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Jan 30
जाति रे जाति, तू कहाँ से आयी?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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भारत में जाति-व्यवस्था कब शुरू हुई? भारतीय आबादी के जेनॉम अध्ययन के बाद तीन भारतीय विज्ञानियों का मानना है कि यह आज से सत्तर पीढ़ियों पहले यानी क़रीब 1575 साल पहले शुरू हुई! विज्ञानियों के इस निष्कर्ष का आधार क्या है, पढ़िए इस लेख में.


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भारत में जाति कहाँ से आयी? किसकी देन है? बहस बड़ी पुरानी है. और यह बहस भी बड़ी पुरानी है कि आर्य कहाँ से आये? इतिहास खोदिए, तो जवाब के बजाय विवाद मिलता है. सबके अपने-अपने इतिहास हैं, अपने-अपने तर्क और अपने-अपने साक्ष्य और अपने-अपने लक्ष्य! जैसा लक्ष्य, वैसा इतिहास. लेकिन अब मामला दिलचस्प होता जा रहा है. इतिहास के बजाय विज्ञान इन सवालों के जवाब ढूँढने में लगा है. और वह भी प्रामाणिक, साक्ष्य-सिद्ध, अकाट्य और वैज्ञानिक जवाब. हो सकता है कि अगले कुछ बरसों में ये सारे सवाल और विवाद ख़त्म हो जायें. वह दिन ज़्यादा दूर नहीं.

Genomic Study and History of Caste System in India

आर्य बनाम द्रविड़, कौन पहले आया?

मसलन, आर्य कहाँ से आये? आज जो भारत है, उसका मूल निवासी या आदिम रहिवासी कौन था. दुनिया भर के इतिहासकारों की बहुत बड़ी टोली कहती है कि द्रविड़ यहाँ के मूल निवासी थे. आर्य बहुत बाद में बाहर से आ कर बसे. इतिहासकारों की दूसरी छोटी टोली इस अवधारणा को बिलकुल ख़ारिज करती है. वह मानती है कि आर्य यहाँ के मूल निवासी थे, कहीं बाहर से नहीं आये थे. यह दूसरी थ्योरी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की थ्योरी है. क्यों? इसलिए कि अगर यह साबित हो जाये कि आर्य यहाँ बाहर से आ कर बसे, तो भारत को हिन्दू राष्ट्र मानने का उसका आधार ध्वस्त हो जाता है!

जातीय विभाजन: वर्ण व्यवस्था या मुग़लों की देन?

इस विवाद को फ़िलहाल यहीं छोड़ते हैं. अब बात दूसरे सवाल की यानी History of Caste System in India. भारत में जाति कहाँ से आयी और किसकी देन हैं? जाति व्यवस्था कब शुरू हुई? एक पक्ष मानता है कि हिन्दू वर्ण-व्यवस्था ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में मनुष्यों को श्रेष्ठ से हीन तक चार वर्गों में बाँटा और यहीं से छुआछूत, जातिगत भेदभाव और शोषण की शुरुआत हुई. और इसके उलट बिलकुल अभी हाल ही में एक दूसरा पक्ष उभरा है. इसके अपने राजनीतिक लक्ष्य और कारण हैं. अब यह बात फैलाने की कोशिश हो रही है कि हिन्दू समाज में तो जाति-व्यवस्था थी ही नहीं. यह तो मुग़ल शासकों की देन है. हिन्दू समाज को बाँटे बिना मुग़लों के लिए भारत पर शासन कर पाना आसान नहीं था, इसलिए उन्होंने जाति-व्यवस्था को जन्म दिया. हिन्दू धर्म में आयी जाति-व्यवस्था का दोष मुग़लों यानी मुसलमानों पर मढ़ने के पीछे कौन है और इससे वह क्या राजनीतिक फ़ायदा उठाना चाहता है, इसे कौन नहीं जानता!

इतिहास की पड़ताल विज्ञान से!

आपके पास जैसा चश्मा है, वैसा इतिहास देखिए और जिस रंग की स्याही है, वैसा इतिहास लिखिए. लेकिन विज्ञान किसी रंग पर नहीं चलता. स्पष्ट वैज्ञानिक कसौटियों पर चलता है. वह अब इतिहास को भी प्रयोगशालाओं में परख रहा है, और तय कर रहा है कि इतिहास की उम्र कितनी है, वह सच है या मिथ है, और जैसा कहा या माना जाता है, वह कभी हुआ भी था या नहीं!

3 Indian Scientists dig deeper in Genome wide data to find out History of Caste System in India

भारतीय विज्ञानियों का जेनॉम अध्ययन

भारत में जातियाँ कैसे बनीं? अभी इसी हफ़्ते 25 जनवरी को अमेरिका के प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल 'प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइन्सेज़' (Proceedings of the National Academy of Sciences) में एक दिलचस्प वैज्ञानिक अध्ययन आया है. यह अध्य्यन पश्चिम बंगाल के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ बॉयोमेडिकल जेनॉमिक्स (National Institute of Biomedical Genomics) के विज्ञानियों पार्थ पी. मजूमदार (Partha P. Majumdar) अनल आभा बसु (Analabha Basu) और नीता सरकार-रॉय (Neeta Sarkar-Roy) की टीम ने किया है. उन्होंने विभिन्न राज्यों से लिये 18 जाति समूहों के नमूने लेकर भारतीय आबादी के जेनॉम अध्ययन के बाद पाया है कि भारत में जातिगत समाज का जन्म आज से क़रीब सत्तर पीढ़ियों पहले या 1575 साल पहले हिन्दू गुप्त वंश के साम्राज्य में हुआ और यह काल सन् 319-550 (चौथी से छठी शताब्दी) के बीच चन्द्रगुप्त द्वितीय या कुमारगुप्त प्रथम के समय का माना जा सकता है. इस अध्ययन (Genomic reconstruction of the history of extant populations of India reveals five distinct ancestral components and a complex structure) को और विस्तार से पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें.

भारत में पाँच पूर्वज-परम्पराएँ

इन विज्ञानियों के अनुसार भारत में आबादी की पाँच पूर्वज-परम्पराएँ (ancestries) पायी जाती हैं. इनमें से चार मुख्य पूर्वज-परम्पराएँ भारत की मुख्य भूमि पर (four major ancestries in mainland India) पायी जाती हैं, जिनमें 'दक्षिण भारतीय पूर्वज-परम्परा' सबसे पुरानी है और सम्भवत: दक्षिण अफ़्रीका से सात लाख साल पहले जो पहला दक्षिणी प्रवास हुआ था, ये लोग उसी के फलस्वरूप यहाँ आ कर बसे थे. इसके बाद उत्तर पश्चिम और उत्तर-पूर्व से 'उत्तर भारतीय पूर्वज-परम्परा' के लोग यहाँ आकर बसे. इसके अलावा दो और पूर्वज परम्पराएँ तिब्बती-बर्मी और ऑस्ट्रो-एशियाटिक भी यहाँ पायी जाती हैं. अंडमान-निकोबार की एक अलग पूर्वज-परम्परा है.

आबादी में कब रुका जीन्स-मिश्रण का सिलसिला?

जब तक यहाँ जाति-व्यवस्था का आगमन नहीं हुआ था, तब तक सभी प्रकार की पूर्वज-परम्पराओं के लोगों के बीच आपस में शारीरिक सम्बन्ध निर्बाध और लगातार होते रहे. यह बात इस जेनॉम अध्ययन से साफ़-साफ़ प्रमाणित होती है कि अंडमान-निकोबार की पूर्वज-परम्परा समूह को छोड़ कर (जिनमें जरावा और ओंगे जातियाँ आती हैं और जो आज भी बाक़ी आबादी से पूरी तरह कटे हुए हैं) भारत की मुख्यभूमि (Mainland) पर रहने वाले सभी पूर्वज-परम्परा के विभिन्न समूहों में काफ़ी लम्बे समय तक एक-दूसरे के जीन्स का मिश्रण होता रहा, क्योंकि विभिन्न समूहों के स्त्री-पुरुषों के बीच सम्बन्धों की सहज स्वीकार्यता थी. लेकिन क़रीब सोलह सौ साल पहले यह सिलसिला अचानक रुक गया. विज्ञानियों का कहना है कि 'यह वैदिक ब्राह्मणवाद का काल था, जब शक्तिशाली गुप्त वंश के शासन के दौरान हिन्दू धर्मशास्त्रों के आधार पर कड़े नैतिक-सामाजिक नियम बनाये गये और राज्य ने इन्हें लागू किया और इस कारण अपने ही वर्ण या जाति में विवाह की व्यवस्था शुरू हुई.' इसी कारण जीन्स मिश्रण का सिलसिला पहली बार यहाँ थमता दिखा.

दूसरे इलाक़ों तक कब फैली जाति-व्यवस्था?

इन विज्ञानियों का कहना है कि पश्चिम भारत में मराठों में जीन्स-मिश्रण का यह सिलसिला कुछ और आगे तक यानी छठी से आठवीं शती तक चलता पाया जाता है और चालुक्य व राष्ट्रकूट साम्राज्यों की स्थापना के बाद वहाँ भी यह रुक गया यानी इसी दौरान वहाँ भी राज्य की सत्ता के कारण जातिगत पहचान को आधार बना कर सामाजिक समूहों का निर्माण हुआ और विवाह इसी आन्तरिक संरचना के तहत किये जाने का चलन शुरू हुआ. इसी कारण एक समूह से दूसरे समूह में जीन्स के मिश्रण का सिलसिला रुक गया. लेकिन पूर्वी भारत में बंगाली ब्राह्मणों और तिब्बती-बर्मी पूर्वज-परम्परा के समूहों में जीन्स मिश्रण का सिलसिला तो इसके भी आगे यानी आठवीं से बारहवीं शती तक जारी रहा.

फिर पूरे देश में फैल गयी जाति की अवधारणा

साफ़ है कि यह अध्ययन भारत में जाति-व्यवस्था की शुरुआत के रहस्यों को खोलता है. और यह भी बताता है कि जाति की अवधारणा कैसे भारतीय भूभाग के एक हिस्से में शुरू हुई, विकसित हुई, फली-फूली और फिर वहाँ से पहले पश्चिम भारत के मराठों तक फैली और उसके तीन-चार सौ साल बाद भारत के पूर्वी हिस्सों तक फैली और आज के पश्चिम बंगाल व पूर्वोत्तर भारत तक गयी और इस तरह वह पूरे देश की सामाजिक संरचना का आधार बन गयी.

और बड़े रहस्य खोलेंगे जेनॉम अध्ययन!

भारत ही नहीं, बल्कि ऐसे जेनॉम अध्ययन आज दुनिया भर में हो रहे हैं और बड़े पैमाने पर हो रहे हैं. विज्ञानी जेनॉम अध्ययन के सहारे दक्षिण अफ़्रीका से शुरू हुए मनुष्य के पहले प्रवास से लेकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उसके फैलने-बसने और समाजों के निर्माण की कड़ियाँ जोड़ने में लगे हैं. उम्मीद है कि अगले कुछ वर्षों में ऐसे सारे रहस्यों से पर्दा बिलकुल उठ जायेगा कि दुनिया में मनुष्यों की बसावट कहाँ-कहाँ, कब और कैसे हुई, अलग-अलग भाषाओं को बोलनेवाले आपस में कब, कहाँ, कैसे मिले, नस्लें कैसे विकसित हुईँ, और यह भी निर्विवाद रूप से तय हो जायेगा कि आर्य कहाँ से आये थे. धीरज रखिए!
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  • Ashish

    यह रिसर्च भारतीयों के जीनोम पर की गई है, इस रिसर्च में 20 विभिन्न जाति समूहों के कुल 349 विभिन्न व्यक्तियों को सम्मिलित किया गया. इस रिसर्च का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कब-कब, कैसे-कैसे और किस प्रकार से विभिन्न जाति समूहों में एक दूसरे के गुण-सूत्र मिले और कब मिलना बंद हुए, जैसे कि मध्य भारत की गोंड जनजाति और दक्षिण भारत के अय्यर ब्राह्मणों का प्रारंभिक गुण-सूत्र एक होते हुए भी कालांतर में इन समुदायों में इतनी अधिक विभिन्नता कैसे आ गई.

    यह रिसर्च किसी भी प्रकार से आर्य और द्रविड़ थ्योरी को नहीं छूती जैसा कि कमर वहीद नक़वी अपने लेख के पहले पैरा में दिखाने का प्रयास करता है. वैसे भी आर्यों के भारत आगमन की उस मूर्खता पूर्ण थ्योरी को तो पहले ही ध्वस्त किया जा चुका है जिसको इस्लामिक, ईसाई और वामपंथी चाटुकार साहित्यकारों के द्वारा गढ़ा गया था. बेचारे आज तक एक मूलभूत प्रश्न का उत्तर ही नहीं दे सके कि यदि आर्य यूरोप से भारत आए थे तो यूरोप में आर्य संस्कृति की कोई झलक क्यूँ नहीं दिखती, या जिस मार्ग से आर्य भारत आए उस मार्ग पर आर्य संस्कृति की कोई झलक क्यूँ नहीं दिखती.

    यह रिसर्च किसी भी प्रकार से यह भी पड़ताल नहीं करती ना ही दावा करती है कि छुआछूत, जातिगत भेदभाव और शोषण की शुरुआत कब हुई जैसा कि कमर वहीद नक़वी अपने लेख के दूसरे पैरा में दिखाने का प्रयास करता है.

    यह तो सभी जानते हैं कि भारत की वर्ण-व्यवस्था हज़ारों साल पुरानी है लेकिन उसमें कभी भी छुआछूत, भेदभाव या शोषण की व्यवस्था नहीं थी(वाल्मीकिजी के द्वारा रामायण लिखा जाना, श्रीरामजी की निषाद जाति, वानर जाति और द्रविड़ जाति के लोगों से मित्रता, रावण का ब्राह्मण होते हुए भी स्वयं को द्रविड़ मानना, यादव कृष्णा की ब्राह्मण सुदामा से मित्रता और दोनों का एक ही आश्रम में शिक्षा लेना, विदुषी गार्गी के द्वारा ब्राह्मणों की भारी सभा को शास्त्रार्थ की चुनौती देना और सभासदों के द्वारा उसका समर्थन किया जाना ). यह व्यवस्था तो मुसलमानों के आने के बाद उनके इस्लामिक सिद्धांतों जैसे कि सेक्स-गुलाम, युद्ध बंदी, मानव की खरीदी-बिक्री, पराजित जनता के साथ दासों सा व्यवहार इत्यादि के साथ शुरू हुई.

    मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि कमर वहीद नक़वी ने स्वयं यह रिसर्च पेपर नहीं पढ़ा है बल्कि किसी से सुन कर या किसी और का लेख पढ़ कर उसमें से अपने मतलब की बातें निकाल कर हिंदुओं पर छींटा-कशी करने का एक और मौका ढूँढ निकाला है.

    • qwn

      क्या आपने इस रिसर्च पेपर को पढ़ने का कष्ट किया है, जिसका लिंक मैंने अपने लेख में दिया है. वैसे इस पेपर के इन अंशों को ही पढ़ लें: “We have provided evidence that gene flow ended abruptly with the defining imposition of some social values and norms. The reign of the ardent Hindu Gupta rulers, known as the age of Vedic Brahminism, was marked by strictures laid down in Dharmasastra—the ancient compendium of moral laws and principles for religious duty and righteous conduct to be followed by a Hindu—and enforced through the powerful state machinery of a developing political economy (15). These strictures and enforcements resulted in a shift to endogamy. The evidence of more recent admixture among the Maratha (MRT) is in agreement with the known history of the post-Gupta Chalukya (543–753 CE) and the Rashtrakuta empires (753–982 CE) of western India, which established a clan of warriors (Kshatriyas) drawn from the local peasantry (15). In eastern and northeastern India, populations such as the West Bengal Brahmins (WBR) and the TB populations continued to admix until the emergence of the Buddhist Pala dynasty during the 8th to 12th centuries CE.”

      मैंने कहीं नहीं कहा है कि यह रिसर्च जातिगत आधार पर शोषण या उत्पीड़न की पड़ताल करती है. यह अर्थ आपने निकला होगा. मैंने इस रिसर्च का केवल यही मंतव्य उद्धृत किया है कि “गुप्त वंश के शासनकाल में अपनी जाति या वर्ण में विवाह की व्यवस्था लागू हुई” और इससे मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि अन्ततः राज्य की सत्ता के कारण जातिगत पहचान को आधार बना कर सामाजिक समूहों का निर्माण हुआ.
      स्पष्ट है कि अपने ही वर्ण -समूह में विवाह की व्यवस्था ने आगे चल कर जाति -व्यवस्था का रूप लिया. लेकिन कोई वैज्ञानिक रिसर्च यह बात तो नहीं कह सकती. वह तो यही बता सकती है कि जो गुण-सूत्र मिश्रण सामान्य तौर पर विभिन्न समूहों में हो रहा था, वह कब रुक गया? क्यों रुका? इसके कारण इतिहास में मिलेंगे, जिसका उल्लेख इस रिसर्च ने किया है.
      आर्य-द्रविड़ विवाद इस रिसर्च का विषय था ही नहीं, और न मैंने उसे इस रिसर्च से जोड़ा है. मैंने उस विवाद और उसकी पृष्ठभूमि का उल्लेख किया है और यह कहा है कि (लेख का अंतिम पैरा देखिए) दुनिया भर में इस पर व्यापक रिसर्च हो रही है कि दक्षिण अफ्रीका से चल कर मानव दुनिया में कहाँ-कहाँ और कैसे बसा और आनेवाले कुछ वर्षों बाद इस विवाद का अन्त हो जायेगा कि आर्य कहाँ से आये थे.

      • Ashish

        मुझे पता था कि आपकी तरफ से कोई ना कोई कुतर्क अवश्य आएगा, इसलिए मैने आपके लेख से पेराग्राफ नंबर भी दिया था. अपने लेख का पहला हिस्सा फिर से पढ़िए, उसमें छिपा हुआ मंतव्य स्पष्ट दिख रहा है :-

        १. इतिहासकारों की दूसरी छोटी टोली……राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की थ्योरी है……हिन्दू राष्ट्र मानने का उसका आधार ध्वस्त हो जाता है!

        २. एक पक्ष मानता है कि…….और इसके उलट……हिन्दू धर्म में आयी जाति-व्यवस्था का दोष मुग़लों यानी मुसलमानों पर मढ़ने के पीछे कौन है और इससे वह क्या राजनीतिक फ़ायदा उठाना चाहता है, इसे कौन नहीं जानता!

        इस रिसर्च का आरएसएस या छुआछूत को लेकर हिंदू-मुस्लिम के तर्क-कुतर्क से कोई लेना देना नहीं है, यह रिसर्च विशुद्ध रूप से गुण-सूत्र के विकास, बिखराव और संकुचन का अध्ययन करती है जिसका उदाहरण मैने इसी रिसर्च पेपर को पढ़ने के बाद मेरी टिप्पणी में दिया भी है. लेकिन इसी रिसर्च पेपर पर आधारित आपके लेख में आरएसएस और मुसलमान किधर से आ गये, यह भी अपने आप में एक रिसर्च का विषय हो सकता है…

        • qwn

          क्षमा कीजिएगा आशीष जी, कुतर्क मैं नहीं, आप कर रहे हैं. जो पैरा आप नम्बर सहित उद्धरित कर रहे हैं, वह स्पष्ट है कि मेरे ही लिखे हुए हैं और लेख का अंश है. लेकिन मैंने अपने पहले उत्तर में भी यह कहा है कि वह बातें इस बात को स्पष्ट करने के लिए लिखी गयी हैं कि जाति-व्यवस्था और आर्यों के भारत के मूल निवासी होने या बाहर से आ कर यहाँ बसने को लेकर विवाद हैं और इन दोनों विवादों के दो पक्ष हैं, जिनमें से एक पक्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है. यह पृष्ठभूमि है, इसका इस वैज्ञानिक रिसर्च से क्या लेना-देना? मैंने अपने उत्तर में इसे स्पष्ट किया है. अब बात आपको न समझ में आये या आप न ही समझना चाहें, तो क्या किया जा सकता है.
          बहरहाल, जैसा मैंने लिखा है इस तरह के विवादों की उम्र ज़्यादा बची नहीं है और शायद अगले दस वर्षों में विज्ञान अपना अकाट्य निर्णय सुना ही देगा. तो इन्तज़ार करते हैं.

          • Ashish

            हास्यास्पद…! आपके लेख की पृष्ठभूमि में संघ का विरोध स्पष्ट दिखता है लेकिन आप यह स्वीकार करने से कतरा रहे हो कि आपने इस रिसर्च के आँकड़ों को संघ का विरोध करने के लिए या मुगलों का पक्ष रखने के लिए उपयोग किया.

            अगर आप कह रहे हैं कि ऐसे विवाद शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगे, तो इस बात से कौन मना कर सकता है. बल्कि मेरे विचार से यह विवाद जितनी जल्दी ख़त्म हों उतना ही अच्छा. वैसे तो इन सब बातों का कोई अर्थ बचा भी नहीं है कि कौन किधर से आया और कौन किधर जाएगा या कि वर्ण-व्यवस्था कब और कैसे जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई.

            हमारी आपत्ति भी आपके शेष लेख को लेकर नही है अपितु मात्र प्रथम भाग को लेकर है जिधर आपने इस रिसर्च के संभावित परिणामों को अपने निजी पूर्वाग्रहों को पोषित करने के लिए प्रयोग करने का प्रयास किया.

            आप इस रिसर्च को गंभीरता से पढ़िए, यह रिसर्च अपने परिणाम के कारण नहीं बल्कि उद्देश्य के कारण महत्वपूर्ण है. यह रिसर्च विश्वभर में की जा रही खोज की एक कड़ी है जिसके द्वारा यह पता लग जाएगा कि आख़िर प्रथम मानव इस पृथ्वी पर कब और कैसे जन्मा, मानव के पहले पृथ्वी पर क्या था और प्रथम जीव की उत्पत्ति कब और कैसे हुई. एक समय ऐसा भी आएगा जब इस प्रकार की रिसर्च ईश्वर के अस्तित्व को भी चुनौती देगी. इस रिसर्च को संघ या वामपंथ की आर्य-द्रविड़ थ्योरी से जोड़कर या छुआछूत की शुरआत मुगलों ने की या नहीं, इत्यादि कारणों से जोड़ कर हम इसका नुकसान ही करेंगे. यह भी बहुत संभव है कि हमारी मूर्खता के परिणामस्वरूप भविष्य की कोई सरकार, राजनैतिक या सामाजिक कारणों से इस रिसर्च की ग्रांट ही समाप्त कर दे या वैज्ञानिकों पर पूर्वाग्रह का आरोप लगा दे.

    • kushal

      sahaee kaha Asish ji

  • Naqvi ji, from the literature I have read, it is highly likely that it is the Indus Valley people who migrated eastwards to settle on the banks of the Ganges and were later labelled as Aryans. As for India’s original inhabitants, a worldwide genome study already indicates traces of mixed ancestry everywhere. That’s logical because humans have also been migratory in search of better pastures and answers to questions on what lay beyond their immediate horizon. History has always been hijacked and manipulated by vested interests. Which is why it is critical that education and science be delinked from government and religion. If India is to truly progress, we have to stop looking at the past and instead look to the future. All we do is laud our past (very ancient) achievements. High time we asked ourselves what we are achieving in the here and now to secure the future of India’s children

  • Rajat Singh

    जब जातियां इतने अंतर पैदा करती है, तो उनके इतिहास पर बहस ही क्यों? क्या फर्क पड़ता है कि कौन कहाँ से आया। अगर इस प्रकार इतिहास समाज हित में नहीं तो उसे मनुस्मृति की तरह जला देना चाहिए। आज इन्हीं जातियों को सर्वोच्च साबित करने के लिए पूरा अरब आंतकवाद में जल रहा है। पूरा विश्व शिया , सुन्नी, कुर्दीस, याजीदी के लड़ाई का दंश झेल रहा है।

  • नित्या

    I am currently reading The Evolution of Gods by Dr. Ajay Kansal. I started the book with the intention of scientifically backing up my recent detachment from the concept of God.

    Incidentally in the book, there are chapters explaining evolution of human race and different cultures and religions across the world.
    With all due respect ( I read about your career) – the statement – “इतिहासकारों की दूसरी छोटी टोली……राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की थ्योरी है……हिन्दू राष्ट्र मानने का उसका आधार ध्वस्त हो जाता है!” is very immature.
    I am totally neutral to these religious ideologies but would still say that Arya-Dravid conflict is much older than the existence of RSS. Moreover, Dravids are also majorly Hindus Only. So your assumption in above statement is quite weak.
    Researches till date have majorly supported the theory of – (I quote Lata here) -“Its highly likely that it is the Indus Valley people who migrated eastwards to settle on the banks of the Ganges and were later labelled as Aryans. As for India’s original inhabitants, a worldwide genome study already indicates traces of mixed ancestry everywhere”

    So yeah I agree with you Naqvi Ji, lets wait for proven facts but till then lets refrain from coloring such topics based upon our (probably)personal inclinations.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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