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Feb 07
चंदे का गोलमाल और दुधारू सर्वेक्षण!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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क्यों राजनीतिक दलों को इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं बनाया जाना चाहिए कि वह जिससे एक रुपये भी चंदा लें, उससे उसके मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, पासपोर्ट की जानकारी या फ़ोटो कापी ज़रूर लें! यह एक आसान-सा क़दम क्यों नहीं उठ सकता?

चुनावी सर्वेक्षण हों, ज़रूर हों लेकिन सर्वेक्षण करने वाली एजेन्सियों के लिए कुछ मानक हों, कहीं उनका पंजीकरण हो, उनके पास मान्यताप्राप्त सेफ़ोलाॅजिस्ट हों, एजेन्सियों द्वारा इकट्ठा किये गये ज़मीनी आँकड़े का आडिट हो, तब जा कर चुनावी सर्वेक्षणों की इजाज़त मिलनी चाहिए.


Delhi Assembly Elections 2015 seeing Dirty Word War- Raag Desh 070215.jpg
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दिल्ली का चुनाव तो घन घनाघन घनघोर होना ही था और वैसा ही हुआ भी. ऐसा न होता तो हैरानी होती. लेकिन हैरानी तो फिर भी हुई! एक नहीं, कई-कई! इतना गंदा चुनाव! गाली देखी, ताली देखी, हाल देखा, बेहाल देखा, चालें देखीं, चालों की धार देखी, आरोपों की बौछार देखीं, तिकड़मों की तलवार देखी, भाषा के घटिया वार देखे, घर के भेदी देखे, चंदे का अजूबा धन्धा देखा, नैतिकता छाप बोतलें देखीं, नसीब वालों को नर्वस भी होते देखा, बाज़ारू जैसे जुमले देखे और चुनावी सर्वेक्षणों का गोरखधन्धा देखा! बहरहाल, अब 10 फ़रवरी को देखेंगे कि दिल्लीवाले अपनी क़िस्मत किसको सौंपते हैं, नसीब वाले को या 'बदनसीब' को?

चंदे का चक्रव्यूह

अब दस तारीख़ को नतीजे चाहे जो भी आयें, अरविन्द केजरीवाल को जो चाहिए था, वह तो हो चुका है. 'आप' को संजीवनी मिल चुकी है. दिल्ली में उनकी सरकार बने या न बने, लेकिन निस्सन्देह 'आप' का पुनर्जन्म तो हो चुका है. वरना दो महीने पहले तक सवाल यही था कि 'आप' न आन्दोलन की रही, न राजनीति की! और 'आप' ने काफ़ी जल्दी यह सीख लिया कि राजनीति भले ही शुरू आन्दोलन से होती हो, लेकिन चलती आन्दोलन से नहीं है. सो साफ़-सुथरी राजनीति की बात करते-करते पार्टी चंदे के चक्रव्यूह में फँस गयी! ठीक है कि चंदा चेक से लिया गया. बिलकुल सही. पैन कार्ड का नम्बर ले लिया. बैंक खाते का नम्बर है. कम्पनी रजिस्टर्ड है. सही है. जानकारी भी अपनी वेबसाइट पर डाल दी. बात छिपानी होती तो वेबसाइट पर क्यों डालते? बिलकुल सही. मान लिया. लेकिन बस एक सवाल का जवाब नहीं मिलता कि जिससे आप पचास-पचास लाख के चंदे ले रहे हों, वह कहाँ रहता है, क्या करता है, उसका दफ़्तर कहाँ है, कुछ आपको पता नहीं हो! भला कैसे? बात बिलकुल हज़म नहीं होती!

यह एक आसान क़दम क्यों नहीं उठता?

बीजेपी और काँग्रेस चंदे को लेकर 'आप' पर पिल तो पड़ीं कि 'आप' बात ईमानदारी और पारदर्शिता की करती है, लेकिन चंदे में कुछ न कुछ गोलमाल तो है! हाँ गोलमाल तो है, लेकिन बीजेपी और काँग्रेस ख़ुद क्यों नहीं बतातीं कि वे पैसे कहाँ से लाती हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने जो हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च किये वह कहाँ से आये थे? कांग्रेस ने भी बीजेपी जितने पैसे तो नहीं, लेकिन फिर भी कम ख़र्च नहीं किया था. और फिर बाक़ी सब की सब पार्टियाँ भी कहाँ से पैसे लाती हैं, किससे कितना चंदा पाती हैं, इस पर कोई जवाब क्यों नहीं देना चाहता? यह बात किससे छिपी है कि राजनीति में कितना काला धन खपता है? पिछले पचास सालों से देश में इस पर चर्चा हो रही है, चिन्ता हो रही है, लेकिन न कोई सरकार, न कोई पार्टी इस पर कुछ करना चाहती है! ख़ास कर बीस हज़ार रुपये से कम के चंदे के बहाने काले धन का जो खेल होता है, उसे क्यों नहीं बन्द किया जाना चाहिए? क्यों राजनीतिक दलों को इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं बनाया जाना चाहिए कि वह जिससे एक रुपये भी राजनीतिक चंदा लें, उससे उसके मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, पासपोर्ट की जानकारी या फ़ोटो कापी ज़रूर लें! यह एक आसान-सा क़दम क्यों नहीं उठ सकता? है कोई जवाब? है कोई बहाना? और अगर सरकार इतना छोटा-सा भी क़दम नहीं उठा सकती तो मतलब साफ़ है कि काले धन को रोकने का उसका कोई इरादा नहीं है, चुनावी सुधारों की उसकी कोई इच्छा नहीं है और राजनीति को साफ़-सुथरा बनाने का उसका कोई इरादा नहीं है!

चुनावी सर्वेक्षणों का घनचक्कर!

और चंदे के बाद चुनावी सर्वेक्षणों का घनचक्कर! ज़्यादातर सर्वेक्षणों ने दिल्ली में 'आप' को बढ़त में दिखाया. कुछ ने कड़ी टक्कर में दिखाया. हाल के किसी चुनाव में बीजेपी को किसी चुनावी सर्वेक्षण से कोई परेशानी नहीं हुई. लेकिन इस बार बीजेपी ज़रूर बड़ी परेशान दिखी. इतनी परेशान दिखी कि प्रधानमंत्री मोदी भी बौखलाये दिखे. सर्वेक्षण अब तक अनुकूल होते थे, तो 'निष्पक्ष' हुआ करते थे, और वही 'निष्पक्ष' एजेन्सियाँ और मीडिया कम्पनियाँ अब 'बाज़ारू' हो गयीं, क्योंकि उनके सर्वेक्षण इस बार बीजेपी की बढ़त नहीं दिखा रहे थे. प्रधानमंत्री जी कुछ चुनावी सर्वेक्षणों को भी बर्दाश्त नहीं कर पाये, हैरानी की बात है! और फिर सर्वेक्षणों की लड़ाई शुरू हुई. कुछ सर्वेक्षण बीजेपी के पक्ष में आ गये. हमारे एक सम्पादक मित्र (ओम थानवी, सम्पादक, जनसत्ता) ने बड़ी रोचक टिप्पणी की, 'अब तक बाज़ारू सर्वेक्षण आ रहे थे, अब दुधारू आने लगे.' और फिर बीजेपी वाले गिनती बताने लगे कि कितने सर्वेक्षण बीजेपी की जीत दिखा रहे हैं. प्रचार ख़त्म होने के ठीक पहले एक और सर्वेक्षण आ गया, जिसमें बीजेपी की भारी जीत दिखायी गयी!

कुल मिला कर दिल्ली के मीडिया में पहली बार चुनावी सर्वेक्षणों का ऐसा तमाशा दिखा. गली- गली, नुक्कड़-नुक्कड़ जाने कहाँ से कितने सर्वेक्षण बाज़ निकल आये. अब तक ऐसी तमाशेबाज़ी की शिकायतें कुछ राज्यों से आती रही थीं. कई क्षेत्रीय दल काफ़ी पहले से ऐसी शिकायतें करते रहे हैं कि बहुत-से चुनावी सर्वेक्षण बिलकुल फ़र्ज़ी होते हैं और किसी पार्टी की जीत दिखाये जाने के लिए किये जाते हैं. चुनावी सर्वेक्षणों पर रोक की माँग अकसर ही उठती रही है. पिछले साल एक टीवी चैनल के स्टिंग आपरेशन ने भी कुछ सर्वेक्षण एजेन्सियों के काम पर सवाल उठाये थे. लेकिन बात आयी-गयी हो गयी. लेकिन इस बार दिल्ली ने बता दिया कि मामला गम्भीर है. और मीडिया की विश्वसनीयता और निष्पक्षता का सीधा सवाल इससे जुड़ा है. चुनावी सर्वेक्षण ग़लत हो सकते हैं, चुनावी नतीजे उनकी भविष्यवाणी के पूरी तरह उलट आ सकते हैं, आते रहे हैं, लेकिन ऐसा होना एक बात है और सर्वेक्षणों के ग़लत हो जाने की ओट लेकर कुछ भी भविष्यवाणी कर देना अलग बात है. चुनावी सर्वेक्षण हों, ज़रूर हों लेकिन सर्वेक्षण करने वाली एजेन्सियों के लिए कुछ मानक हों, कहीं उनका पंजीकरण हो, उनके पास मान्यताप्राप्त सेफ़ोलाॅजिस्ट हों, एजेन्सियों द्वारा इकट्ठा किये गये ज़मीनी आँकड़े का आडिट हो, तब जा कर चुनावी सर्वेक्षणों की इजाज़त मिलनी चाहिए.

नसीब और बदनसीब!

नसीब और बदनसीब! पेट्रोल-डीज़ल के दाम घट गये, इसमें सरकार ने क्या किया? अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में रिकार्ड गिरावट आयी, तो क़ीमतें यहाँ भी कम हो गयीं. और यहाँ तो क़ीमतें बहुत मामूली ही कम हुईं क्योंकि राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए सरकार ने उस पर ड्यूटी बढ़ा दी. फिर सरकार पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें कम करने का क्या श्रेय ले रही है? नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि विपक्ष कहता है कि मोदी नसीब वाले हैं तो नसीब वाले को ही क्यों न चुनो, बदनसीबों को क्यों चुनो?

बाज़ारू और बदनसीब! यह इस चुनाव की 'उपलब्धि' है! मोदी जी को शायद अब भी यह एहसास नहीं है कि वह अब विपक्ष में नहीं हैं, बल्कि देश के प्रधानमंत्री बन चुके हैं. उनसे, उनकी भाषा से एक गरिमा की अपेक्षा है. चुनाव में सरकार अपनी उपलब्धियाँ गिनाती है. ज़रूर गिनाइए. चुनाव में हर पार्टी दूसरी पार्टी पर आरोप लगाती है, नीतियों पर सवाल उठाती है, काम का हिसाब माँगती है, कटघरे में खड़ा करती है, आप को भी पूरा हक़ है ऐसा करने का. लेकिन एक प्रधानमंत्री अगर अगर सच नहीं बोल रहा हो, और चुनाव प्रचार महज़ जुमलेबाज़ी है, उसमें झूठ-सच, अल्लम-ग़ल्लम सब चलता है, यह मान कर कुछ भी बोल रहा हो, किसी को बाज़ारू कहे और किसी को बदनसीब, तो ज़रा अच्छा नहीं लगता! छोटी-सी बात है. उम्मीद है कि मोदी जी और भक्तगण बुरा नहीं मानेंगे!

(लोकमत समाचार, 7 फ़रवरी 2015)
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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