नये मंदिर का निर्माण करवा सकता है ?

        कितने मुस्लिम देशो मे किसी हिंदू के मरणोपरांत उसे दाह-संस्कार की सुविधा हासिल है? कितने मुस्लिम देशो मे हिंदू खुद को महफुज़ समझते हैं ?

        दूसरे देशों की बात छोड़िए भारत मे आज़ादी के बाद से अबतक कश्मीर मे लगातार मुस्लिम मुख्यमंत्री बनते आए है| ये बात तो समझ मे आती है कि ये मुस्लिम मुख्यमंत्री आतंकवाद के कारण हिंदुओं का कत्लेआम रुकवाने मे सफल नही हुए मगर उनकी हड़पी हुई ज़मीन के कागजात को जायज़ कैसे ठहरा दिया गया ? कश्मीरी पंडितों पुनर्वास पैकेज लागू करने में सरकार की जड़ता पर खिंचाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि कश्मीरी पंडितों के घाटी से जाने के बाद उनके सैकड़ों घरों को गैरकानूनी तौर पर बेच दिया गया। क्या सरकार ने ऐसे किसी एक घर की बिक्री को गैरकानूनी घोषित किया है ?
        राज्य सरकार ने हालांकि इस बात का कोई जवाब नहीं दिया कि क्या वह संकट के समय कश्मीरी पंडितों द्वारा बेची गई संपत्तियों की बिक्री को रद्द करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को ऐसी सभी संपत्तियों की लिस्ट बनाने को कहा है जो आतंकवाद के दौरान घाटी छोड़कर जाते हुए लोगों ने बेच दीं थीं। कश्मीरी हिंदुओं के प्रति सरकार का यह रवैया आतंकवाद के मौन समर्थन को दर्शाता है| इस्लाम अकारण ही बदनाम नहीं है| बात-बात मे बाल की खाल निकालने वाले कमर जी आप ये बातये कि क़ुरान को टीवी पर क्यू नहीं दिखया जाता ? जेहाद, मुजाहिद, काफ़िर, ग़ाज़ी, जजिया टैक्स, बुत-शिकन, अल-तकिया, माल-ए-गलीमत, हरम, जन्नत मे 72 हूर, गजवा-ए-हिंद, दारूल- हरब, दारूल-उलूम और ना जाने ऐसे कितने ही बेशकीमती शब्दों को मतलब क्या मुस्लिम बुद्धिजीवी ही समझ सकते है ? क्या हिंदू न तो इनके बारे मे ना तो कुछ जान सकते है या न ही वाख्या कर सकते है ?
        भारत के बाहर लगभग सभी देशों मे हिंदू है मगर आज तक के इतिहास मे आप ज़रा आँकड़े पेश करें जब हिंदुओं ने कोई आतंकी कांड किया हो| मुस्लिम आतंकी हमलों की लिस्ट तो छोड़िए मुस्लिम आतंकी संगठनों की इतनी बड़ी लिस्ट Wikipedia पर देखने को मिल जाएगी की याद रखना संभव ना हो| शायद ही दुनिया का कोई देश हो जहाँ मज़हब-ए-खास के आतंवादी संगठन देखने को ना मिले| क्या सबकुछ ज़ूठ है ? क्या सबकुछ जूठी मीडिया ने फैलाया है ? या फिर इस्लाम को पूरी दुनिया मे RSS/VHP/BJP ने बदनाम किया है ? क्या सभी गैर-मुसलमान इतने बेवकूफ़ है जो सदियों से अपने संपति-संकृति, परिजनों-पूर्वजों, देश-प्रदेश पर होते आए इस्लाम के खूनी आघातों को इतनी आसानी से भूलकर मुसल्लम+ईमान वालों को ईमान का Certificate दे दें| जानवर भी अपने दुश्मन को पहचान लेते है इंसान नो बहुत बड़ी चीज़ हो गयी|

  • gaurav

    क़मर
    वहीद नक़वी सर, इस
    लेख के बारे में मैं क्या कह
    सकता हूँ, सिवाय
    इसके कि ये बेबाक़ और चेतावनी
    भरा है. इसलाम
    और आईएसआईएस की जो तस्वीर आपने
    पेश की है वो चेतावनी इसलिए
    क्यूंकि समूचे विश्व में आज
    जो स्थिति है वो ख़तरों से भरा
    है. यहाँ
    हजारों मील दूर बैठे गाँव और
    शहरों के लोग शायद इस समझ से
    परे हों कि ये बला है क्या!
    मगर सच्चाई
    नज़रंदाज़ करने से सच्चाई छुप
    तो नहीं जाती!
    हम
    दिल्ली के कॉफ़ी हाउस,
    लूटयंस ख़ान
    मार्किट और कनौट प्लेस के
    रेस्टोरेंट में बैठ कर इस्पे
    चर्चा तो कर रहे हैं मगर इसकी
    गंभीरता को समझ नहीं पाते या
    समझना नहीं चाहते.
    लेकिन
    आप भी इस बात से सहमत होंगे कि
    ये हिंसक माहौल कि वजह वो
    पाश्चात्य देशों की सरकारें
    हैं जो अपने निजी फ़ायदे के लिए
    इस्लामिक देशों में युद्ध
    करवाते आये हैं. कभी
    तेल के कुओं के नाम पर तो कभी
    तानाशाही ख़त्म करने के नाम
    पर, दक्षिणी
    अमेरिका और यूरोप के बहुत से
    राष्ट्र अपने देश की अर्थव्यवस्था
    को मजबूती देने के बदले में
    मध्य एशियाई देशों की जड़ें
    खोखली कर डालीं. मसलन,
    १९८०-१९८८
    तक चल ईरान-इराक़
    युद्ध, अफ़ग़ानिस्तान
    में नाटो की सेना का कब्ज़ा,
    इराक़ में सद्दाम
    हुसैन को ख़त्म करना या पाकिस्तान
    में ड्रोन हमले करना, इन
    सभी घटनाओं ने सालों पहले ही
    शायद आईएसआईएस, तालिबान
    और दुसरे आतंकी संगठनों की
    नीव रख डाली थी. जब
    उनके बनाए गए हथियार उनके ही
    ऊपर चलने लगे तो अचानक ही इसलाम
    उनके लिए रेडिकल हो गया है.
    पुतिन और एरियल
    शेरोन से लेकर ओबामा और कैमरून
    साथी हो गए! और
    एकजुट होकर आतंक से लड़ने के
    बजाय इसलाम से लड़ने लगे.

    सर, आज डर
    मुझमें भी है, हालाँकि
    मैं मुस्लमान नहीं. पता
    नहीं कब कोई ऐसे किसी बहकावे
    में आकर बगदादी के साथ हो जाए
    और इस शांतिप्रिय देश की अखंडता
    और संप्रभुता को नेश्तोनाबूत
    कर दे. वैसे
    भी इस देश में वाक़ई असहिष्णुता
    है, वो
    अलग बात है कि इस्पे चर्चा बंद
    हो गयी है क्यूंकि इलेक्शन
    ख़त्म हो गए न बिहार में.
    हमारी भी यही
    अपेक्षा थी कि इस चुनाव के बाद
    इस मुद्दे की उपेक्षा ही होनी
    है.

  • kushal

    इतना अच्छा लेख लिखने के लिए आपको साधुबाद .पहली बार मैंने आपका ऐसा लेख पढ़ा है जिसमें अपने RSS के शब्द का प्रयोग नहीं किया है . निष्पक्ष लेख लिखने के लिए धन्यवाद

    आपकी चिंता सही ज़ाहिर की है की ISIS और उसके जैसे अन्य मुस्लिम आतंकवादी समूहों की वजह से दुनिया के अन्य दूसरे मुसलमान जो अमनपसंद हैं , विकास की विचारधारा के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं , उन्हें भी लोग आतंकवादियों के रूप में देख रहे हैं जो एक चिंता का विषय है .ज़्यादातर लोग ये सोचते हैं की हर मुसलमान ISIS की विचारधारा का समर्थन कर रहा है और उसका विरोध ऊपरी मन से कर रहा है दिखावे के लिए जबकि ऐसा नहीं है

    ISIS का खात्मा तभी हो सकता है जब दुनिया के मुसलमान एक होकर ज़बरदस्त विरोध करे और उनको सभी मुसलमान आर्थिक मदद देना बंद कर दें जैसे कुछ मुसलमान उन्हें इस्लाम के नाम पर चन्दा और अन्य अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन या सहायता करते हैं

  • mahendra gupta

    नकवी साहब , बेवाक विचारों के लिए शुक्रिया, बहुत अच्छी बातें आपने लिखने की कवायद की है इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन इस्लाम के नाम पर संगठित होने वाले इस संगठन का विरोध जब तक स्वयं मुस्लिम नहीं करेंगे तब तक इसे कमजोर या नष्ट नहीं किया जा सकता , लेकिन ऐसा क्यों लग रहा है कि किसी भी घटना पर मुस्लिम राष्ट्रों व समाज का आक्रोश कभी तो इतना उग्र हो जाता है पर इस मामले पर वह जोश व आक्रोश नज़रनही आता इसके प्रति सहानुभूति एक बहुत बड़े तबके की बनती जा रही है ,व इसका विरोध भी यदि शुरू हुआ भी तो बहुत विलम्ब से शुरू हुआ और वह भी आधे अधूरे मन से कुछ डरते हुए , कुछ सहमते हुए। जब तक आई एस आई एस को यह यकीन नहीं हो जाता कि उसे विश्व के मुसलमानों का सहयोग नहीं मिलेगा तब तक वह हथियार डालने वाला नहीं है , और अमेरिका रूस फ्रांस कोई भी शक्ति इसे पूर्णतः नेस्तनाबूद नहीं कर सकती , आप इस लेख के लिए बधाई के पात्र जरूर हैं

  • sunita

    Naqvi saheb… a well thought out post on the tentacles of terrorism. The fight against fundamentalism and extremism must be fought exclusively from within the community as political parties can only aggravate the problem. Pardon me for expressing my thoughts in English as I am more comfortable in this.

    • qwn

      Thank you Sunita ji for reading and liking it. I feel honoured.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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