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Aug 29
क्यों ‘आरक्षण-मुक्त’ भारत का नारा?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 11 

हार्दिक पटेल का दावा है कि वह दो साल में छह हज़ार 'हिन्दू लड़कियों की रक्षा' कर चुके हैं और इसीलिए अपने साथ पिस्तौल रखते हैं! अब उन्होंने 'आरक्षण-मुक्त' भारत का नारा उछाला है. साफ़ है कि उनके पाटीदार अनामत आन्दोलन का असली मक़सद क्या है?


Demand for Patel Reservation in Gujarat- Raag Desh 290815.jpg
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गुजरात के पाटीदार अनामत आन्दोलन (Patidar Anamat Andolan) के पहले हार्दिक पटेल को कोई नहीं जानता था. हालाँकि वह पिछले दो साल में छह हज़ार हिन्दू लड़कियों की 'रक्षा' कर चुके हैं! ऐसा उनका ख़ुद का ही दावा है! बन्दूक-पिस्तौल का शौक़ हार्दिक के दिल से यों ही नहीं लगा है. वह कहते हैं कि हिन्दू समाज की 'रक्षा' के लिए बन्दूक़-पिस्तौल तो रखनी ही पड़ती है. 'हिन्दू हृदय सम्राट' प्रवीण तोगड़िया भी 'हिन्दू समाज की रक्षा' के काम में जुटे हैं, इसलिए हार्दिक के दिल के नज़दीक हैं! वैसे अपने भाषण में हार्दिक ने नाम महात्मा गाँधी का भी लिया, नीतिश कुमार और चन्द्रबाबू नायडू को भी 'अपना' बताया, लेकिन वह साफ़ कहते हैं कि सरदार पटेल के अलावा सिर्फ़ बालासाहेब ठाकरे ही उनके आदर्श हैं! गुजरात यात्रा के दौरान अरविन्द केजरीवाल की कार भी उन्होंने चलायी, लेकिन अब वह कहते हैं कौन केजरीवाल? आज के नेताओं में बस वह राज ठाकरे को पसन्द करते हैं और उनके साथ मिल कर काम करने को भी तैयार हैं!

Why Patidar Anamat Andolan?

क्यों पाटीदार अनामत आन्दोलन?

परतें खुल रही हैं. धीरे-धीरे! सवालों के जवाब मिल रहे हैं. धीरे-धीरे! कौन हैं हार्दिक पटेल? पाटीदार अनामत आन्दोलन क्या है? क्या उसे वाक़ई पटेलों के लिए आरक्षण चाहिए? या फिर नयी पैकेजिंग में यह आरक्षण-विरोधी आन्दोलन है? क्या गुजरात को अब आरक्षण की प्रयोगशाला बनाने की तैयारी है? क्या यह जातिगत आरक्षण के ढाँचे को ध्वस्त कर आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू कराने की किसी छिपी योजना का हिस्सा है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शुरू से ही जातिगत आरक्षण का विरोधी रहा है और बीजेपी भी 1996 में अपने चुनावी घोषणापत्र में आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात शामिल कर चुकी है. गुजरात सरकार ने भी आन्दोलनकारियों के ख़िलाफ़ कभी कोई कड़ा रुख़ नहीं अपनाया, फिर किसने पुलिस को पटेलों के ख़िलाफ़ ऐसी बर्बर कार्रवाई का हुक्म दिया और क्यों? और वह भी रैली निबट जाने के बाद! आख़िर कौन पटेलों को भड़काये रखना चाहता था? सवाल कई हैं, जवाब आते-आते आयेंगे. कौन है इस आन्दोलन के पीछे?

पटेलों को हिस्से से ज़्यादा मिला!

पटेलों में आरक्षण की माँग अचानक इतनी ज़ोर क्यों पकड़ गयी? आर्थिक-राजनीतिक रूप से पूरे गुजरात पर पटेलों का वर्चस्व है. मुख्यमंत्री पटेल, बाक़ी 23 में से छह मंत्री पटेल, क़रीब चालीस से ज़्यादा विधायक पटेल, लेकिन राज्य की आबादी में पटेलों का हिस्सा क़रीब 15 प्रतिशत ही. इस हिसाब से उन्हें अपने हिस्से से कहीं ज़्यादा मिला. राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि के अलावा कपड़ा, हीरा, फ़ार्मा, शिक्षा, रियल एस्टेट, मूँगफली तेल उद्योग के अलावा लघु और मध्यम उद्योगों में पटेल छाये हुए हैं. फिर उनमें इतना असन्तोष क्यों? वैसे पटेलों की कहानी नरेन्द्र मोदी के उस गुजरात माॅडल की क़लई खोल देती है, जिसमें भारी निवेश तो हुआ, चमक-दमक ख़ूब बढ़ी, बड़े-बड़े उद्योग तो ख़ूब लगे, लेकिन इसमें छोटे-मँझोले उद्योगों, आम काम-धन्धों और खेती आदि उपेक्षित रह गये.

गुजरात के हालात यूपी, बिहार जैसे: हार्दिक पटेल

पटेल मूल रूप से नक़द फ़सलों की खेती में लगे रहे हैं और बड़े भूस्वामियों में सबसे ज़्यादा संख्या पटेलों की है. लेकिन गुजरात में 2012-13 में कृषि विकास दर नकारात्मक या ऋणात्मक -6.96 रही है. फिर जो किसान बहुत बड़े भूस्वामी नहीं थे, उनकी जोत परिवारों में बँटवारे के कारण लगातार छोटी होती गयी, भूगर्भ जल का स्तर भी पिछले कुछ सालों में गुजरात में बेतहाशा गिरा है, सिंचाई के संकट और महँगी होती गयी खेती ने किसानों की कमर तोड़ दी. जिन किसानों के पास बड़ी ज़मीनें और संसाधन थे, उनके लिए भी खेती में पहले जैसा मुनाफ़ा, आकर्षण नहीं रहा. हार्दिक पटेल ने कुछ अख़बारों को दिये इंटरव्यू में कहा कि गाँवों में जाइए, तो पता चलेगा कि गुजरात की हालत भी बिलकुल यूपी, बिहार जैसी ही है और पिछले दस सालों में यहाँ क़रीब नौ हज़ार किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

बन्द उद्योग, बेरोज़गार कारीगर

पटेल व्यापारी छोटे कारोबार, मशीनरी उद्योग और सूरत में हीरा निर्यात और तराशने के काम में भी मुख्य रूप से हैं. इनमें काम करनेवाले भी ज़्यादातर पटेल समुदाय से आते हैं. गुजरात में क़रीब 48 हज़ार छोटी-मँझोली औद्योगिक इकाइयाँ बीमार हैं और इस मामले में राज्य उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे नम्बर पर है. बड़ी-बड़ी कम्पनियों के मैदान में आ जाने के कारण सूरत में हीरा निर्यात और तराशने का धन्धा भी काफ़ी दबाव में है और क़रीब डेढ़ सौ छोटी इकाइयाँ भी बन्द हो चुकी हैं, जिनके दस हज़ार से ज़्यादा पटेल कारीगर छँटनी के शिकार हुए हैं. गुजरात में बरसों तक सरकारी नौकरियों में भर्ती बन्द थी. 2009-10 में यह सिलसिला खुला तो पहले से ओबीसी में आनेवाले काछिया और आँजना पटेलों को आरक्षण का लाभ मिला, लेकिन लेउवा और कडवा पटेलों के युवाओं को सामान्य श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी. इसलिए आरक्षण की ज़रूरत उन्हें शिद्दत से महसूस हुई.

विकास के मौजूदा माॅडल का दोष!

हालाँकि इस सबके बावजूद सच्चाई यह है कि गुजरात सचिवालय से लेकर शिक्षकों, स्वास्थ्य व राजस्व कर्मियों व कई अन्य सरकारी नौकरियों में पटेलों की हिस्सेदारी 30 फ़ीसदी के आसपास है. सरकारी मदद पानेवाले आधे से अधिक शिक्षा संस्थान भी पटेलों के हाथ में हैं. इसके बावजूद उन्हें शिकायत है कि मेडिकल, इंजीनियरिंग या इसी तरह की पढ़ाई में आरक्षण के कारण कम नम्बर पानेवाले छात्र सरकारी शिक्षण संस्थानों में एडमिशन और छात्रवृत्तियाँ पा जाते हैं और सामान्य श्रेणी के 'योग्य' छात्र वंचित रह जाते हैं, जिन्हें निजी कालेजों में पढ़ाई का भारी-भरकम ख़र्च उठाने पर मजबूर होना पड़ता है. इसका एक निष्कर्ष साफ़ है. वह यह कि विकास के मौजूदा माडल में खेती के अनाकर्षक हो जाने, बड़ी कम्पनियों द्वारा छोटे-मँझोले उद्योगों को विस्थापित कर दिये जाने और निजीकरण के कारण शिक्षा का भयावह रूप से महँगा हो जाना मौजूदा आन्दोलन के उभार का एक बड़ा कारण है.

फिर भी पटेल दूसरों से बहुत आगे

लेकिन दूसरी तरफ़, यह भी सच है कि राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक रूप से वह बाक़ी दूसरे सभी वर्गों से बहुत आगे हैं. फिर आरक्षण का यह शोशा क्यों? फिर पिछले कुछ डेढ़ महीने से गुजरात को क्यों मथा जा रहा है? इतना आवेश, इतनी भीड़, इतने संसाधन, कहाँ से और क्यों? इसके पीछे कुछ न कुछ और कारण तो हैं, चाहे वह स्थानीय राजनीति हो, या फिर कोई और गुणा-भाग! पटेलों ने 1985 में ओबीसी आरक्षण के ख़िलाफ़ बड़ा आन्दोलन चलाया था. क्या अब यह उसी आरक्षण-विरोधी आन्दोलन की 'रि-पैकेजिंग' नहीं है, वरना यह ज़िद क्यों कि आरक्षण हमें मिले या फिर किसी को न मिले! और अब तो उन्होंने एक इंटरव्यू में साफ़ कह दिया कि या तो देश को 'आरक्षण-मुक्त' कीजिए या फिर सबको 'आरक्षण का ग़ुलाम' बनाइए. (The Hindu, Click Link to Read) यानी अब यह बिलकुल साफ़ हो चुका है कि पाटीदार अनामत आन्दोलन (Patidar Anamat Andolan) के पीछे असली मक़सद क्या है?

अभी बहुत-से सवालों के जवाब नहीं!

कौन है इस 'आरक्षण-मुक्त' भारत के नारे के पीछे? उसकी मंशा क्या है? अभी फ़िलहाल इन और इन जैसे कई सवालों के जवाब नहीं हैं. हार्दिक पटेल क्या गुजरात के दूसरे मनीष जानी होंगे? दिसम्बर 1973 में अहमदाबाद के एलडी इंजीनियरिंग कालेज से मेस के खाने के बिल में बढ़ोत्तरी के मामले पर मनीषी जानी के नेतृत्व में छात्रों का आन्दोलन शुरू हुआ था, देखते ही देखते संघ के कार्यकर्ता इसमें कूद पड़े और महँगाई और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ 'नवनिर्माण आन्दोलन' शुरू हो गया, जिसकी डोर लेकर बाद में जेपी ने सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा दिया और अन्तत: इन्दिरा सरकार का पतन हो गया. क्या गुजरात के आरक्षण की चिनगारी का इशारा आरक्षण-विरोध को देश भर में फैलाने का है? वरना हार्दिक हिन्दी में भाषण क्यों देते? आख़िर, गूजर, जाट और मराठा आरक्षण के मामले अभी सुलग ही रहे हैं.
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  • Shashi Bhushan Maithani

    मेरा मानना है कि आरक्षण जातिगत आधार पर नहीं दिया जाना चाहिए । यह आर्थिकी के आधार पर दिया जाना चाहिए ।
    आप लोगों को बताना चाहूँगा कि आज हमारे गांव से नई पीढ़ी के लोग कोई भी सरकारी सेवा में नहीं जा रहे हैं कारण साफ़ है आरक्षण ।
    पढ़े लिखे होनहार युवा बेरोजगार घूम रहे हैं और उन्ही के साथ स्कूल में पढ़ा लड़का या लड़की जो पढ़ने में एकदम निखट्टू और नालायक थे जो कभी पासिंग मार्क 33 और 40 के बीच से आगे नहीं बढे उनमे से अधिकांश आज मास्टर , हेडमास्टर, यहाँ तक कि डॉक्टर और इंजिनियर साहब बनकर घूम रहे हैं जबकि हमेशा कक्षा में अब्बल रहने वाले बच्चे गांव की गलियों में तास के पत्ते फेंट रहे हैं। आख़िर कौन है इसके लिए जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ आरक्षण ।
    क्या दोष है हमारा व हमारे बच्चों का ?
    किस बात की सजा हमें दी जा रही ?
    हमें क्यों अलग-थलग किया जा रहा है ?
    हम जानते हैं कि हमारा दोष है क्या ..! हमारा दोष यह है कि हमने श्रवण जाति और ब्राह्मण के घर लिया है ।
    हमारा दोष है कि हमने किसी हरिजन , पिछड़ी जाति या मुसलमान के घर जन्म नहीं लिया है ।

    सच तो यह है कि आज इस देश के अंदर फ़ैल रही इस वैमनस्यता के लिए हमारे नीति निर्धारक सफ़ेदपोश नेता , और संविधान जिम्मेदार हैं ।
    अब कोई कहे कि आप संविधान को गलत कहकर अपमानित कर रहे हो तो बताइएगा कि मैं किस बात के लिए तारीफ़ करूँ ..
    हमारा बच्चा किसी कॉंपिटेशन में भाग लेता है तो उसकी 80% होने के बाबजूद भी उसके जगह 29% वाले को ले लिया जाता है सोचिए क्या बीतती होगी हम पर ।
    और यही कारण है कि हमारे होशियार बच्चे अपने दम पर बैंको से ऋण लेकर स्वयं के बूते आज विदेशों में जाने लगे हैं जहाँ वह अपने अपने क्षेत्र में परचम लहराने की हिम्मत रखते हैं ।
    जिन होनहार बच्चों के साथ उन्हीं के देश में स्पष्ट तौर पर आरक्षण के नाम पर ऐसी गद्दारी की जा रही हो तो वह क्या सोच रखेंगे ..?
    अंत में यही कहूँगा कि आरक्षण जाति का न होकर गरीबी का हो ।
    नहीं तो सरकार पर जातिवाद , क्षेत्रवाद फैलाने का मुकदमा चले ।
    * शशि भूषण मैठाणी ‘पारस’
    देहरादून

    • qwn

      प्रिय मैठाणी जी,
      पिछले कुछ वर्षों में देश में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की संख्या बड़ी तेज़ी से बढ़ी है. शिक्षा संस्थानों की संख्या में भी अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है. लेकिन सरकारी विफलताओं और बजट की बदलती प्राथमिकताओं के कारण शिक्षा के मद में सरकारी ख़र्च की लगातार कटौती और उसकी भरपाई के लिए शिक्षा के निजीकरण ने समस्या को गम्भीर बना दिया. इसके दो ख़राब परिणाम हुए. एक, शिक्षा बेतहाशा महँगी हो गयी. दूसरे, कुछ को छोड़ कर ज़्यादातर निजी विश्वविद्यालयों का उद्देश्य अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाना रहा, इसलिए शिक्षा की गुणवत्ता पर कोई ध्यान दिया नहीं गया. इनसे निकले छात्रों के पास डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन उस स्तर का कौशल और योग्यता नहीं जो नौकरियों की प्रतिस्पर्धा में इन्हें जिता सके. तो निजी नौकरियाँ मिल नहीं पातीं, सरकारी नौकरियों में से आधी आरक्षण के कारण हाथ से निकल जाती हैं. रोज़गार के अवसर सीमित हैं, और उम्मीदवार बहुत ज़्यादा. इसलिए निराशा स्वाभाविक है.
      इसी तरह, जब उच्च शिक्षा के सरकारी संस्थानों में एडमिशन न हो पाने के कारण जब महँगे निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना पड़ता है, तो यह बात अखरती है.
      लेकिन समस्या के दूसरे पहलू को भी देखिए. जिन वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था, क्या उनकी सामाजिक स्थिति आप से बेहतर हो चुकी है? आप या हम, जिस कालोनी में रहते हैं, उनमें दलित और पिछड़े कितने लोग हैं? गिनती करेंगे तो असलियत सामने आ जायेगी. इसी तरह, सड़क पर झाड़ू लगाने का काम केवल एक जाति के लोग क्यों करें? भैंसे पाल कर दूध दुहने का काम केवल एक जाति के लोग क्यों करें?

      • qwn

        इसी तरह, ऐसे बहुत-से काम हैं, जो आज भी एक ही जाति के लोग करते हैं. ज़ाहिर है कि जाति-भेद को हम नहीं तोड़ पाये हैं या यों कहें कि समाज ने उसे पूरा ज़ोर लगा कर बनाये रखा है.
        जातिगत आरक्षण का उद्देश्य दलितों-पिछड़ों का आर्थिक उत्थान तो था ही, साथ ही जातिगत समानता भी हासिल करना था. ये दोनों उद्देश्य अभी अपने लक्ष्य से कोसों-कोस दूर हैं. इसलिए जाति आधारित आरक्षण का फ़िलहाल कोई विकल्प नहीं है.
        हाँ, यह सही है कि सरकारी विफलताओं और निजीकरण की वजह से शिक्षा बेतहाशा महँगी हो गयी है, इसलिए आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को शिक्षा के लिए पर्याप्त सरकारी अनुदान मिलना चाहिए. पाटीदार आन्दोलन के बाद गुजरात सरकार ने इस उपाय पर विचार शुरू किया है और यह सही क़दम है.

  • MKS

    सर,
    आपने हार्दिक पटेल के इस दावे की मज़म्मत क्यों नहीं की कि दो साल में 6000 लड़कियों की सुरक्षा का दावा उन्होंने कैसे किया? दो साल में दिन हुए 730. यानी उन्होंने रोज़ाना 8.2 लड़कियों की ‘रक्षा’ अपनी बन्दूक से की। ये बहुत बड़ा दावा है। ये तभी सही हो सकता है जब हार्दिक अपने साथ ही उन लोगों को भी लेकर चलता हो जो आगे-आगे लड़कियों से छेड़छाड़ करेगा और पीछे-पीछे ये अपनी बन्दूक चमकाकर उन्हें ‘सुरक्षित’ बनाएँगे। विशुद्ध फ़रेबी दावा है ये। ढींग हाँकने की कुछ तो सीमा होनी चाहिए।

    इसके अलावा, अपने लेख में आपने जिन सवालों को उठाया है उनमें से कुछ का जबाव तलाशने की कोशिश मैंने भी अपने लेख में की है। शायद, आपको उनमें कुछ दम दिखे।

    1. ‘हमें भी दो, नहीं तो किसी को नहीं’ का नारा देश में आग लगा देगा
    http://abpnews.abplive.in/author/mukeshkumarsingh/2015/08/27/article697143.ece/truth-behind-the-patel-reservation-protest-in-gujrat

    2. आरक्षण नहीं है असली बीमारी
    http://abpnews.abplive.in/author/mukeshkumarsingh/2015/08/28/article698349.ece/blog_reservation_is_not_real_problem

    • qwn

      प्रिय मुकेश जी,
      हार्दिक का दावा हास्यास्पद है ही और समय व संख्या से कोई भी इसे समझ सकता है. इसीलिए दोनों तथ्य एक साथ दिये गये हैं. इसे देने का एक ही मक़सद था कि पाठक हार्दिक के मनोविज्ञान, उसकी विचार प्रक्रिया के बारे में अन्दाज़ा लगा सकें और उसके बारे में सही समझ बना सकें. असल में मैं बहुत-सी बातें बिना कहे कहने की कोशिश करता हूँ.
      आपके दोनों लेख पढ़े. आप ज़ोरदार लिख रहे हैं. लिखते रहिए.

  • inducares

    Aur baaten chodiye–arakshan to hatna hi chahiye

  • UPENDRA SWAMI

    हार्दिक पटेल की हार्दिक आकांक्षाएं धीरे-धीरे सामने आ ही रही है और इससे उनकी राजनीति की असलियत भी साफ हो रही है, उनको लेकर संदेह तो शुरू से ही था। रविवार को दिल्ली में उन्होंने बोल ही दिया कि भारत तो हिंदू राष्ट्र है और उसमें केवल एपीजे अब्दुल कलाम जैसे मुसलमानों की जगह है। अचानक हार्दिक का उभरना, और फिर इस पैमाने पर जनमत जुटा लेना, उनके गोलमाल से बयान औऱ दस लोगों की जान जाने के बाद अचानक सबकुछ शांत पड़ जाना… कुछ अजीब लगता है। फिर जिसके उस्ताद गोर्धन जडफिया जैसे लोग और आदर्श बाल ठाकरे हों, उसके बारे में किसी संदेह की क्या गुंजाइश रह जाती है। कोई तो नया प्रयोग है जो गुजरात की हिंदुत्व प्रयोगशाला में पक रहा है।

  • Naqvi Saheb, jo dhamki dete hain, use pala nahin padna chahiye. Besides, it’s high time India dismantled its caste based reservation system. Opportunities for the economically challenged is what we need!

  • INDER KRISHEN WALI

    नकवी जी , आपका लेख पढ़कर अच्छा महसूस हुआ .

    हमारे देश मैं जाती आधारित आरक्षण कि विधि को बनाये रखने से देश मैं जातिवाद समाप्त होने के बजाये और ज्यादा उघ्र रूपसे उभर के सामने आया है ..

    पहले जिन जातियों को पहले किसी कार्य विशेष के कारण , अछूता करार का आरक्षण दिया गया था , उनको अब छु कर भी सरकारी कार्यों के लिए , विशेष आरक्षण दिया गया है .

    मतलब यह जातियां पहले भी आरक्षित कार्य कर रही थी और आज भी हमारे राजनितिक भुधिजिवियों कि वजह से आरक्षित कार्य कर रहे हैं .

    देखा जाय तो जो कार्य इनके लिए सुरक्षित थे , उनमें इनकी Expertise/ Speciality थी , लेकिन आज जो कार्यों के लिए इन जातियों को आरक्षण उपलब्द है उनमें इनकी कोई भी Expertise/ Speciality नहीं है .

    मतलब हुआ कि पुराने समाज शास्त्रियों ने जो व्यवस्था बनायीं थी यह जातियां उनके योग्य थी और इससे इन जातियों का समाज को सही योगदान मिलता था .
    लेकिन आज के युग मैं जो व्यवस्था है उसमें समाज को कितना नुकसान हो रहा है यह तो सर्व विधित है .

    इसलिए आजके युग मैं अगर उन आरक्षित जातियों को हमें समाज के प्रति सुयोग्य बनाना है तो सबसे पहले उनके प्रति आरक्षण कि सदियों से चली आ रही प्रथा को पूरी तरह समाप्त करना होगा .

    उनके समाजमें जो गरीब परिवारों के बच्चे हैं उनकी पूरी पढाई का शुल्क माफ़ करना होगा बशर्ते वह उच्च श्रेणी मैं पास होते हैं .
    उनकी ट्रेनिंग भी मुफ्त करनी होगी अगर वह उस योग्य पाए जाते हैं.
    नौकरियां योग्यता के अनुसार ही मिलने चाहिए तभी उनके बच्चे समाज व देश के प्रति समर्पित भाव से अपने अपने कार्यों मैं उन्नति कर सकेंगें .
    तभी उनके प्रति दूसरी जातियों मैं भी इज्ज़त कि भावना पैदा होगी .

  • Gujarat RSS ki prayogshala ban chuka hai, chahe scholon mein Hindutva ki padai ka masla ho, ya alpsankhyakon ko hashiye pe pohchane ki pahal Gujarat ka istemal wo karte rahe hain. Hardik Patel arakshand ko mitane ki pehal ka chehra bankar samne aa rahe hain , lekin aarakshand hatakar koi naya dhancha pichde tabke ko uthane ka nazar nahi aa raha hai

  • Sagar Pundir

    क्या स्वर्ण जाती में गरीब नही होते?
    क्या ठाकुर,त्यागी,शर्मा आदि सब में गरीब नही होते? आप पछले कई दशको से पत्रकारिता के पैसे में है।आज के समय में राजपूतो के रजवाडो का जमीनी स्तर क्या है आपको बखूबी पता होगा।अब कहा रजवाड़े रखे है?ने जाने कितने ही एसे राजपूत और अन्य स्वर्ण जाती के लोग एसे है जो लोगो के यह दिहाड़ी करके अपने परिवार का पेट पालते है।रात को सोने से पहले अगले दिन रोटी मिलेगी या नही इस बात की चिंता सताने लगती है।
    आपको याद होगा हाली में उत्तेर प्रदेश में कुछ चपरासी के पदों पर भर्तिया निकली थी।चपरासी की भर्ती में लाखों युवाओ ने अपनी रूचि दिखाई।उन युवाओ में कुछ एसे भी थे जोकि Phd डिग्री धारक थे।अब मुद्दा यह है की,ऐसा क्या हुआ जो Phd डिग्री धारको को 12वी स्तर की नोकरी लिए रूचि दिखानी पड़ी।महोदये दुर्भाग्य यह है इस देश का की,आरक्षण है वो भी जरूरतमंद को नही।किसी सरकारी नोकरी का फार्म भरने जाते है तो आरक्षित जाती के लिए शुल्क १०० रूपये लगता है तो वही स्वर्ण के लिए ६०० देने होते है।जहा इनका काम ४०% से चलता है वही स्वर्ण लोगो को ७०% पाने के बाद भी अगली नोकरी की रिक्तियों की प्रतीक्षा करते।७०%लाके अगर नोकरी नही मिलती और ४०% वाले को नोकरी मिलती है तो क्या ये दुर्भाग्य नही है?उसके दिल पर क्या गुजरती होगी जिसकी उसने रोजी रोटी छीन ली?

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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