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Apr 11
अब नहीं सोचेंगे, तो कब सोचेंगे?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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हाशिमपुरा की घटना का एक अलग चरित्र है, लेकिन आन्ध्र के शेषाचलम के साथ-साथ मणिपुर, पंजाब और जम्मू-कश्मीर या कहीं भी ऐसी घटनाओं के पीछे पुलिस और सुरक्षा बलों का एक जैसा ही चेहरा बार-बार क्यों नज़र आता है? 1995 में पंजाब में जसवन्त सिंह खालरा ने अमृतसर म्यूनिस्पैलिटी के रिकार्ड खँगाल कर यह भंडाफोड़ किया था कि पुलिस ने हज़ारों लाशों का ख़ुफ़िया तरीक़े से 'अन्तिम संस्कार' किया था. इस भंडाफोड़ के कुछ दिनों बाद ही खालरा की हत्या हो गयी! दस साल बाद छह पुलिसकर्मियों को खालरा की हत्या के आरोप में सज़ा हुई! अन्दाज़ लगा सकते हैं कि उस दौर में 'आतंकवाद के दमन' के नाम पर पंजाब में कितने निर्दोष लोग मारे गये होंगे और खालरा के भंडाफोड़ से पुलिस क्यों इतना परेशान थी कि उन्हें उनके घर से 'उठवा' कर उनकी हत्या करा दी गयी!


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हाशिमपुरा और भी हैं! 1948 से लेकर 2015 तक. कुछ मालूम, कुछ नामालूम! जगहें अलग-अलग हो सकती हैं. वजहें अलग-अलग हो सकती हैं. घटनाएँ अलग-अलग हो सकती हैं. लेकिन चरित्र लगभग एक जैसा. सरकारों का रवैया भी एक जैसा. राजनीतिक गुल-गपाड़ा भी एक जैसा. जाँच और इनसाफ़ की उम्मीदों का हश्र भी लगभग एक जैसा. समय बदला. बदलता रहा. लेकिन 1948 में हैदराबाद से लेकर 1987 में हाशिमपुरा, 2000 में मलोम से लेकर 2015 में शेषाचलम तक इन कहानियों में कुछ नहीं बदला!

बीस क़त्ल, दो कहानियाँ

शेषाचलम के रक्तचन्दन के जंगल की ज़मीन बीस लकड़हारों के ख़ून से लाल हो गयी. लकड़हारे तमिलनाडु के थे. उन्हें मारा आन्ध्र पुलिस की टास्क फ़ोर्स ने. पुलिस की कहानी वही पुरानी है. उसने क़रीब सौ लकड़हारों को रक्तचन्दन के पेड़ काटते देखा, उन्हें चेतावनी दी, तो उन्होंने पत्थरों और दराँतियों से पुलिस पर हमला कर दिया. पुलिस को 'आत्मरक्षा' में गोली चलानी पड़ी! बीस लकड़हारे मारे गये. मौक़े से कुछ कुल्हाड़ियाँ, दराँतियाँ, कारतूसों के कुछ खोखे और चार देसी कट्टे मिले हैं! बताइए पत्थरों और दराँतियों और अगर वाक़ई लकड़हारों के पास देसी कट्टे भी थे, तो भी उनसे पुलिस पर ऐसा क्या जानलेवा हमला हो सकता है कि पुलिस को ऐसा क़त्लेआम करना पड़े? पुलिस और लकड़हारों में यह कथित मुठभेड़ दो जगहों पर हुई. दोनों जगह वही एक कहानी कैसे? और पुलिस की कहानी के उलट एक और कहानी सामने आयी है कि कुछ लकड़हारों को तो पुलिस ने एक बस से पकड़ा था. उनका एक साथी पहचान में आने से बच गया था क्योंकि वह एक महिला के साथ की सीट पर बैठा था.

पुलिस और सुरक्षा बल क्यों करते हैं ऐसा?

ज़ाहिर है कि मामले की जाँच होगी. अदालत बैठेगी. सुनवाई होगी. जाने कितने साल लगेंगे इस सबमें. और फिर किसी को सज़ा मिल पायेगी या नहीं, अपराधियों की शिनाख़्त हो पायेगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता. 28 साल लम्बी हाशिमपुरा की अदालती सुनवाई का अंजाम क्या रहा? यही न कि अपराधियों की शिनाख़्त नहीं हो सकी! तो शेषाचलम में यही कहानी नहीं नहीं दोहरायी जायेगी, कौन कह सकता है? हाशिमपुरा में तो दंगा हुआ था, साम्प्रदायिकता का ज़हर सेना और पीएसी तक भी फैल गया, तो हैरानी नहीं. लेकिन शेषाचलम में तो कोई दंगा नहीं हुआ था. बात महज़ दो राज्यों के बीच थी. एक राज्य के तस्कर, दूसरे राज्य की पुलिस! सच है कि चन्दन की तस्करी के लिए वह इलाक़ा बदनाम है, ख़ूँख़ार चन्दन माफ़िया का वहाँ आतंक है. लेकिन माफ़िया को आतंकित करने के लिए निहत्थे लकड़हारों का क़त्लेआम कैसे जायज़ ठहराया जा सकता है? पुलिस और सुरक्षा बल ऐसा करते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनके ख़िलाफ़ कभी कोई कार्रवाई या तो नहीं होगी, या नहीं हो पायेगी. अकसर सत्ता तंत्र यही कह कर कार्रवाई नहीं होने देता कि इससे पुलिस बलों का मनोबल टूटेगा और वह दंगाइयों, आतंकवादियों, उग्रवादियों और माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ कैसे लड़ पायेंगे? और अगर मजबूरी में मामला अदालतों तक पहुँचा भी तो सालों साल चले जाँच कमीशनों और फिर उसके बाद की अदालती कार्रवाई में गवाह तोड़-मरोड़ कर, सबूत मिटा कर सबको बचा लिया जायेगा! इसलिए यह सिलसिला न कभी रुका है और न कभी रुकेगा, सरकार चाहे कोई हो, सत्ता चाहे किसी राजनीतिक दल के पास हो!

हैदराबाद की रिपोर्ट, जो कभी छपी नहीं

वाक़या 1948 का है. हैदराबाद के भारत में विलय के लिए निज़ाम के ख़िलाफ़ 'पुलिस कार्रवाई' में कुछ ही दिनों के संघर्ष के बाद निज़ाम के रज़ाकारों ने घुटने टेक दिये. यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन निज़ाम के पतन के बाद हैदराबाद और आसपास के ज़िलों से छन-छन कर जो ख़बरें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक पहुँची, उससे वह हैरान रह गये. उन्होंने काँग्रेस के पंडित सुन्दरलाल के नेतृत्व में एक जाँच टीम वहाँ भेजी. टीम की रिपोर्ट के मुताबिक 'पुलिस कार्रवाई' और उसके बाद की घटनाओं में पूरे राज्य में 27 से 40 हज़ार के बीच लोग मारे गये, कई जगहों पर सेना और सुरक्षा बलों के लोगों ने मुसलिम पुरुषों को पकड़-पकड़ कर बाहर निकाला और मौत के घाट उतार दिया. बीबीसी के मुताबिक़ इस रिपोर्ट को कभी प्रकाशित नहीं किया गया. पिछले दिनों कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के इतिहासकार सुनील पुरुषोत्तम ने यह रिपोर्ट ढूँढ कर निकाली, तब यह सब बातें सामने आयीं! हैदराबाद और हाशिमपुरा की घटनाओं का एक अलग चरित्र है, लेकिन शेषाचलम के साथ-साथ मणिपुर, पंजाब और जम्मू-कश्मीर या कहीं भी ऐसी घटनाओं के पीछे पुलिस और सुरक्षा बलों का एक जैसा ही चेहरा बार-बार क्यों नज़र आता है? 1995 में पंजाब में जसवन्त सिंह खालरा ने अमृतसर म्यूनिस्पैलिटी के रिकार्ड खँगाल कर यह भंडाफोड़ किया था कि पुलिस ने हज़ारों लाशों का ख़ुफ़िया तरीक़े से 'अन्तिम संस्कार' किया था. इस भंडाफोड़ के कुछ दिनों बाद ही खालरा की हत्या हो गयी! दस साल बाद छह पुलिसकर्मियों को खालरा की हत्या के आरोप में सज़ा हुई! अन्दाज़ लगा सकते हैं कि उस दौर में 'आतंकवाद के दमन' के नाम पर कितने निर्दोष लोग वहाँ मारे गये होंगे और खालरा के भंडाफोड़ से पुलिस क्यों इतना परेशान थी कि उन्हें उनके घर से 'उठवा' कर उनकी हत्या करा दी गयी!

बस स्टाप पर फ़र्ज़ी मुठभेड़!

इरोम शर्मिला का नाम तो आपने सुना ही होगा. 2000 में मणिपुर के मलोम में एक बस स्टाप पर असम राइफ़ल्स के लोगों ने गोलियाँ चला कर दस निर्दोष लोगों को भून दिया. कहा गया कि यह सुरक्षाबलों और उग्रवादियों के बीच मुठभेड़ थी. बाद में हाइकोर्ट ने पाया कि कोई मुठभेड़ हुई ही नहीं थी. इसी घटना के बाद से इरोम शर्मिला आफ़्स्पा हटाने की माँग को लेकर अब तक संघर्ष कर रही हैं. अभी हफ़्ते भर पहले ही तेलंगाना में पाँच कथित मुसलिम आतंकवादियों को पुलिस ने 'मुठभेड़' में मार डाला. पाँचों को हथकड़ियाँ लगी थीं और वह पुलिस की गाड़ी में ही अदालत ले जाये जा रहे थे. कहा गया कि उन्होंने पुलिस पर हमला कर दिया तो 'आत्मरक्षा' में पुलिस को गोली चलानी पड़ी. इसके पहले सोहराबुद्दीन, तुलसी प्रजापति और इशरतजहाँ मुठभेड़ में पुलिस की कहानी पंक्चर हो चुकी है. इशरतजहाँ मामले में तो सीबीआई ने एक आइबी अफ़सर पर पूरी साज़िश रचने का आरोप लगाया. यह अलग बात है कि अब इन मामलों में 'क्लीन चिट' मिलने लग गयी है. अभी पिछले साल दिल्ली में स्पेशल सेल ने जम्मू-कश्मीर के कथित आतंकवादी लियाक़त शाह को पकड़ कर पूरी फ़र्ज़ी कहानी रची, बाद में एनआइए की जाँच में इसका भंडाफोड़ हो गया.

पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल

ये तमाम घटनाएँ पुलिस की कार्यप्रणाली पर गम्भीर सवाल उठाती हैं. यह सही है कि आतंकवाद, नक्सलवाद, उग्रवाद, दंगाइयों, तस्करों, माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ पुलिस और सुरक्षा बलों को पूरी मुस्तैदी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, उन पर किसी क़िस्म का कोई दबाव नहीं होना चाहिए, उन्हें अपने विवेक के आधार पर और परिस्थितियों के अनुसार तुरन्त फ़ैसले लेने की आज़ादी होनी चाहिए, पुलिस और सुरक्षा बलों का मनोबल ऊँचा रहना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी ज़रूरी है कि फ़ैसले किसी पूर्वग्रह से न लिये जायें, कोई फ़र्ज़ीवाड़ा न किया जाये और इस बुनियादी उसूल का पालन किया जाये कि निर्दोष न मारे जायें और न जानबूझ कर ग़लत आरोपों में फँसाये जायें. बरसों से हम पुलिस सुधारों की बात कर रहे हैं, लेकिन बस बात ही करते रहे हैं. पुलिस का काम क़ानून की रखवाली करना और उसका पालन कराना है. तो उस क़ानून को ख़ुद भी मानने की पुलिस की ज़िम्मेदारी और जवाबदेही भी बनती है. एक न्यूनतम बुनियादी ईमानदारी और जवाबदेही के बिना कोई भी तंत्र सही काम नहीं कर सकता. मानवाधिकार आयोग या इस तरह के दूसरे तमाम उपकरण अब तक बेअसर ही साबित हुए हैं. इस पर हम अब नहीं सोचेंगे, तो कब सोचेंगे?
(लोकमत समाचार, 11 अप्रैल 2015) http://raagdesh.com
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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