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Feb 14
घर घर मफ़लर से आगे क्या है?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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बीजेपी कब चाहेगी कि इतना बड़ा जनमत हमेशा अरविन्द केजरीवाल के साथ ऐसे ही बना रहे! इसलिए केजरीवाल के राजनीतिक कौशल की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह अपनी योजनाओं के लिए और अपने गगनचुम्बी चुनावी वादों को पूरा करने के लिए केन्द्र से कितना और कैसा सहयोग ले पाते हैं, केन्द्र से टकराव की स्थितियाँ आने पर उससे कैसे निबटते हैं, सीमित शक्तियों के अपने दायरे में कितना काम कर पाते हैं और अगर काम नहीं कर पाते तो जनता को कैसे समझा पाते हैं कि वह क्यों काम नहीं कर पाये?


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आम आदमी ग़ज़ब चीज़ है! किसी को भनक तक नहीं लगने देता कि वह क्या करने जा रहा है. वरना किसे अन्दाज़ था कि सिर्फ़ नौ महीनों में ही दिल्ली घर घर मोदी से घर घर मफ़लर में बदल जायेगी! और दिल्ली में 'आमराज्य' सीज़न 2 की शुरुआत हो जायेगी. चुनावी पंडित अब जो भी जोड़-घटाव लगाते रहें, लगायें. लेकिन मोटे तौर पर सच यही है कि दिल्ली में यह चुनाव आम आदमी पार्टी ने नहीं, बल्कि ख़ुद आम आदमी ने लड़ा था! और दिल्ली का यह आम आदमी कौन है? यह सही है कि आम आदमी पार्टी को ग़रीबों, दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों में ग़ज़ब का समर्थन मिला, लेकिन शहरी युवाओं, मध्य वर्ग और यहाँ तक कि बीजेपी-अकाली गँठजोड़ के बावजूद सिखों के भी आधे से ज़्यादा वोट 'आप' को मिले. इसलिए पिछली बार के 'आमराज्य' सीज़न 1 के मुक़ाबले इस बार दिल्ली में आये 'आमराज्य' सीज़न 2 में सचमुच दिल्ली का आम आदमी न सिर्फ़ अपना भविष्य देख रहा है, बल्कि वह धड़कते दिलों से यह भी मना रहा है कि उसका फ़ैसला ग़लत न साबित हो, वरना उसकी बड़ी जगहँसाई होगी!

अपनी लहर में डूबते राजनेता

यही अरविन्द केजरीवाल की सबसे बड़ी चुनौती है कि न वह अपनी जगहँसाई करायें और न जनता की जगहँसाई होने दें. उनकी पिछली ग़लती जनता ने खुले दिल से माफ़ कर दी. इसका यह मतलब नहीं कि अगली ग़लती भी माफ़ कर देगी. अमूमन ऐसे कार्ड एक बार ही चल पाते हैं!

भारतीय राजनीति की दो बड़ी त्रासदियाँ हैं. एक तो यह कि यहाँ राजनेता अकसर अपनी ही लहर में डूब जाते हैं! वरना मोदी को अपना नामधारी सूट पहनने का शौक़ न चर्राता! और दूसरी यह कि वैकल्पिक राजनीति के अब तक हुए सारे प्रयोग या तो बुलबुलों की तरह फूट कर बिखर गये या उसी परम्परागत राजनीति के कीचड़ में सन गये, जिसकी सफ़ाई के नाम पर वह खड़े हुए थे. केजरीवाल के साथ दोहरा संकट है. वह प्रचण्ड लहर पर सवार हो कर आये हैं और राजनीति में शुचिता और आम आदमी की सीधी भागीदारी के एक नये वैकल्पिक माडल के साथ भी आये हैं. उन्हें अपने चुनावी वादे तो पूरे करने ही हैं, साथ ही यह देखना भी है कि जिस बेदाग़ राजनीति की बात वह करते हैं, वह उसकी भी बेदाग़ मिसाल पेश कर सकें! अभी चुनाव के दौरान चंदे और उनके कुछ उम्मीदवारों को लेकर उठे सवाल कहीं न कहीं खटका तो पैदा करते ही हैं कि वैकल्पिक राजनीति की चादर ओढ़ कर पार्टी कहीं उसी काजल की कोठरी की तरफ़ तो नहीं बढ़ रही है, जिसे ढहाने के लिए वह बनी थी!

अब केजरीवाल की असली परीक्षा

दूसरी पार्टियों के लिए हार के बाद आत्मनिरीक्षण का समय होता है, लेकिन केजरीवाल के लिए इस भारी जीत के बाद आत्मनिरीक्षण का समय है! वह अब सरकार और पार्टी को कैसे चलायें? उनके पास प्रचण्ड बहुमत है. यह समाधान भी है और समस्या भी! वह केन्द्र सरकार पर दबाव बनाने की स्थिति में रहेंगे क्योंकि इतना बड़ा जनमत उनके साथ है. लेकिन बीजेपी कब चाहेगी कि इतना बड़ा जनमत हमेशा उनके साथ ऐसे ही बना रहे! इसलिए केजरीवाल के राजनीतिक कौशल की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह अपनी योजनाओं के लिए और अपने गगनचुम्बी चुनावी वादों को पूरा करने के लिए केन्द्र से कितना और कैसा सहयोग ले पाते हैं, केन्द्र से टकराव की स्थितियाँ आने पर उससे कैसे निबटते हैं, सीमित शक्तियों के अपने दायरे में कितना काम कर पाते हैं और अगर काम नहीं कर पाते तो जनता को कैसे समझा पाते हैं कि वह क्यों काम नहीं कर पाये?

जनलोकपाल और दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा, कम से कम ये दो मुद्दे ऐसे हैं, जहाँ दिल्ली और केन्द्र सरकार में सहमति की सम्भावनाएँ नहीं दिखतीं. केजरीवाल को तय करना होगा कि इन मुद्दों पर उन्हें क्या करना है? अटकना है, टकराना है, लड़ना है या इन पर कोई नयी समझ बनानी है? दूसरी बात यह कि दिल्ली में अमीर से लेकर ग़रीब तक हर तबक़े की उम्मीदों और आकाँक्षाओं के बीच वह सन्तुलन कैसे बनायें? दिल्ली के इन चुनावों ने पहली बार देखा कि बिना किसी साम्यवादी या समाजवादी नारे के, कैसे समूचा का समूचा ग़रीब तबक़ा इस उम्मीद में केजरीवाल के साथ खड़ा हो गया कि रोटी-पानी और सिर पर छत की उसकी बुनियादी समस्याओं में कुछ न कुछ सुधार ज़रूर होगा . बिना सेकुलरिज़्म की बाँग लगाये ही कैसे 78 फ़ीसदी मुसलमानों ने 'आप' को इस उम्मीद में समर्थन दिया कि वह हिन्दुत्व की चिंघाड़ से अपने को सुरक्षित महसूस कर सकेंगे. और इस सब के बावजूद मध्य वर्ग के आधे मतदाताओं ने भी केजरीवाल से उम्मीद लगायी कि वह दिल्ली को वर्ल्ड क्लास शहर बना देंगे, महिलाएँ बेख़ौफ़ घरों से बाहर निकल सकेंगी और 'आप' साफ़-सुथरी ईमानदार राजनीति की नयी मिसाल पेश करेगी.

'आप' की सरकार, न मोदी शैली, न ममता शैली

इन अलग-अलग आकाँक्षाओं को पूरा कर पाना अपने आप में बड़ी चुनौती है. 'आप' की सरकार न सिर्फ़ ग़रीबों की सरकार हो सकती है, न दलितों-पिछड़ों की, न मुसलमानों की, न मध्य वर्ग की और न अमीरों की. वह मोदी शैली की सरकार नहीं हो सकती, जिसे कारपोरेट घराने के दोस्त के रूप में देखा जाये और न ही वह ममता बनर्जी की शैली वाली सरकार हो सकती है. इसलिए जब मनीष सिसोदिया निजी स्कूलों से डोनेशन ख़त्म करने की बात करते हैं तो कान खड़े होते हैं. डोनेशन बड़ी समस्या है, इसे रुकना चाहिए. लेकिन कैसे? आप कितनी नकेल कस सकते हैं? आपने नकेल कसी और ये स्कूल पड़ोस के उत्तर प्रदेश या हरियाणा में चले गये तो? ऐसे ही दिल्ली के निजी अस्पतालों में बड़ी लूट है. नियमों के बावजूद ग़रीबों को वहाँ जगह नहीं मिलती. लेकिन दिल्ली की कोई सरकार उन्हें सुधार नहीं पायी! ऐसी ही तमाम छोटी-बड़ी समस्याएँ हैं, जिन पर केजरीवाल और उनकी पार्टी को व्यावहारिक रवैया अपनाना पड़ेगा. पूरे चुनाव-प्रचार में किसी ने पर्यावरण की चर्चा ही नहीं की, जो दिल्ली वालों के जीवन के लिए बड़ा ख़तरा बनता जा रहा है.

लेकिन ये चुनौतियाँ एक बहुत बड़ा अवसर भी पेश करती हैं. और अगर केजरीवाल इस अवसर का सही इस्तेमाल कर पाये तो वह सचमुच देश की बड़ी सेवा करेंगे और गवर्नेन्स की नयी किताब लिखेंगे. केजरीवाल चुनाव क़तई न जीतते अगर बाक़ी दलों की तरह यह चुनाव उन्होंने पोस्टरों, बैनरों, होर्डिंगों, विज्ञापनों और रैलियों के परम्परागत तरीक़ों से लड़ा होता. वह चुनाव इसलिए जीते कि पिछले नौ महीनों में वह, उनके विधायक और वालंटियर दिल्ली के हर गली-कूचे में बार-बार गये, अपनी बात कही, लोगों की बात सुनी, सीधा संवाद किया, चुनावी घोषणापत्र बनाने के लिए दिल्ली डायलाग किया, आम आदमी की सीधी भागीदारी बनी, लोगों को लगा कि ये लोग बिलकुल उनके जैसे ही हैं, बिलकुल उनकी जैसी ही बातें करते हैं. और इसीलिए दिल्ली में घर घर मफ़लर ने जगह बना ली!

दिल्ली डायलाग में हो सरकार की समीक्षा!

तो क्या यही माडल सरकार चलाने में नहीं अपनाया जा सकता? क्या दिल्ली सरकार, उसके मंत्री, उसके विधायक इस दिल्ली डायलाग को सरकार के काम की सीधी समीक्षा में नहीं बदल सकते? हर कुछ महीनों बाद सरकार दिल्ली की जनता के पास जाये. बताये कि क्या-क्या काम कर दिया, क्या नहीं कर पाये, कहाँ क्या दिक़्क़तें आ रही हैं, उनका क्या समाधान हो सकता है, लोगों के क्या सुझाव हैं, वग़ैरह-वग़ैरह. अगर ऐसा हो गया तो सचमुच हम एक पारदर्शी सरकार देखेंगे, जिसके विफल होने का कोई कारण ही नहीं, क्योंकि जनता सरकार के हर फ़ैसले में साथ होगी!

और पार्टी के लिए आगे क्या? जहाँ गुड़ होता है, वहाँ चींटे आते ही हैं. पार्टी के मौजूदा कुछ विधायकों को लेकर सवाल उठे हैं. यह केजरीवाल को सोचना है कि उन्हें अलग दिखना है या बाक़ी पार्टियों जैसा बन जाना है. और अगर अलग दिखना है तो पार्टी को साफ़-सुथरा रखना ही पड़ेगा.

(लोकमत समाचार, 14 फ़रवरी 2015)
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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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