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Jul 09
सीबीआइ की पहली चुनौती है अक्षय का मामला
त्वरित टिप्पणी  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 4 

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पत्रकार अक्षय सिंह की मौत कैसे हुई? क्या वह व्यापम घोटाले के किसी नये सच तक पहुँचने के क़रीब थे? क्या नम्रता दामोर की संदिग्ध मौत की पड़ताल करते-करते अक्षय इस घोटाले के किसी और सिरे तक पहुँचनेवाले थे? इन्दौर में कौन-कौन इस बात को जानता था कि अक्षय वहाँ से झाबुआ जा कर नम्रता दामोर के पिता से मिलने जानेवाले हैं? नम्रता दामोर की मौत की जाँच को लेकर अब तक जो कहानियाँ सामने आयी हैं, उनसे यक़ीनन सवाल उठ रहे हैं और शक गहरा रहा है. तीन डाक्टरों की टीम ने अपनी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा था कि नम्रता की मौत गला घोंटे जाने की वजह से हुई, उसके चेहरे पर नाख़ून की खरोंचों के निशान भी थे. लेकिन यह रिपोर्ट नहीं मानी गयी. मध्य प्रदेश के मेडिको-लीगल इंस्टीट्यूट के निदेशक ने अपनी जाँच में कहा कि यह हत्या नहीं, आत्महत्या का मामला है और अद्भुत फुर्ती दिखाते हुए आनन-फ़ानन में पुलिस ने केस का रुख़ बदल दिया! हालाँकि नम्रता के परिवारवाले इस मामले को हाइकोर्ट तक ले गये थे और वहाँ सुनवाई चल रही थी, और पुलिस वहाँ अपनी रिपोर्ट भी सौंप चुकी है कि ट्रेन से गिर कर नम्रता की मौत हुई, लेकिन यह हत्या थी या आत्महत्या, यह कहा नहीं जा सकता.

कैसे बदला नम्रता दामोर का मामला?

अक्षय इसी मामले की पड़ताल के लिए झाबुआ गये थे. वह नम्रता के पिता के साथ बातें कर रहे थे, तभी अचानक उनकी मौत हो गयी. सवाल है कि अगर अक्षय अपनी रिपोर्ट कर पाते और उसमें कुछ ऐसी बातें सामने आतीं कि पूरे मामले की नये सिरे से तफ़्तीश हुई होती, तो जाँच के घेरे में कौन-कौन लोग आये होते? तो क्या कुछ लोग अक्षय की इस छानबीन से ख़तरा महसूस कर रहे थे कि कहीं नम्रता के मामले में कुछ 'नये रहस्य' तो सामने न आ जायें? उस पर फिर से जाँच न शुरू हो जाये? और अन्ततः कहीं वह 'आत्महत्या' के बजाय हत्या का मामला न साबित हो जाये? नम्रता की लाश 7 जनवरी 2012 को मिली थी. उसकी शिनाख़्त नहीं हुई. तीन डाक्टरों ने 9 जनवरी को पोस्टमार्टम किया और साफ़ कहा कि गला घोंट कर उसे मारा गया है. लाश मिलने के 22 दिन बाद उसकी शिनाख़्त हो पायी. तब पता चला कि मरनेवाली नम्रता है. और फिर 7 फ़रवरी को पुलिस ने भोपाल के मेडिको-लीगल इंस्टीट्यूट के निदेशक डा. डीएस बड़कर की राय ली, उन्होंने फ़ोरेन्सिक जाँच के बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट के निष्कर्षों को ख़ारिज कर दिया और मामला 'हत्या' से बदल कर 'आत्महत्या' का हो गया! ध्यान दें कि मामले में यह बदलाव नम्रता की शिनाख़्त होने के बाद हुआ, पहले नहीं!

क्या कोई अक्षय सिंह से ख़तरा महसूस कर रहा था?

मुझे नहीं पता कि अक्षय सिंह अपनी रिपोर्ट में क्या सवाल उठानेवाले थे? मुझे यह भी नहीं पता कि अक्षय सिंह को कुछ 'नयी जानकारियाँ' हाथ लगी भी थीं या नहीं? मैं व्यक्तिगत रूप से अक्षय सिंह को जानता भी नहीं, कभी उनसे मिला भी नहीं. लेकिन वह नम्रता के मामले की पड़ताल कर रहे थे, इसी से उनकी मौत के कारणों को लेकर शक बढ़ जाता है. यह समझना ज़रूरी है कि नम्रता के मामले में कोई 'नया ख़ुलासा' क्यों बहुत ख़तरनाक था? कई बातें हैं. पहली यही कि शायद जाँच उन लोगों तक पहुँच जाती, जो नम्रता का 'इस्तेमाल' कर रहे थे! वह कौन लोग हैं? शक है कि नम्रता का मेडिकल में दाख़िला ग़लत तरीक़े से हुआ था. उससे पूछताछ शुरू होते ही उसकी मौत हो गयी थी! सवाल यह है कि नम्रता किन लोगों के सम्पर्क में थी, उनके बारे में क्या और कहाँ तक जानती थी? उसके जीवित न रहने से किन लोगों को फ़ायदा होता? और अब तीन साल बाद अगर मामले को लेकर कुछ नये सवाल उठते, तो किन लोगों को परेशानी हो सकती थी? क्या किसी को ख़तरा महसूस हो रहा था कि अक्षय सिंह जाने या अनजाने ही कहीं किसी महत्त्वपूर्ण कड़ी तक न पहुँच जायें? दूसरी बात यह कि नम्रता के मामले में अगर यह साबित हो जाये कि उसकी हत्या हुई थी, तो न केवल उसकी मौत को 'आत्महत्या' सिद्ध करने की पूरी साज़िश का भंडाफोड़ हो जायेगा, बल्कि सरकार, पुलिस और पूरे तंत्र का वह गँठजोड़ भी बेनक़ाब हो जायेगा, जो इसके पीछे था. और अगर नम्रता के मामले में यह साबित हो जाये कि यह वाक़ई हत्या थी, जिसे आत्महत्या साबित करने की साज़िश रची गयी, तो फिर व्यापम घोटाले से जुड़ी हर मौत की नये सिरे से जाँच करनी ही पड़ेगी, चाहे मौत का जो भी कारण बताया गया हो. और अगर इतनी मौतों की जाँच के बाद उनके पीछे कोई साज़िश साबित हो जाये, कितने और कौन-कौन लोग लपेटे में आ जायेंगे, कहा नहीं जा सकता.

विसरा अमेरिका की एफ़बीआइ को भेजिए

बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआइ जाँच हो रही है. सीबीआइ के लिए भी काम आसान नहीं है. कहा जा रहा है कि पिछले दस सालों में व्यापम के ज़रिये हुए दाख़िलों और सरकारी भर्तियों में व्यापक पैमाने पर गड़बड़ियाँ हुईं. लाभान्वितों में कौन नहीं है, नेता, पत्रकार, समाजसेवी, अफ़सर, पुलिस और पूरे के पूरे तंत्र के हर हिस्से में जो भी जिस तरह फ़ायदा उठा सकता था, उसने उठाया है. कौन कहाँ किससे मिला है, कौन कहाँ किसे बचा रहा है, कहा नहीं जा सकता! ऐसे में सच को उजागर कर पाना बहुत कठिन चुनौती है. सीबीआइ को सबसे पहले अक्षय सिंह के मामले को हाथ में लेना ही चाहिए और जल्दी से जल्दी यह जाँच पूरी करनी चाहिए कि अक्षय की मौत कैसे हुई? उसका विसरा अमेरिका में एफ़बीआइ की प्रयोगशाला में भेजा ही जाना चाहिए ताकि जाँच के निष्कर्षों को लेकर किसी प्रकार के सन्देह की गुंजाइश न हो. कुछ मित्र पहले ही यह माँग उठा चुके हैं. हमें मालूम है कि भारतीय प्रयोगशालाओं के पास बहुत-से आधुनिकतम विषों की जाँच के साधन ही नहीं हैं. अगर अक्षय की मौत किसी ऐसे विष से हुई होगी तो भारतीय प्रयोगशालाएँ उसे पकड़ ही नहीं पायेंगी. सुनन्दा पुष्कर का मामला हमारे सामने है. इसलिए रत्ती भर भी सन्देह की कोई गुंजाइश न छोड़ी जाये, यह जाँच की विश्वसनीयता के लिए बहुत ज़रूरी है. अक्षय का मामला भी नम्रता की तरह ही है. अगर अक्षय के मामले में मौत का कारण दिल के दौरे के बजाय कुछ और निकला तो उन सारी मौतों के पीछे साज़िश का शक पुख़्ता हो जायेगा, जिन्हें 'दिल के दौरे' के कारण हुई मौत बताया जा रहा है. ठीक वैसे, जैसे नम्रता के मामले में यदि हत्या साबित हो जाये, तो उन सब मामलों पर सवाल उठेगा ही, जिन्हें अब तक 'आत्महत्या' कह कर दबा दिया गया. सीबीआइ के लिए पहली चुनौती अक्षय का मामला ही है. देश की जनता को सीबीआइ से बड़ी उम्मीदें हैं.
9 जुलाई 2015 http://www.samachar4media.com/
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  • This is getting so murky.

  • Sad state of affairs!

  • i b arora

    पिछले चालीस वर्षों में जिस तरह institutions का हनन हुआ है, cbi कुछ भी कर ले अधिकतर लोगों को उनकी findings पर संदेह रहेगा.

  • inducares

    Excellent post.So many questions.Will CBI do justice?And after how many decades will we know the answer?

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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