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Nov 28
नाप लीजिए, विपक्ष कितने पानी में है?
त्वरित टिप्पणी  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 5 

ऐसा विपक्ष है ही कहाँ, जो 'भारत बन्द' करा सकने का माद्दा रखता हो, जो केन्द्र की किसी नीति के ख़िलाफ़ पूरे देश में सड़कों पर लड़ सकता हो? विपक्ष के नाम पर हमारे पास जो कुछ है, वह बस रंग-बिरंगी पार्टियों का एक टुटहा-फुटहा चितकबरा पलंजर है, जो ज़्यादा से ज़्यादा बस एक काम कर सकता है. संसद में हल्ला मचा सकता है और उसकी कार्रवाई ठप्प करा सकता है, कुछ बिल अटका सकता है. पिछले ढाई बरसों में यह काम उसने बख़ूबी किया है. इससे ज़्यादा की न उसकी औक़ात है और न उससे उम्मीद की जानी चाहिए.


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तिल का ताड़ नहीं, ताड़ का तिल! बात 'भारत बन्द' से शुरू हुई थी, और दो दिन में ही 'आक्रोश दिवस' में बदल गयी. नाप लीजिए कि विपक्ष कितने पानी में है और कहाँ खड़ा है.

नोटबंदी के मसले पर जनता कितनी तकलीफ़ में है, कितने ग़ुस्से में है, है भी या नहीं, 'भारत बन्द' के साथ आयेगी या नहीं, और विपक्ष देश के कितने हिस्सों में 'बन्द' करा पाने की हैसियत रखता है, कहाँ उसकी इतनी ताक़त है, कहाँ उसकी इतनी विश्वसनीयता है कि लोग उसके साथ खड़े हो जायें, इसका हिसाब किसी ने लगाया भी था या फिर यों ही 'भारत बन्द' का जुमला उछाल दिया गया था!

बिहार में नीतीश कुमार बिदक गये, वह तो काफ़ी दिनों से ऐसे सिग्नल दे ही रहे थे. उधर बंगाल में ममता दीदी क्यों लेफ़्ट की हड़ताल का हिस्सा बनें और कर्णाटक, उत्तराखंड और हिमाचल में पहले से ही दुर्दिन की आशंकाओं से ग्रस्त काँग्रेस क्यों 'बन्द' के ग़ुब्बारे के फुस्स हो जाने का एक और ठीकरा अपने सिर फोड़े. यूपी में मुलायम-माया एक पाले में आ ही नहीं सकते. इन राज्यों में नहीं, तो बाक़ी और कहाँ 'बन्द' हो सकता था? कहीं नहीं.

नोटबंदी : विपक्ष में कहाँ है 'भारत बन्द' करा सकने का माद्दा?

तो ऐसा विपक्ष है ही कहाँ, जो 'भारत बन्द' करा सकने का माद्दा रखता हो, जो केन्द्र की किसी नीति के ख़िलाफ़ पूरे देश में सड़कों पर लड़ सकता हो? विपक्ष के नाम पर हमारे पास जो कुछ है, वह बस रंग-बिरंगी पार्टियों का एक टुटहा-फुटहा चितकबरा पलंजर है, जो ज़्यादा से ज़्यादा बस एक काम कर सकता है. संसद में हल्ला मचा सकता है और उसकी कार्यवाही ठप्प करा सकता है, कुछ बिल अटका सकता है. पिछले ढाई बरसों में यह काम उसने बख़ूबी किया है. इससे ज़्यादा की न उसकी औक़ात है और न उससे उम्मीद की जानी चाहिए.

अर्द्धसत्य की तरह हमारे पास है आधा विपक्ष!

जैसे अर्द्धसत्य होता है, वैसे ही हमारे पास आधा विपक्ष है. यानी विपक्ष है भी और नहीं भी. विपक्ष राज्यों में है, लेकिन देश में नहीं है! क्षेत्रीय दल हैं, उनके दमदार क्षत्रप हैं, जो अपने-अपने राज्यों में चुनावी लड़ाइयाँ जीत सकते हैं या किसी और तथाकथित राष्ट्रीय दल को राज्य में घुसने से या बड़ी ताक़त बनने से रोक सकते हैं. इनकी राजनीति शुरू भी चुनावी समीकरणों से होती है और ख़त्म भी उसी पर होती है. इसलिए इनकी रणनीतियाँ भी अलग होती हैं और राजनीति के खूँटे भी अलग होते हैं, कहीं जाति, कहीं क्षेत्रीय अस्मिता, कहीं माटी-मानुस, कहीं क़द्दावर नेता और कहीं किसी 'क्रान्ति' की आस बतर्ज़ अरविन्द केजरीवाल.

तो इन अलग-अलग खूँटों से मिल कर कोई ऐसा विपक्ष बनना अगर असम्भव नहीं, तो भी बड़ा दुर्लभ है, जो राष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसा राजनीतिक विकल्प दे, जो विश्वसनीय भी हो और स्थायी भी. अब तक हुए ऐसे सारे प्रयोग या तो देखते ही देखते कुछ दिनों में ही भरभरा कर ढह गये या फिर यूपीए की तरह चले भी तो गठबन्धन की ब्लैकमेलिंग से उपजे भ्रष्टाचार के ऐतिहासिक कीर्तिस्तम्भों से आख़िर उनकी विश्वसनीयता का कचूमर निकल गया.

आँखों पर अँधोटियाँ , परजीवी मन!

समस्या यही है. राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का कोई विकल्प हमारे पास नहीं है. ले-दे कर काँग्रेस और लेफ़्ट. दोनों ही लिथड़ाती हुई घिसट रही हैं किसी तरह. देश के नक़्शे से लगातार उखड़ती-सिमटती हुई. दोनों ही विरासत से अभिशप्त. एक के सामने परिवार का निकम्मा पगहा न तुड़ा पाने की मजबूरी है, तो दूसरी अपने फफूँदिया चुके विचार के औंधे कुँए में धँसी-फँसी हुई. घोड़ों की आँखों पर अँधोटी बाँधी जाती है कि अग़ल-बग़ल न देखें, सीधी राह चलते जायें. लेकिन इन दोनों ने जाने कौन-सी अँधोटियाँ बाँध रखी हैं कि इन्हें न सीधी राह दिखती है, न टेढ़ी. न यही एहसास है कि दिखना-सुनना सब बन्द हो गया है, आहट तो क्या अब धमाकों से भी शरीर में कोई हलचल नहीं दिखती. जीने की कोई इच्छा-शक्ति इनमें जैसे बची ही न हो. परजीवी हो कर उम्र के जितने दिन कट जायें, कट जाये!

भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा अजूबा है काँग्रेस

लेफ़्ट तो ख़ैर बदलनेवाला नहीं, लेकिन चौदह की हार से भी अविचलित रही काँग्रेस सचमुच आज भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा अजूबा है. देश में ही नहीं, सारी दुनिया में इधर के वर्षों में राजनीति, उसके हथियार, उसके मुहावरे सब कुछ तेज़ी से बदला है. भारत में 2014 में नरेन्द्र मोदी की ऐतिहासिक जीत, ब्रेक्ज़िट और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प को सिंहासन मिलना, इन तीनों लक्ष्यों को कैसे पाया गया, क्या इनके तरीक़ों में एक पैटर्न नहीं दिखता? झूठ या अर्द्धसत्यों या एक ख़ास तरह के मनोवेगों को गढ़ कर किस तरह जनता को (और वह भी अमेरिका-ब्रिटेन जैसी पढ़ी-लिखी समझी जानेवाली जनता को) भेड़ों की तरह एक बाड़े में हाँका जा सकता है, यह आज किसे नहीं दिखता. लेकिन क्या काँग्रेस ने या हमारे यहाँ विपक्ष के किसी भी दल ने इसका कोई नोटिस लिया?

तरह-तरह की लहरें

मोदी लहर पर सवार हो कर जीते थे. ढाई साल में सरकार कोई ऐसा काम नहीं कर सकी, जिससे लहर बनी रहती, चलती रहती. लेकिन उन्होंने लहर मरने नहीं दी. कैसे? मोदी कह लीजिए, बीजेपी कह लीजिए, संघ कह लीजिए, वह तरह-तरह की लहरें बनाते रहे, लगातार बिना रुके. गिरजाघरों पर, लेखकों पर हमले, घर-वापसी, लव जिहाद एक ख़ास क़िस्म की लहर थी, जिसकी परिणति गोरक्षा से होते हुए दादरी के रास्ते हिन्दुत्व को उभारते हुए वाया जेएनयू और भारत माता की जय से उकसाये गये 'राष्ट्रवाद' के रूप में हुई. अपने इसी कौशल से उन्होंने नोटबंदी जैसे मुद्दे पर हुई सरकार की तमाम विफलताओं को 'राष्ट्रहित' के मुलम्मे से ढक दिया और लोगों को 'देश के लिए त्याग' करने के लिए 'कंडीशंड' कर दिया.

उधर काँग्रेस के ख़िलाफ़ 'परसेप्शन युद्ध' कैसे लड़ा गया. काँग्रेस पहले तो 'मुसलिम तुष्टिकरण' करनेवाली 'हिन्दू-विरोधी' सेकुलर पार्टी बनायी गयी, फिर वह 'ऐतिहासिक भ्रष्टाचार की प्रतीक' बनायी गयी और अब वह 'राष्ट्रहित की विरोधी' के तौर पर लीपी जा रही है. बदले में काँग्रेस ने क्या किया. कुछ नहीं. आक्रमण करना तो छोड़िए, उसने अपने बचाव के लिए भी कुछ नहीं किया.

ऊपर के इन दोनों पैराग्राफ़ को फिर पढ़ें. हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद का कन्वर्जेन्स कैसे किया गया, दिखता है न! यह संयोग से नहीं हुआ. सोच कर किया गया है. लेकिन काँग्रेस ने या विपक्ष में किसी ने इसे समझा? और अगर समझा तो इसकी काट के लिए क्या किया? कुछ नहीं.

बिम्बों की राजनीति का युग

यह बिम्बों की राजनीति का युग है. एक प्रधानमंत्री है, जो हर महीने 'मन की बात' करता है, जनता के लिए अकसर भावुक हो जाता है, आँसू छलछला जाते हैं, गला भर्रा उठता है, जब बड़ा हल्ला होता है कि नोटबंदी से लोग कितने परेशान हैं तो प्रधानमंत्री का माँ व्हीलचेयर पर नोट बदलने बैंक चली जाती है. काँग्रेस या विपक्ष में किसी के पास ऐसे कौन-से बिम्ब हैं? और ऐसे बिम्ब क्या अचानक बनते हैं या कोई सोचता है कि इन्हें कैसे गढ़ा जाये. तो काँग्रेस या कोई और ऐसा क्यों नहीं सोच पाता? इसलिए कि उनके दिमाग़ की बत्ती ही अब तक नहीं जली कि पुरानी राजनीति अब म्यूज़ियम की चीज़ हो गयी है.

मूल मुद्दा एक है. कोई राष्ट्रीय विपक्ष है नहीं और जो विपक्ष है, वह नेतृत्वविहीन है. जो क्षेत्रीय दल हैं, ये चीजें तब तक उन्हें कुछ करने पर मजबूर नहीं करेंगी, जब तक विधानसभा चुनावों में उन्हें संकट आता न दिखे. पर राष्ट्रीय राजनीति में तो विपक्ष के नाम पर निल बटे सन्नाटा है. जब तक काँग्रेस अपनी जड़ता नहीं तोड़ती, नयी राजनीति के अनुरूप ख़ुद को नहीं ढालती, तब तक देश में न कोई राष्ट्रीय विपक्ष उभर सकता है और न ही विपक्ष को कोई नेतृत्व मिल सकता है. तब तक मोदी जी जो कहें, वही सही!

(बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए 28 नवम्बर 2016 को लिखी गयी टिप्पणी)

qwnaqvi@raagdesh.com
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  • i b arora

    in my opinion political parties do not have any faith in the parliamentary system. with each passing day parliament is becoming irrelevant, most parties are run like family businesses. or they totally centered on one individual. there is a leadership deficit. no one willingly leaves politics and make space for next generation. things won’t improve till political parties start functioning democratically and we have politicians who have some concern for the people of this country.

    • Amit Misra

      Very relevant and appropriate remarks.

  • Abhijit Ray

    I think opposition has got the game wrong. Despite difficulties, common people by and large has favoured government move. Government has sold a vision of a better India. Many opposition politicians are mired in corruption cases. So their moral posturing is under scanner.

  • Amit Misra

    विपक्ष का अभाव सरकार के लिए गर्व का नहीं बल्कि राष्ट्र-हित और गणतंत्र-हित में चिंता का विषय है ।

    ‘आहट तो क्या अब धमाकों से भी शरीर में कोई हलचल नहीं दिखती’ — अच्छी टिप्पणी है ।

  • Vinashak

    I think you still have a lot of sympathy for Cong whch they do not really deserve…
    Do you think they merely got thrashed because BJP portrayed them as a minority appeasing party (which they actually are… rememeber Shah Bano)? But what about numerous scams and rampant neporism and overall incompetence of UPA 2?

    The fact is that the present NDA govt, while not being stellar, has been much better that the previous one. Of course most people hate Modi for his alleged role in 2002 and so will never appreciate no matter what he does. But the fact is that he is the smartest politican as of now. So, the opposition will keep looking like fools while he unleashes one new plan after another.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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