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Oct 03
तब बहुत बदल चुका होगा देश!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 54 

दादरी और कानपुर की घटनाओं ने बता दिया कि पिछले नब्बे साल से संघ देश की प्रयोगशाला में चुपके-चुपके और अथक जो प्रयोग कर रहा था, उसका रसायन अब बिलकुल तैयार है! मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर गाँव-गाँव तक फैलाया जा चुका है. मोदी सरकार चुप है, समर्थन में या मजबूरी में? लेकिन आम हिन्दुओं के मन में मुसलमानों के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में दोष ख़ुद मुसलमानों का भी कम नहीं है और सेकुलर राजनीति का भी, जो हमेशा मुल्लाओं की पिछलग्गू बनी रही!


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तीन कहानियाँ हैं! तीनों को एक साथ पढ़ सकें और फिर उन्हें मिला कर समझ सकें तो कहानी पूरी होगी, वरना इनमें से हर कहानी अधूरी है! और एक कहानी इन तीनों के समानान्तर है. ये दोनों एक-दूसरे की कहानियाँ सुनती हैं और एक-दूसरे की कहानियों को आगे बढ़ाती हैं. और एक कहानी इन दोनों के बीच है, जिसे अकसर रास्ता समझ में नहीं आता. और ये सब कहानियाँ बरसों से चल रही हैं, एक-दूसरे के सहारे! विकट पहेली है. समझ कर भी किसी को समझ में नहीं आती!

Dadri Killing: Communal Hatred has spread deep into villages too

पहली कहानी. एक देश है, जो ए.पी. जे. अब्दुल कलाम के निधन पर दिल की गहराइयों से शोक में डूब जाता है. दूसरी कहानी. एक मंत्री है, जो कहता है कि मुसलमान होने के बावजूद कलाम राष्ट्रवादी थे! तीसरी कहानी. देश की राजधानी के ठीक दरवाज़े पर एक गाँव में भीड़ अचानक एक मुसलिम घर पर हमला करती है, इस शक में कि उसने गाय काटी है और परिवार के मुखिया को मौत के घाट उतार देती है. एक और ऐसा ही हादसा कानपुर के जाना गाँव में होता है. एक अनजान आदमी के लिए कोई बोल देता है कि यह पाकिस्तानी आतंकवादी है और भीड़ उसे मौत के घाट उतार देती है!

बिसाहड़ा की कहानी

दादरी के बिसाहड़ा (Bisara or Bisada village) गाँव में कभी कोई साम्प्रदायिक माहौल नहीं रहा. कम से कम ऊपर से तो नहीं दिखा. जिस अख़लाक़ को मारा गया, गाँव के हर घर में उसका आना-जाना था, किसी की बिजली ठीक करनी हो, किसी का पम्प ख़राब हो गया हो, किसी की कोई मशीन बिगड़ गयी हो. अख़लाक़ के घर की औरतें राजपूतों के इस गाँव की औरतों के कपड़े सी कर महीने में दो-ढाई हज़ार कमा लेती थीं. मतलब यह कि बरसों से इस परिवार का पूरे गाँव से मिलना-जुलना, बोलना-बतियाना, काम-धाम और खान-पान का रिश्ता था. हर साल की तरह इस बार भी अभी बक़रीद के दिन पड़ोस के बहुत-से हिन्दू दोस्त घर आये थे. फिर अचानक क्या हुआ कि एक मन्दिर से घोषणा हो कि अख़लाक़ ने गाय काटी है और फिर सारा गाँव उसकी जान लेने पर उतारू हो जाये?

BJP Minister says, Dadri killing was an 'Accident!'

मुसलमानों के ख़िलाफ़ बनी गाँठ

संस्कृति मंत्री महेश शर्मा कहते हैं कि यह दुर्घटना थी. लेकिन सच यह है कि यह अचानक नहीं हुआ था. वारदात के तीन दिन पहले अख़लाक़ के बेटे को गुज़रते देख किसी ने जुमला कसा था, देखो पाकिस्तानी जा रहा है! मतलब यह कि मन में गाँठ बहुत गहरे बैठी हुई थी या बैठायी जा चुकी थी कि मुसलमान है, तो वह भारतीय नहीं है, उसे भारत में नहीं रहना चाहिए, वह पाकिस्तानी है, वह कभी भारत का हो ही नहीं सकता! पिछले काफ़ी समय से संघ और बीजेपी के कई नेता मुसलमानों को लगातार पाकिस्तान भेजे जाने की वकालत अनायास ही नहीं करते रहे हैं और यही वह गाँठ है, जो देश के संस्कृति मंत्री के मन से अचानक बाहर आ जाती है कि मुसलमान होने के बावजूद कलाम राष्ट्रवादी थे! यानी मुसलमान राष्ट्रवादी हो नहीं सकते! और कलाम क्यों राष्ट्रवादी थे? इसलिए कि वह गीता पढ़ते थे. वह सरस्वती वन्दना करते थे! यानी जो मुसलमान गीता न पढ़े, जो सूर्य नमस्कार न करे, वह राष्ट्रवादी नहीं? अब इसको संघ प्रमुख मोहन भागवत के पिछले साल के इस बयान से जोड़ कर देखिए कि "आपस में इस लड़ाई को लड़ते-लड़ते ही भारत के हिन्दू- मुसलमान साथ रहने का कोई तरीक़ा ढूँढ लेंगे और वह तरीक़ा हिन्दू तरीक़ा होगा."

भागवत के इस बयान को यहाँ सुना जा सकता है:https://youtu.be/518e9cdCMyI

The 'Hindu Way' of RSS!

क्या है संघ का हिन्दू तरीक़ा?

संघ का मतलब साफ़ है कि मुसलमानों को या किसी और भी धर्मावलम्बियों को भारत में हिन्दू तरीक़े से ही रहना होगा! पिछले नब्बे साल से संघ देश की प्रयोगशाला में चुपके-चुपके और अथक जो प्रयोग कर रहा था, उसका रसायन अब बिलकुल तैयार है! भारत के गाँवों में कभी कोई साम्प्रदायिक एहसास नहीं रहा, लेकिन पिछले पन्द्रह महीनों में शहर से लेकर गाँव तक अब देश की हिन्दू आबादी के बड़े हिस्से में मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर भरा जा चुका है. पहले 'घर वापसी' और 'लव जिहाद' का शोर और फिर मुसलमानों की बढ़ती आबादी के बारे में जानबूझ कर झूठा हव्वा खड़ा करने की नियोजित कोशिश! यह सच है कि मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर अब भी हिन्दुओं के मुक़ाबले ज़्यादा है, लेकिन यह भी सच है कि पहले के मुक़ाबले मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर में भारी गिरावट दर्ज की गयी है और मुसलमानों में परिवार नियोजन के साधनों का प्रयोग तेज़ी से बढ़ा है. यही रफ़्तार रही तो जल्दी ही मुसलमानों की आबादी वृद्धि की दर राष्ट्रीय औसत के आसपास आ जायेगी. लेकिन प्रचार कुछ और किया गया.

उप-राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ भी निशाना

यही नहीं, संघ के बड़े नेताओं ने उप-राष्ट्रपति हामिद अन्सारी की देशभक्ति पर दो बार अनर्गल सवाल उठाये, जिसके लिए बाद में उन्हें माफ़ी भी माँगनी पड़ी. और जब कुछ नहीं बचा तो इस पर आपत्ति उठाने की कोशिश की उप-राष्ट्रपति ने मुसलमानों के पिछड़ेपन के बारे में बयान क्यों दिया? अच्छा, यदि उप-राष्ट्रपति यह कहते कि दलित बहुत पिछड़े हैं और उनके विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए, तो भी क्या यह ग़लत होता? मुसलमानों की हालत दलितों से ज़रा ही बेहतर है. तो उप-राष्ट्रपति ने यह बात कह कर क्या ग़लत किया? और राष्ट्रपति के. आर. नारायणन पर तो किसी ने कभी उँगली नहीं उठायी कि उन्होंने दलितों के पिछड़ेपन की चर्चा क्यों की? दलित हो कर दलित पिछड़ेपन की बात करना ग़लत नहीं, लेकिन मुसलमान हो कर मुसलमानों के पिछड़ेपन की चर्चा करना पाप है?

चुप क्यों बैठी है मोदी सरकार?

और दिलचस्प बात देखिए कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार इन मुद्दों पर कभी कुछ नहीं बोली. न कोई ट्वीट, न कोई बयान, न किसी मन की बात में इस सबकी कोई चर्चा! जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो! सरकार इन घटनाओं के समर्थन में चुप है या मजबूरी में? दोनों ही स्थितियाँ चिन्ताजनक हैं! यह हुई तीन कहानियों को मिला कर बनी कहानी, देश के रंगमंच पर जिसके खेले जाने की शुरुआत अब हो चुकी है. यह तब तक जारी रहेगी, जब तक मुसलमान 'हिन्दू तरीक़े' से रहना नहीं सीख जायेंगे!

Muslim Fundamentalism always helped RSS to built its case!

मुसलमान भी कम दोषी नहीं!

अब वह कहानी, जो इसके समानान्तर चलती है. मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड, जो मुसलिम समाज के लिए लाये जानेवाले हर प्रगतिशील और सुधारात्मक क़ानून का ज़बरदस्ती विरोध करता रहा, उलेमा जो अनाप-शनाप फ़तवे देकर मुसलमानों को हर आधुनिक विचार का विरोधी साबित करते रहे, और सोने पर सुहागा आज़म ख़ाँ, अबू आज़मी, असदुद्दीन ओवैसी, उनके पिता सलाहुद्दीन ओवैसी, इब्राहीम सुलेमान सैत, जी. एम. बनातवाला, इमाम बुख़ारी और सैयद शहाबुद्दीन जैसे मुसलमानों के स्वयंभू नेता, जो मुसलमानों को भड़काये और बरगलाये रखने की राजनीति करते रहे. और इस तरह रची गयी मुसलिम साम्प्रदायिकता से इनकी दुकानें तो चलती रहीं, लेकिन इसने हिन्दू साम्प्रदायिकता को मुसलमानों के ख़िलाफ़ वे तर्क मुहैया कराये, जिन्हें आम हिन्दू आसानी से सही मानने लगें! क्या मुसलमान अब भी आत्मनिरीक्षण करेंगे कि देश के आम हिन्दुओं में उनके ख़िलाफ़ जो माहौल बना है, उसके ज़्यादातर हथियार ख़ुद मुसलमानों के ही दिये हुए हैं?

Secular Politics or Vote Politics!

मुल्लाओं की पिछलग्गू सेकुलर राजनीति!

और अब इन कहानियों के बीच की कहानी, तथाकथित सेकुलर राजनीति की कहानी, जिसने मुसलमानों के विकास के लिए तो कुछ नहीं किया, उलटे शाहबानो से लेकर इमराना बलात्कार कांड और आरिफ़-गुड़िया-तौफ़ीक़ जैसे मामलों में मुल्लाओं के सामने घुटने टेकने से लेकर तमाम ऐसे काम किये जिससे मुसलमानों का केवल नुक़सान हुआ. मुसलिम तुष्टीकरण के नाम पर सेकुलरिज़्म बदनाम ज़रूर हुआ, लेकिन मुसलमानों को मिला किया? धेला भी नहीं! और अब हिन्दुत्व की बहती बयार को देख कर काँग्रेस और सपा जैसी पार्टियों को डर लगने लगा है कि मुसलमानों के बारे में कुछ ज़्यादा बोलेंगे तो कहीं हिन्दू वोट हाथ से न निकल जायें! सेकुलरों के लिए भी यह गहरे आत्मनिरीक्षण का समय है कि उन्होंने कभी यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड पर बहस तक चलाने की भी पहल क्यों नहीं की?

बहरहाल, यह मसला केवल मुसलमानों का नहीं है. हो सकता है कल को मुसलमान 'हिन्दू तरीक़े' से रहने को मजबूर हो जायें. लेकिन तब हिन्दुओं के लिए भी यह देश बहुत बदल चुका होगा! राज्य को धर्म के रथ में जोते जाने का नतीजा क्या होता है, दुनिया में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है! कलबुर्गी जैसे तमाम लोगों को निशाना बना कर भविष्य के हिन्दू राष्ट्र की तसवीर तो पेश की ही जाने लगी है!

http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

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  • Zero Sum

    बहुत सही. क्या इस लेख का अँग्रेज़ी संस्करण मिल पाएगा – चाहूँगा कि मेरे गैर हिन्दी भाषी मित्र भी पढ़ें.

    • qwn

      I write in Hindi and currently I have no English version available. I will try to provide you this in couple of days.

  • SN Chamaria

    It is vicious story, truly a reality in society. The only job govt. should have is to make a cohesive society of good citizens. There should be no other job in governing as important as this…

    • qwn

      Thanks for appreciation.

      • Harish Chander Sansi

        आपके विश्लेषण के कुछ बिन्दुयों से सहमत हूं पर शत प्रतिशत नहीं.
        असहमति की चर्चा करना लाभकारी नजर नहीं आता क्योंकि मैंने देखा है कि जिन लोगों ने आपसे सहमति प्रकट की है उनकी टिप्पणियों पर आपने अपनी राय दी है या Thanks आदि लिखा है परंतु असहमत होने वाली किसी टिप्पणी पर आपने अपनी कोई राय नहीं दी.
        ऐसा क्यों?
        क्या आप भी केवल ओर केवल सराहना पसंद हो गए हैं?

        • qwn

          आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद. किसी को धन्यवाद लिखना बहुत आसान है, लेकिन किसी बहस के लिए कुछ फुर्सत का समय चाहिए, इसलिए अकसर उत्तर देर में ही देता हूँ, कभी-कभी दो-तीन दिन बाद भी.

          उत्तर न भी मिले तो क्या, आपको अपनी बात रखनी चाहिए, कम से कम दूसरे लोग तो पढ़ेंगे.

        • qwn

          टिप्पणी के लिए धन्यवाद हरीश जी.
          असहमत होने वाली टिप्पणियों पर जवाब देने में वैसे भी स्वाभाविक समय लगता है, कभी-कभी कुछ रिसर्च करके तथ्य भी ढूँढने पड़ते हैं, कभी कुछ आँकड़ों की ज़रूरत पड़ती है, कभी किसी का पुराना बयान उद्धरित करना होता है तो उसे ढूँढना पड़ता है और फिर उत्तर-प्रत्युत्तर का क्रम चलाने के लिए अतिरिक्त समय चाहिए होता है, इसलिए जवाब प्राय: देर में ही दे पाता हूँ, कभी-कभी दो-तीन दिन देर में भी और कभी-कभी समय नहीं भी निकल पाता है और विषय पुराना पड़ जाता है.
          फिर ब्लाग के साथ फ़ेसबुक, ट्विटर आदि पर भी लोगों के सवाल होते हैं. आमतौर पर ट्विटर बहुत तेज़ माध्यम है, इसलिए सबसे पहले उसे ही देखना होता है. फिर फ़ेसबुक पेज पर भी पोस्ट के पहले दिन आमतौर पर सौ से ज़्यादा टिप्पणियाँ आ ही जाती हैं, उनमें से जिनका जवाब देना चाहिए, देता हूँ. लेकिन वहाँ हर टिप्पणी को एक बार देखना पड़ता है क्योंकि बहुत बार कुछ लोग अभद्र या आपत्तिजनक बातें भी लिख देते हैं, उन्हें हटाना पड़ता है.
          ब्लाग पर आमतौर पर सभ्य और गम्भीर टिप्पणियाँ ही आती हैं, इसलिए उसका नम्बर देर में ही आ पाता है.
          वैसे असहमति के बिन्दु आपको यों भी लिखने चाहिए, मैं उन पर जवाब दें पाऊँ या न दे पाऊँ, कम से कम दूसरे पाठक तो उन्हें पढ़ेंगे ही.

  • Mohd Mansoor Alam

    नक़वी साहब, बहुत ही ज़बरदस्त! मैं रागदेश के कुछ सबसे पहले पाठकों में से हूँ। आपके लेख बड़े सुलझे हुए और संतुलित होते हैं। किसी ने कहा था कि “दुनिया इस लिए बुरी नहीं है क्योंकि यहाँ अच्छे लोगों की कमी है बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ बुरे लोग सक्रिय हैं।” यह नफरत फैलाने वाले और नफरत का हिस्सा दोनों ही बनने वाले लोग अभी भी बहुत कम हैं। मुट्ठी भर। बस हिंदुस्तान की विरासत को संजोने वाले लोगों को टीम की तरह काम करना होगा। महात्मा फूले और पेरियार को फिर से जीवित करना होगा।

    • qwn

      धन्यवाद मंसूर जी.

  • Shams Tamanna (शम्स तमन्ना)

    नक़वी साहब, मैं हमेशा आपके आलेख को पढता रहा हूँ. ख़ासकर फेसबुक पर आपने शब्दों की शुद्धि की जो मुहिम शुरू की थी उससे मुझे बहुत फायदा हुआ है. सर आप बेबाक लिखते हैं, जो हर किसी को पसंद नहीं आएगा, हो सकता है सच्चाई तल्ख़ लगे और आप निशाने पर आ जाएँ। अपना ख्याल रखियेगा। इस वक़्त मेरे जैसे नौजवानों को आपकी सरबराही की असद ज़रूरत है.

    • qwn

      धन्यवाद शम्स जी.

  • Vishnu Bhatia

    Excellent. If more of us were to think rationally and logically, many of the double-speaking will be out of business giving us lot of relief. I wish the state to be religious-blind. But will it ever be?

    • qwn

      Thank you Vishnu ji.

      • JAI SRE RAM

        सैकड़ो सालों से मैं तन्हा हूँ परेशान हूँ
        मैं कोई गैर नहीं हूँ इसी मुल्क का मुसलमान हूँ।
        अपने पुरखो की वतनपरस्ती (वफादारी) लिए घूम रहा हूँ।
        इसी मुल्क में पैदा होकर अपना वज़ूद ढूंढ रहा हूँ
        सिर्फ चुनावी मोहरा नहीं हूँ,मैं सियासत का हिस्सेदार हूँ
        मैं कोई गैर नहीं हूँ इसी मुल्क का मुसलमान हूँ!!
        देश में दंगे करवाने वाले देशभक्ति हमें सिखाते
        जिसने गांधी की हत्या की देश में उसका मंदिर बनवाते|
        इनकी नज़रो में तो केवल मैं ही बुरा इंसान हूँ
        मैं कोई गैर नहीं हूँ इसी मुल्क का मसलमान हूँ;

        • qwn

          इस कविता के लिए धन्यवाद Jai Sre Ram ji.

          • JAI SRE RAM

            mera naam nadeem he ye to mene rss ke pigo ko dekane ke ley he

          • मोहन कुमार

            यह पिगो वाली भाषा किसी शांति की तरफ आपको नहीं ले जाएगी जै श्री राम जी। जरूरत मरहम की है..किसी को सूअर कहने की नहीं। एक बार विचार कीजिए कि सूअर कहने से कितने सामान्य लोगों को आप अपना दुश्मन बना रहे हैं। धन्यवाद।

          • qwn

            मोहन कुमार जी की बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ और नदीम जी आपके द्वारा pig शब्द इस्तेमाल किये जाने पर मुझे गहरी आपत्ति है.
            आरएसएस की विचारधारा और कार्यों का विरोध अपनी जगह पर है, लेकिन भाषा शालीन और सभ्य होनी ही चाहिए.
            किसी के लिए भी अभद्र भाषा का इस्तेमाल क़तई नहीं किया जाना चाहिए. आप यहाँ जो भी बात करें, अपने जो तर्क रखना चाहें रखें, लेकिन गाली-गलौज कृपया न करें .
            ‘राग देश’ की comment policy (ऊपर मेनू बार में Terms of Use देखें) में स्पष्ट लिखा गया है कि किसी टिप्पणी में अभद्र शब्दावली और गाली-गलौज क़तई स्वीकार्य नहीं है और ऐसी टिप्पणी डिलीट की जा सकती है. हालाँकि फ़िलहाल मैं आपकी टिप्पणी डिलीट नहीं कर रहा हूँ.

  • Rajesh Jindal

    क्या लेखक ने मुद्दे को अच्छी तरह से समझा है ? .. अगर समझा होता तो केवल दादरी पे लेख लिखने की बजाय लेखक ऐसे बहुत सी और घटनाओं पर भी लिखते जिनमे हिन्दू लोगों की मौत हुई थी , मीडिया भी अपने दोगलेपन पर कायम है , वो घटनाओं को हिन्दू और मुस्लिम की नज़र से देखते हैं और जब हिन्दुओं पे कोई जुल्म होता है तो देश की कोई भी पार्टी दिलचस्पी नही लेती उसका सीधा कारण है कि हिन्दू कम ही हिन्दुत्व के नाम पर वोट डालता है पर मुसलमान केवल मजहब के नाम पर ही वोट डालता आया है – और लेखक और दुनिया भर का मीडिया और ब्लोगेर्स इसमे सहयोग करते हैं क्यूंकि उन्हें लोगों को अपने ब्लॉग पर , टीवी पर ले के आना होता है – अगर लेखक चाहेंगे तो मैं ऐसी कम से कम 100 घटनाओं के लिंक भेज सकता हूँ जिनमे हिन्दू लोगों की हत्याएं धर्मान्धता के कारण से हुई परन्तु उनको दादरी में हुई धर्मान्धता की घटना के मुकाबले 1% तवज्जो भी नही दी गयी , दोषी है हमारी मीडिया जो दोगलेपन से वयवहार करती है , और उनके इस दोगलेपन की वजह से देश का बहुसंख्यक समाज कट्टरपंथियों की बात सुनने और मानने की तरफ धीरे धीरे ही सही पर बढ़ने लगा है – दोषी रही है वोट बैंक की राजनीती जिसने मुसलमनो को केवल एक वोट भर बना दिया और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने अपनी रोटी चलाने के लिए ऐसे ही धर्मान्धता को खुलकर बढ़ावा दिया . मीडिया और ब्लोगेर्स को हिन्दू के खिलाफ लिखने से बड़ा फायदा होता है 1- उन्हें कोई हिंसक प्रतिक्रिया का डर नही होता 2- बहुसंख्यक समाज उसमे पढने और कमेंट करने तक की काफी दिलचस्पी लेता है तो स्वतः ही trp बढ़ जाती है – मेरा दावा है हिन्दू समाज कभी भी आक्रामक नही हो सकता क्यूंकि जो लोग चींटी , कुत्ते , गाय , सांप के भोजन की चिंता करते हैं उनमे दया रगों में बहती है – जय हिन्द वन्दे मातरम

    • qwn

      राजेश जी, लेख दादरी के बहाने देश की मौजूदा साम्प्रदायिक स्थिति और उस स्थिति को इस ख़तरनाक़ हालात तक पहुँचाने के कारणों पर है और लेख का निष्कर्ष यह है कि किस तरह हिन्दू-मुसलिम साम्प्रदायिकता ने एक दूसरे को पोषित करने में हाथ बँटाया और कैसे वोट बैंक के कारण तथाकथित सेकुलर राजनीति की कारस्तानियों ने भी दोनों तरह की साम्प्रदायिकताओं को भड़काया, बढ़ाया.
      ‘राग देश’ हर प्रकार के धार्मिक चरमपंथ, कट्टरपंथ और पुरातनपंथ के विरुद्ध है. वेबसाइट पर ‘Mission Statement’ का लिंक क्लिक कर देख सकते हैं.
      इसलामी चरमपंथ के ख़िलाफ़ भी ‘राग देश’ में ख़ूब लिखा गया है, चाहे सऊदी ब्लागर को कोड़े मारने का मामला हो या बांग्लादेश में ब्लागरों की हत्या का मामला हो, आप ‘राग देश’ पर कुछ समय बितायेंगे तो ढूँढ लेंगे.
      मदरसों के मुद्दे पर लिखे गये एक लेख का लिंक यह है: http://raagdesh.com/why-indian-madarsas-resist-modernisation/
      बांग्लादेश में ब्लागरों की हत्या पर लिखे गये लेख का लिंक यह है: http://raagdesh.com/why-secularism-is-most-hated-word-for-all-brands-of-radical-religious-right/

      • JAI SRE RAM

        मुल्क
        में नफ़रत का…तूफान मचा डाला है हर इक इंसान को…..शैतान बना डाला है.
        वतन से प्यार का…दावा न करो तुम मित्रों तुम्हीं ने मुल्क को…शमशान बना
        डाला है शर्म आती नहीं….इंसान को कत्ल करने में बस यूंही पशुओं
        को..भगवान बना डाला है. नफ़रतों की आग में..बस्तियां जलाने वालों राख ने
        तेरी चिता का सामान बना डाला है. लाख बार लानत भेजता हूँ तुम पर अख़लाक़ के
        क़ातिलों। तुंमने हँसते खेलते अख़लाक़ के घर को वीरान बना डाला है।,

        • qwn

          धन्यवाद Jai Sre Ram Ji.

          • JAI SRE RAM

            ye rss wale is mulk ko warwaad kar dena cha

            yete he

  • Rajesh Jindal

    इस घटना का एक पहलु ये भी है -हालाँकि ये उमर अब्दुल्लाह साहब की ऑफिसियल id नही है

  • Kushwaha Shankar

    आज कल हमारी जिंदगी नेताओ के हाथ गिरवी हो चुकी है आप ने ठीक ही लिखा हैनक़वी साहब, बहुत ही ज़बरदस्त! मैं रागदेश के कुछ सबसे पहले पाठकों में से हूँ। आपके लेख बड़े सुलझे हुए और संतुलित होते हैं। किसी ने कहा था कि “दुनिया इस लिए बुरी नहीं है क्योंकि यहाँ अच्छे लोगों की कमी है बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ बुरे लोग सक्रिय हैं।” यह नफरत फैलाने वाले और नफरत का हिस्सा दोनों ही बनने वाले लोग अभी भी बहुत कम हैं। मुट्ठी भर। बस हिंदुस्तान की विरासत को संजोने वाले लोगों को टीम की तरह काम करना होगा। महात्मा फूले और पेरियार को फिर से जीवित करना होगा।

    • qwn

      धन्यवाद कुशवाहा जी. आपने सही कहा. आज यह भी एक बड़ा संकट है कि हम ऐसे समय में रह रहे हैं, जब रास्ता दिखानेवाला कोई महापुरुष हमारे बीच में नहीं है. वरना शायद हालात इतने बुरे न होते.
      फ़िलहाल तो एक ही विकल्प है कि महात्मा फुले हों, पेरियार हों, गाँधी हों, आम्बेडकर हों या और महापुरुष हों, उनके सन्देशों को लोगों के बीच ज़्यादा से ज़्यादा ले जाया जाये.

  • अभिषेक मिश्र

    दोनों ही परिप्रेक्ष्य में संतुलित लेख है। दोनों समुदाय के कुछ स्वार्थी तत्वों के खिलवाड़ और सरकारों की लापरवाही ने ये आग आम घरों तक पहुंचा दी…

    • qwn

      धन्यवाद अभिषेक जी.

  • kushal

    मैंने आपके कई लेख पढ़े हैं आपके लेख अच्छे हैं , आपको धन्यबाद . किन्तु आपने ग़लत लिखा है की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पिछले नब्बे साल से तैयारी कर रहा था की देश के मुसलमानो को वो अपने तरीके से जीना सिखाये .हालाँकि मैं संघ में नहीं हूँ लेकिन संघ के विचारों से भली-भांति परिचित हूँ . संघ ये जानता है की ऐसा कभी नहीं हो सकता जैसा की आपने लेख में लिखा है अतः आपसे निवेदन है कि संघ को और उसकी विचारधारा को भली प्रकार जांच लें . आपने ये भी लिखा कि केंद्र की सरकार चुप है ,अपने ये नहीं लिखा कि राज्य सरकार ज़्यादा दोषी है क्योंकि कार्यवाही उसे करनी है I, जो हुआ है ग़लत हुआ है आपने ये भी नहीं लिखा कि जब दादरी वाले मसले में हमला हुआ तो उनको बचाने का प्रयास करने वाले हिन्दू ही थे आपने बड़ी आसानी से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर सारी ज़िम्मेदारी डाल दी जो ग़लत है .क्या कश्मीर और असम में जो सैकड़ों हिन्दू मारे गए उसके पीछे भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ था यहाँ भी धर्म के आधार पर हिन्दुओं को मौत के घाट उतारा गया था

    • qwn

      टिप्पणी के लिए धन्यवाद कुशल जी.
      लेख को एक बार फिर पढ़ें तो शायद आपको लेख का मंतव्य समझ में आ जायेगा. लेख दादरी की घटना के बहाने देश की साम्प्रदायिक स्थिति का आकलन करता है, न कि उसमें यह ढूँढ़ने की कोशिश है कि दादरी की घटना किसकी विफलता है. घटना की जो पृष्ठभूमि दी गयी है, वह यह बताने के लिए दी गयी है कि एक परिवार जो गाँव में इतने वर्षों से रह रहा है, जिस व्यक्ति का गाँव के सब घरों से रोज़मर्रा का सम्बन्ध हो क्योंकि वह मेकेनिक था और लोग अकसर उसे कुछ न कुछ ठीक करने के लिए बुलाते थे और उसके परिवार की औरतें भी गाँव के बाक़ी परिवारों के रोज़ के सम्पर्क में थीं क्योंकि वे उनके कपड़े सीती थीं, ऐसे घुले-मिले परिवार के ऊपर एक अफ़वाह फैला कर रात में हमला कर दिये जाने का मतलब क्या है? गाँव के हिन्दुओं में ऐसे परिवार के प्रति अचानक ज़हर कैसे भर गया, इसको रेखाँकित करने के लिए घटना की पृष्ठभूमि और विवरण दिया गया था.
      दूसरी बात केन्द्र सरकार की चुप्पी की, तो उसका सन्दर्भ यह है कि केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद से हिन्दू चरमपंथियों की सक्रियता इतनी तेज़ी से बढ़ने के बावजूद केन्द्र की ओर से कभी कोई बयान तक नहीं आया. पुणे में एक मुसलिम साफ़्टवेयर इंजीनियर के मारे जाने से यह सिलसिला शुरु हुआ था. फिर ‘लव जिहाद’ के झूठे आरोपों के ज़रिये देश भर में तनाव फैलाने की कोशिश की गयी, हालाँकि पिछले पन्द्रह महीनों में ऐसा एक भी मामला साबित नहीं हो सका. फिर घर वापसी का शिगूफ़ा छेड़ा गया. फिर रामज़ादे-हरामज़ादे, फिर केन्द्र सरकार के मंत्रियों और बीजेपी के कई सांसदों द्वारा लगातार मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलानेवाले बयान, फिर दक्षिण भारत से लेकर पश्चिम भारत तक हर जगह लेखकों पर हमले, इन सारी घटनाओं से क्या यह स्पष्ट नहीं है कि कैसे देश का माहौल बिगाड़ा जा रहा है और यह काम करनेवाले लोग देश के प्रधानमंत्री की अपनी पार्टी, अपने संघ परिवार के हैं. फिर भी आज तक प्रधानमंत्री या केन्द्र सरकार की ओर से कभी चिन्ता भी न ज़ाहिर की जाये, कभी चेतावनी का एक शब्द भी न बोला जाये, इसका अर्थ क्या है?
      रही बात संघ की, तो उसे मैं कम से कम पिछले 42-43 साल से तो देख ही रहा हूँ. 18 साल की उम्र में ही पत्रकार बन गया था. गुरू गोलवलकर के विचारों से लेकर अब तक संघ की यात्रा अच्छी तरह देखी है. और लेख के साथ मोहन भागवत जी का जो बयान दिया गया है, उसका मंतव्य क्या है? भागवत जी का एक और वीडियो भाषण मैं किसी और लेख में लगा चुका हूँ, जिसमें वह साफ़ कह रहे हैं कि भारत अगले तीस, नहीं तो अधिक से अधिक पचास वर्ष में हिन्दू राष्ट्र बन जायेगा. इसके बाद संघ के बारे में और क्या समझना?
      बहरहाल, इस लेख का मूल विषय यह था कि देश की साम्प्रदायिक स्थिति चिन्ताजनक स्तर तक ख़राब हो गयी है, और इसके लिए हिन्दू साम्प्रदायिकता और मुसलिम साम्प्रदायिकता दोनों ने हमेशा एक-दूसरे की मदद की और सेकुलर दलों ने वोट बैंक के स्वार्थों के कारण लगातार ऐसे काम किये, जिससे दोनों साम्प्रदायिक तत्वों को ख़ूब बढ़ावा मिला. इसी का नतीजा हम आज इस रूप में देख रहे हैं. लेख किसी घटना के सन्दर्भ में ही लिखा जाता है, इसलिए दादरी यहाँ सन्दर्भ है.
      अगर आप मेरे लेख पढ़ते रहे हैं तो आपको मालूम ही होगा कि इसलामी चरमपंथ और कठमुल्लेपन के ख़िलाफ़ मैंने कितना लिखा है.

  • Subodh Jha

    किसी ने ठीक ही कहा था कि “दुनिया इस लिए बुरी नहीं है क्योंकि यहाँ अच्छे लोगों की कमी है बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ बुरे लोग सक्रिय हैं।”

    • qwn

      टिप्पणी के लिए धन्यवाद सुबोध जी.

  • Anil Kumar

    मुस्लिम वोटों के जोर पर कुछ चंद लोगों ने भारतीय लोकतंत्र को बंधक बनाया. सार्थक बहस और विकास की गुनजाईश तो छोड़ो, भ्रस्टाचार (ये मुद्दा हिन्दू मुस्लिम का नहीं हे ना था) पर सारे दलों ने अन्ना को चुनाव में उतर कर संसद में बहस का ज्ञान दिया था. जब समय बदलाव का आया और मुसलमानों को फिर से उन्हीं लोगों की और जाते देख अन्ना समर्थक हिंदु (mostly new voter) भयंकर बीजेपी सपोर्टर हो गया और संघ के विचारों को पढने लगा (संघ को समझने के लिए). गलती राजनीतिक पार्टियों को समझ आ रही हे (कांग्रेश भी बीफ बेन का समर्थन कर रही हे और सपा भी) पर मुसलमान कब समझेगा? इस इस्थि को reverse करना अब बहुत कठिन होगा, मोदी अगर अपने विकास के अभियान में सफल हो गए तो आने वाले दिनों में सामजिक सोहार्द ठीक होगा नहीं तो ये और बिखराव की और जायेगा

    • qwn

      टिप्पणी के लिए धन्यवाद अनिल जी.

    • qwn

      टिप्पणी के लिए धन्यवाद अनिल जी.

  • Surender Negi

    I am agree with your idea that somewhere is went wrong after such years.. but can you answer my some question which i was awaiting for years to ask?
    1. If all problem is with Hindus and fanaticism then why Hindus been so cooperative for those people whom history has clear example of extortion and torcher on hindus. you may be disagree all facts over aurangzeb and akbar but is whole sikh community was wrong who stand up against mugals torturer along with shivaji. Why not Indian syllabus curriculum portrait mend alive period of india is vibrant, why they have been fail to write about takshila and nalanda and how they destroyed? is this not distortion of history.
    2. If RSS and Sangh wants to really dominant the hindu society,… why they been failed from last 65 years constantly after having 92% population. if hindu were really fanatic in nature why they been not turned as ISIS under Hindu RSS. Hindus always been opposed Fanaticism and been part of secular fabric. but Is any when ever seen how much they have face after 1947. Read Wikipedia article ” Massacre in India”.
    3. Media and blogger like you were crying over aklaaq killing on religious bigotry were never raised voice against Kashmir pundit who been killed and exodus in 1990 by 20000 Muslim. I know this news will be troll for next 5 years. but would you address the problem of religious intolerance problem in muslim over cartoon in paris and music given by A R Rahman.
    4. Second all of your blog want to show how religious fabric of india been damaged by dadri , will you mentioned in blog about why Mumbai blast, train blast in kolkatta, west bangal village in past 1 years been looted and being raped. will you explain by your blog.. a population less then 18 Cr have 12 cases of religious fanaticism over 1 case of balance population. what this ratio indicating.
    5. See below image, are you want to tell me we should be keep silence when someone hurt over religois feeling and you can cry when minority been pissed off. where is freedom of religion and expression my dear. sorry you been failed in totality by hiding real issue under dead body of a resanable man who been killed by hindus fanatics cause his who genration were trying to hide disfigure face of their religion from past 1000 years.

    • qwn

      Dear Mr. Negi,
      Thanks for your comments.
      First of all this article is not about Hindu-Muslim Conflict, but it is something else which I concluded in the last para of the article.
      You said that RSS couldn’t achieved its goal in past several years because very dominant majority of Hindus are secular. Yes, it is absolutely correct and no one can deny it.
      And this article precisely tries to track reasons why RSS able to slowly and gradually built its case, has significantly increased its appeal among Hindus and for the first time in my knowledge, gave a timeline of 30 or maximum 50 years to achieve the goal of ‘Hindu Rashtra.’ This confidence was never seen before.
      And why RSS able to grew its influence, it is because of help which it got from Muslim Fundamentalism and Secular parties which always bowed on unjust issues like Shahbano Case. And Congress did crazy things, first it surrendered before Muslim Fundamentalism on Shahbano case and when it realized that it has antagonized Hindus, it falicitated Ram Janambhumi Shilanyas in Ayodhya and ironically both these mistakes of Congress strengthened RSS in a big way. After UPA’s misrule Modi emerged as ‘only hope’ and RSS once again got a golden opportunity to push itself forcefully.
      Therefore the real danger is this.
      Also, I think History doesn’t’ and can’t decide or shape our future. Though History is always subjective and debatable yet it’s evaluation, proof submission, new found facts and revision is a continuous process. But you can never remain grounded in the history. You described Mughal- Sikh enmity, that is true. But you should remember that it was Pakistan who extended all his help to terrorists associated with Khalistan movement and is still continuing the same. Both of them forgot the history.
      My concern is not Hindu-Muslim conflict. That is a minor issue for such a vast country of ours. My concern is that whether RSS going to succeed in achieving its goal of Hindu Rashtra? That would be real dangerous situation and everyone will suffer, including Hindus.

  • आशुतोष गुप्ता

    बहुत ही अच्छी तरह सोच समझ कर सही तस्वीर पेश करने वाला लेख नकवी साहाब ने लिखा है आज हालात ये है कि गैर कानूनी रुप सरकारी जमीन पर जबरस्ती मन्दिर का निमार्ण करने पर अगर विरोध कोई हिन्दू करता है तो अब उसे मुस्लिम बता दिया जाता है/ लेखक के विचार कि धर्म के आधार वाले देशो के हालात क्या होते है बहुत ही अच्छे लगे

    • qwn

      धन्यवाद आशुतोष जी.

  • rahu_1989

    Delhi me kuch din pehle 4 musalman ldko dwara ek hindu ka murder kr diya gya… uska bhi jikra krte sir….

    • qwn

      अब तक की ख़बरों के मुताबिक़ घटना के पीछे कोई साम्प्रदायिक कारण नहीं था, हाँ हत्या के बाद घटना को ज़रूर साम्प्रदायिक रंग देने की विफल कोशिश की गयी.

  • Syed Firoz Zaidi

    सर आपने दादरी कांड के बहाने आज के हालात का सटीक चित्रण किया है। उम्मीद है कि माहौल बेहतर होगा…
    आ मिटा ले दिलों की दूरियां.. तू मेरी ईद मना ले.. मैं तेरी दिवाली मना लूं।

    • qwn

      धन्यवाद फ़िरोज़ जी.

  • abhay upadhyay

    आधुनिका भारतीय इतिहास प्रसिद्ध शिक्षाविद बिपिन चंद्रा ने सांप्रदायिकता का बड़ा अच्छा विश्लेषण करते हुए बताया था कि कैसे तीन चरणों में ये भावना पुष्ट होती है। पहली ये कि धार्मिक रुप से अलग होते हुए भी ये माना जाता है कि अलग अलग धर्म के लोगों की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक हित एक हो सकते हैं। महात्मा गांधी ने भी इसी धार्मिक पहचान को कायम रखते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में इसका इस्तेमाल किया था। लेकिन उसके बाद का कदम घातक हो जाता है। जहां ये माना जाता है कि अलग अलग धार्मिक इकाईयों के राजनीतिक सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक हित अलग अलग होते हैं। और आखिरी चरण वो है जहां माना जाता है कि ये हित न सिर्फ अलग अलग हैं बल्कि एक दूसरे के विरोधी हैं। हम तीसरी अवस्था में कई जगहों पर आ गए हैं और कई जगह पहुंच रहे हैं।
    सर, आपसे एक सवाल करना चाहता हूं और कुछ समझना भी चाहता हूं। मीडिया में खबरें इस तरह से लिखी जा रही हैं फलां नाम के एक मुसलमान ने कुएं में कूदकर गाय को बचाया। जो लोग इसे सांप्रदायिक एकता की मिसाल मानकर खबर लिख रहे हैं क्या वो इस बात को पुष्ट नहीं कर रहे हैं कि मुसलमान एक धार्मिक इकाई के आधार पर तो अलग हैं ही उसके सामाजिक हित भी अलग हैं। क्योंकि इससे लगता है कि मुख्यतया उसका काम गाय को बचाना था नहीं लेकिन उसने बचाकर बहुत बड़ा काम कर दिया। यानी उसका मुसलमान होना क्या हाइलाइट नहीं किया जा रहा है। उसका नाम ही काफी है बताने के लिए कि वो इस्लाम का अनुयायी है। लेकिन उसकी पहचान एक मुसलमान के तौर पर मजबूत की जा रही है। क्या कुएं में कूदने वाले युवक ने सोचा होगा कि वो मुसलमान है, गाय हिंदुओं की ‘माता’ है .. उसको बचाना है। उसने तो सहज ही छलांग लगा दी होगी। तो फिर हम इस घटना को एक अलग पर्सपेक्टिव क्यों देते हैं?

    • qwn

      आप का कहना बिलकुल सही है. हमारे यहाँ मीडिया जाने-अनजाने ऐसी धार्मिक पहचान गढ़ता रहता है, और इस प्रकार लोगों के बीच धार्मिक विभाजन रेखा खींचता रहता है. मसलन मुसलिम पुरुषों की तसवीर हमेशा टोपी पहने ही दिखायी जायेगी, जबकि वास्तविक जीवन में वैसी टोपी पहननेवाले मुसलमानों की संख्या बहुत कम है.
      इसी तरह मुसलिम युवतियों को या तो बुर्क़े में या फिर हिजाब में ही दिखाया जाता है, जबकि ज़्यादातर पढ़ी-लिखी मुसलिम युवतियाँ यह सब नहीं पहनतीं. हाँ, यदि आप मुसलिमों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं में जायेंगे, तब वहाँ ज़रूर ऐसा दिखेगा, क्योंकि उन पर परम्पराओं के पालन का दबाव होता है. लेकिन शहरों में सामान्य तौर पर पढ़ाई-लिखाई, नौकरी आदि में लगी मुसलिम लड़कियों को अलग से पहचाना ही नहीं जा सकता क्योंकि वे पर्दा नहीं करतीं.
      लेकिन हमारे मीडिया में उनकी तीस-चालीस बरस पुरानी छवि अब भी चल रही है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है.

  • kushal

    हिन्दुस्तान एक ऐसा देश है कि बिना जाँच पूरी हुए कथित सेक्युलर (जो वास्तव में सेक्युलर नहीं हैं) अपनी अपनी कहानिया सुनाने शुरू कर देते हैं उसमें हिन्दुस्तान का उन्मादी मीडिया भी शामिल है I गाय के तस्करों ने अभी एक दरोगा(NK त्यागी )को रुड़की रोड पर कुचल कर मार डाला उसके परिवार को ना तो 45 लाख मिले ना ही सेक्युलर मीडिया ने उसे सुर्ख़ियों में दिखाया ना बड़े बड़े नेता उसके यहाँ पहुंचे जैसा अख़लाक़ को हाथों हाथ लिया था ये कैसा सेक्युलरज़म है ?

    • qwn

      अख़लाक़ आज से 27 साल पहले यानी 1988 में पाकिस्तान गया था, न कि सवा साल पहले, जैसी कि अफ़वाह उड़ायी जा रही है. इसी तरह जिस कार की बात कही जा रही है, वह अख़लाक़ के बेटे सरताज को शादी में मिली थी.
      इसी तरह दारोग़ा एन. के. त्यागी के मारे जाने के बारे में भी शरारती तत्व बिलकुल झूठी अफ़वाह फैला रहे हैं. यह दुर्घटना सहारनपुर में छुटमलपुर हाइवे पर 20 सितम्बर को हुई थी. खनन सामग्री से भरे एक बेक़ाबू ट्रक ने ओवरटेक करते हुए उन्हें बुरी तरह कुचल दिया था. स्थानीय अख़बारों में इस पर विस्तार से छपा है.
      सोशल मीडिया पर इस मामले को साम्प्रदायिक रंग देने के आरोप में पुलिस ने एक महिला पर मुक़दमा दर्ज किया है. देखिए यह लिंक: http://abpnews.abplive.in/crime/2015/10/05/article731502.ece/saharanpur-communal-conspirasy-over-cop-death

  • Very touching. It’s high time we should understand the selfish motive of politicos (read ‘Sangh’) and use our brains rather the being a part of brainless mob. Rather than talking our particular religions, we should be human first.
    Very well composed. Thanks for this great post. 🙂

    • qwn

      Thank you Sangeeta ji for appreciation. We all must do our sincere efforts to make people around us understand the reality of this dirty trick.

  • Naqvi ji, it’s very distressing to read about the growing bigotry in India. We need strategies to bring communities to come together in harmony. History is witness that no nation has progressed when communal forces are at work. Narendra Modi and his government need to act to stop all right wing extremists irrespective of their religion or they will find that they will not be able to achieve their economic goals nor will they win the next election with the majority they did this time. It’s also terrible for India’s image. Fact is these things are happening all over the world from America, UK and Europe where discrimination on various lines is still rife to the Middle East and Indonesia. I think it’s because the world today lacks visionary, strong leaders. Narendra Modi seemed to have the strength but his silence is puzzling. If the government shows that miscreants creating communal strife will be punished severely, it will go a long way to show that it will uphold secularism. As you rightly said, we should stop mollifying the minorities as well. There has to be a uniform civil code.

    • qwn

      You very rightly pointed out the core reason of this crisis world over that we today lack visionary and great leaders. There is really a void, a vacuum.

  • A thought provoking post. Maneuvering people in the name of religion has been the game of politicians since times immemorial. We all need to think that why do people fall prey to these gimmicks time and again and get ready to kill their friends and neighbors in the name of religion. There might be some other incentives or threats in place for that to happen.

    • qwn

      The problem is that that most of the people don’t understand the fact that world has made this fantastic advancement due to science and technology and not because of religion. They also fail to note that how they have been used as pawns in politics of religion for centuries. Unfortunate thing is that literacy didn’t liberate us from the hypnotism of religion.

  • सतीश त्रिपाठी

    कमर जी, पहली बार आपके इस पेज पर आया हु? सहमत तो हु आपसे लेकिन इस स्थिति तक महोल खराब करने का, जो मैंने अपने जीवन मे देखा है, अधिक जिम्मेदार मुसलमान हे है॥ उन्हे सुनियोजित ढंग से शिक्षा से दूर रखा गया और वो खुद पढ़ाई लिखाई से दूर रहे। हिन्दू परिवार चाहे कितना भी गरीब हो पेट भर जाने के बाद अपने संतानों की शिक्षा की तरफ ध्यान देता है । कोशिश तो हिन्दुओ को भी शिक्षा से दूर करने की थी लेकिन उन्होने शिक्षा के लिए जद्दोजहद की । इस अशिक्षा और मदरसो की कुशिक्षा कारण मुसलमान पिछड़ा और गरीब है। अपवाद होंगे लेकिन सच्चाई यही है ॥

    हिन्दू कोई एक धर्म नहीं है । हिन्दू कई धर्मो का समूह । क्या मुसलमान इस समूह मे शामिल नहीं हो सकता अपनी रवायतों के साथ । वैसे भी सारी दुनिया हिंदुस्तानी मुसलमान ही कहती है । लेकिन मुसलमान अपनी जड़े अरब या खुरासान मे ढूंद्ते है यही समस्या की जड़ है ।

    RSS का गठन तो बहुत बाद मे हुआ है … ऊससे पहले हिन्दू मुसलमान दंगे नहीं होते थे क्या…??? RSS का गठन ही मुसलमान द्वारा किए जाने वाले ज्यादतियों से हिन्दू लोगो को बचाने के लिए किया गया था। और अब RSS खुद ज्यादती करने लगा ।

    फिर भी आखिरी सच्चाई यही है की हिन्दू पच्चीस करोड़ मुसलमानो को हिन्द
    महासागर मे नहीं फेंक सकते और न ही मुसलमान 100 करोड़ हिन्दुओ को अरब सागर
    मे फेंक सकते है…. रहना हमे साथ ही है चाहे लड़ कर रहे चाहे प्यार से
    रहे।

    ……”””””बहुत कठिन है डगर पनघट की””””” ……

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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