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Nov 12
तो क्या ख़त्म हो जायेगा काला धन?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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नोट बदलने से काला धन ख़त्म हो जायेगा, यह नितान्त बेवक़ूफ़ी भरा विचार है. काला धन मतलब करेन्सी थोड़े ही है. करेन्सी का काम है लेन-देन करना. वह धन नहीं है. करेन्सी में किसी भी समय उतना ही काला धन रह सकता है, जितना लेन-देन के लिए ज़रूरी हो. धन, सफ़ेद हो या काला, सम्पदा के रूप में ही रहता है, जैसे हीरे-जवाहरात, सोना, रियल एस्टेट, फ़ैक्टरियाँ, उद्योग आदि. चाहे देश में रहे या फिर हवाला के ज़रिए बाहर जा कर विदेशी बैंकों में रखा जाये या विदेशी कम्पनियों में लगे, या फिर वह विदेशी संस्थागत निवेशकों के रूप में अपने शेयर बाज़ार में लौट आता है या एफ़डीआइ और निजी इक्विटी के रूप में घरेलू उद्योगों में फिर से खप कर वापस सफ़ेद हो जाता है. और फिर यही काला धन राजनीति में लौटता है, चन्दों के रूप में.


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बस एक महीने पहले ही मैंने 'राग देश' में लिखा था कि कुछ लोग पाँच सौ और हज़ार रुपये के नोटों को रद्द कर देने के बचकाने सुझाव दे रहे हैं (काले धन पर गाल बजाते रहिए, 8 अक्तूबर 2016). मुझे क्या पता था कि सरकार ऐसी बचकानी बात कर भी देगी और उसे काले धन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' और नरेन्द्र मोदी का 'मास्टरस्ट्रोक' बताया जाने लगेगा! और उसे लेकर ऐसा ढिंढोरा पीटा जायेगा, कि जो हुआ, वह अब से पहले कभी नहीं हुआ था, किसी ने ऐसा साहसिक क़दम नहीं उठाया था!

'Surgical Strike' on Black Money : साहसिक क़दम या सिर्फ़ एक ढिंढोरची शोशा?

लेकिन क़दम क्या वाक़ई साहसिक है या सिर्फ़ एक ढिंढोरची शोशा है! नोट बदलने से काला धन ख़त्म हो जायेगा, यह नितान्त बेवक़ूफ़ी भरा विचार है. काला धन मतलब करेन्सी थोड़े ही है. करेन्सी का काम है लेन-देन करना. वह धन नहीं है. करेन्सी में किसी भी समय उतना ही काला धन रह सकता है, जितना लेन-देन के लिए ज़रूरी हो या जब तक कहीं निवेश का मौक़ा न मिले, और धन को करेन्सी के रूप में रखे रहने की मजबूरी हो. अपवाद में कुछ ऐसे लोग ज़रूर हो सकते हैं, जो चाहे अपनी मूर्खता में या किसी सनक में धन को करेन्सी के रूप में रखे रहें! लेकिन क़रीब-क़रीब सारा धन, सफ़ेद हो या काला, सम्पदा के रूप में ही रहता है, जैसे हीरे-जवाहरात, सोना, रियल एस्टेट, फ़ैक्टरियाँ, उद्योग आदि. चाहे देश में रहे या फिर हवाला के ज़रिए बाहर जा कर विदेशी बैंकों में रखा जाये या विदेशी कम्पनियों में लगे, या फिर वह विदेशी संस्थागत निवेशकों के रूप में अपने शेयर बाज़ार में लौट आता है या एफ़डीआइ और निजी इक्विटी के रूप में घरेलू उद्योगों में फिर से खप कर वापस सफ़ेद हो जाता है. और फिर यही काला धन राजनीति में लौटता है, चन्दों के रूप में.

जहाँ 'सर्जिकल स्ट्राइक' कभी नहीं पहुँचती!

काले धन का पूरा साम्राज्य यहीं बनता है, अरबों-खरबों के बड़े-बड़े उद्योगों की दुनिया में और ऐसी किसी 'सर्जिकल स्ट्राइक' की 'रेंज' वहाँ तक होती ही नहीं! इसके बाद दूसरे नम्बर पर काले धन की जो दूसरी बड़ी क़िस्म है, वह रियल एस्टेट में है. इसमें एक तरफ़ बिल्डर हैं, जो नम्बर दो के पैसे लेते हैं और अपने तमाम प्रोजेक्टों में उसे ईंट-गारे में खपा देते हैं. दूसरी तरफ़ होते हैं आम ख़रीदार जो सम्पत्ति की ख़रीद-फ़रोख़्त में काला धन लगाते हैं. तीसरी श्रेणी है उन छोटे-बड़े कारोबारियों और डॉक्टर-वकील जैसे पेशों से जुड़े लोगों की, जो अपनी पूरी आमदनी नहीं घोषित करते और इस तरह अर्थव्यवस्था में काला धन जोड़ते हैं. चौथी श्रेणी है घूस से कमानेवालों की, जो अपनी ऐसी कमाई घोषित ही नहीं कर सकते.

छोटी मछलियाँ ही फँसती हैं!

इसलिए काले धन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' में सिर्फ़ दूसरी, तीसरी और चौथी श्रेणी की ऐसी छोटी मछलियाँ ही फँसती हैं, जो कुछ लाख या कुछ करोड़ की हैसियत वाली होती हैं. बाक़ी सब के पास बच निकलने के तमाम साधन होते हैं. धन-धुलाई में लगी हज़ारों लाखों कम्पनियाँ, फ़र्ज़ी आयात-निर्यात का मकड़जाल, काग़जों पर काली खेती, तरह-तरह के ट्रस्ट, धार्मिक संस्थाएँ और जाने क्या-क्या उपकरण हैं, जहाँ घूम-घाम कर 'बड़ा काला धन' सफ़ेद हो जाता है. तो क्या यह 'सर्जिकल स्ट्राइक' इस सब पर हमला बोलने के लिए है? उत्तर है नहीं.

काली अर्थव्यवस्था की बस चुटकी भर रक़म!

सच यह है कि करेन्सी पर 'वार' कर आप अधिक से अधिक उतने ही काले धन को निशाना बना सकते हैं, जो मुद्रा के तौर पर चलन में है. जैसे अभी तक 14 लाख करोड़ रुपये मूल्य से कुछ ज़्यादा के पाँच सौ और हज़ार के नोट चलन में थे, जो देश की जीडीपी के दस प्रतिशत के बराबर है. अनुमान है कि पाँच सौ और हज़ार के इन नोटों का क़रीब एक चौथाई हिस्सा काला धन है, जो हुआ क़रीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये. यानी जीडीपी का कुल ढाई प्रतिशत. अब इसमें से जो भी काला धन सरकार की पकड़ में आ जाये, वह आ जाये. ज़ाहिर है कि यह समूची काली अर्थव्यवस्था की एक चुटकी भर रक़म ही होगी और इसका ऐसा असर कैसे होगा कि आगे काला धन बनना बन्द हो जाये!

Peep into History : Another two 'Surgical Strikes' on Black Money in India

ज़रा इतिहास में चलते हैं और देखते हैं कि पहले क्या हुआ. देश में इससे पहले दो बार बड़े नोटों पर तथाकथित 'सर्जिकल स्ट्राइक' की जा चुकी है. पहली बार 1946 में एक हज़ार और दस हज़ार रुपये के नोट बन्द किये गये थे. उसके बाद 1978 में मोरारजी देसाई की जनता सरकार ने एक हज़ार, पाँच हज़ार और दस हज़ार के नोट बन्द किये थे. देसाई सरकार में मनमोहन सिंह ही वित्त सचिव थे. मक़सद यही था. काले धन को बाहर निकालना. लेकिन दोनों बार इस मक़सद में कोई कामयाबी नहीं मिल सकी. यह बात ख़ुद वित्त मंत्रालय की 2012 की उस रिपोर्ट (देखिए 3.2 पृष्ठ 12 भाग 1) में दर्ज है, जिसे केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष के नेतृत्व में बनी कमेटी ने पेश की थी. शायद पुराना अनुभव था. इसीलिए मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने तो बड़े नोटों को रद्द करने के सुझावों को उन्होंने कभी गम्भीरता से नहीं लिया.

म्याँमार और श्रीलंका में भी विफल रहा प्रयोग

केवल यहीं क्यों? पड़ोसी म्याँमार में 1964 और 1985 में यही प्रयोग किया गया और नाकामयाबी हाथ लगी. तो वहाँ तीसरी बार फिर 1987 में मुद्रा रद्द कर दी गयी. और जब तीसरी बार यह किया गया तो पुराने बड़े नोटों के बदले में कुछ भी दिया नहीं गया. यानी क़रीब तीन-चौथाई मुद्रा लोगों के हाथ से बिलकुल निकल गयी. लेकिन क्या वहाँ काले धन की समस्या ख़त्म हो गयी? नहीं. बल्कि उससे हुआ यह कि वहाँ के वित्तीय संस्थानों से लोगों का भरोसा उठ गया और पैसा सिर्फ़ ज़मीन और सोने में लगाया जाने लगा. यह स्थिति अर्थव्यवस्था को जड़ कर देती है क्योंकि सोने और ज़मीन में लगे धन का इस्तेमाल किसी उत्पादक काम में तो होता नहीं. तो अर्थव्यवस्था का पहिया कैसे घूमे? श्रीलंका में भी 1970 में ऐसा किया जा चुका है. वहाँ तो सौ और पचास तक के नोट बदल दिए गये थे. लेकिन वह प्रयोग भी विफल ही रहा.

1946, 1978 और 2016

दूसरी बात यह कि 1946 और 1978 में बड़े नोटों को रद्द कर काला धन पकड़ना बहुत आसान होना चाहिए था! क्यों? क्योंकि 1946 कीबात तो छोड़ए, 1978 में भी हज़ार रुपया बड़ी रक़म थी. आम लोगों के लिए तो तब सबसे बड़ा नोट सौ रुपये का ही होता था. पता ही नहीं था कि देश में हज़ार, पाँच हज़ार और दस हज़ार के नोट भी चलते हैं! ऐसे में रद्द किये नोट को बैंक में ले जा कर बदलवाने की जुगत करना आम लोगों के लिए मुमकिन नहीं था. कोई सामान्य आदमी कैसे जवाब दे सकता था कि जो नोट आमतौर पर किसी ने देखा नहीं था, वह उसके पास कहाँ से आया, कैसे आया? तब भी सारी जाँच-पड़ताल, नाम-पते और पूछताछ के बाद ही नोट बदले गये थे. कहते हैं कि तब मौजूद बड़े नोटों में सत्तर करोड़ रुपये मूल्य के नोट वापस बैंक नहीं पहुँचे. मान सकते हैं कि यह काला धन था, जो नष्ट हो गया.

कितना ख़र्च, कितना फ़ायदा?

लेकिन आज तो पाँच सौ और हज़ार के नोट हरेक के पास हैं. तो बैंकों में पुराने नोट जमा करवानेवालों में से यह अलग-थलग कर पाना मुश्किल है कि कौन अपनी घरेलू बचत का धन लेकर बैंक आया है और कौन किसी दूसरे का धन धोने आया है. ढाई लाख रुपये तक की छूट तो ऐसे ही है. बहुत-से लोग ऐसे हैं, ख़ासकर महिलाएँ जिन्होंने कभी खाता नहीं खोला. तो शायद करोड़ों की संख्या में नये खाते भी खुलें. 25 करोड़ तो जन-धन खाते हैं ही. तो इस सबके बाद कितना काला धन पकड़ा जायेगा और कितने बड़े नोट बैंक तक पहुँचने के बजाय नष्ट कर दिये जायेंगे, कहना मुश्किल है. सब कुछ देखते हुए, सरकार के पूरे निगरानी तंत्र को मद्देनज़र रखते हुए भी उम्मीद कम है कि इन नोटों के ज़रिए कोई बहुत ज़्यादा काला धन पकड़ में आ जायगा. और जो धन पकड़ा भी गया, उसके मुक़ाबले इस क़वायद में हुए ख़र्च को देखिए. नये नोट छापने का ख़र्च, उन्हें अगले कुछ दिनों में बैंकों और एटीएम तक ले जाने का ख़र्च, पुराने नोटों को वापस लेने और उन्हें नष्ट करने का ख़र्च. फिर बचेगा क्या?

बड़े नोट बन्द किये, तो क्यों नये बड़े नोट?

फिर सरकार की बात में भी विरोधाभास है. बड़े नोटों से अगर काली कमाई छिपाई जाती है, तो बड़ा नोट बन्द कर सरकार फिर से बड़े नोट जारी ही क्यों कर रही है? ख़ास तौर से दो हज़ार का नोट. हम बताते हैं. छोटे नोट छापना बहुत ही महँगा पड़ता है. अँगरेज़ी के बिज़नेस अख़बार 'मिंट' की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक हज़ार का एक नोट छापने की लागत तीन रुपये सत्रह पैसे आती है और सौ के एक नोट की लागत एक रुपये उन्यासी पैसे. मतलब यह हुआ कि हज़ार रुपये मूल्य के लिए सौ के दस नोट छापने पड़ेंगे, जिनकी लागत सत्रह रुपये नब्बे पैसे पड़ जायेगी. इसलिए सरकार फिर बड़े नोट छाप रही है. हालाँकि उसके पास इसका जवाब नहीं है कि इन नये बड़े नोटों से फिर काला लेन-देन क्यों नहीं होगा?

कैसे रुके काला धन?

काला धन कैसे रुके? एक ही तरीक़ा है कि सारे बड़े लेन-देन बैंकिंग चैनल से या डिजिटल तरीक़े से हों. लेकिन जब देश में सिर्फ़ तीस-बत्तीस प्रतिशत लोगों के पास ही बैंक या पोस्ट ऑफ़िस खाते हों, जब ज़्यादातर ग्रामीण इलाक़े बैंकिंग सुविधाओं और डेबिट- क्रेडिट कार्ड से अछूते हों, बड़े शहरों की भी ज़्यादातर दुकानों पर क्रेडिट-डेबिट कार्ड स्वीकार ही न किया जाते हों, तो ऐसा कैसे हो पायेगा? सरकार कह रही है कि वह नक़दीरहित लेन-देन की तरफ़ बढ़ना चाहती है. तो वह ऐसा क्यों नहीं करती कि ऐसा क़ानून लाये कि कम से कम शहरी क्षेत्र में बीस हज़ार के ऊपर का हर लेन-देन या तो चेक से हो कार्ड से या किसी डिजिटल माध्यम से. कोई दूकानदार चेक अस्वीकार न करे. अब 'आधार' के कारण चेक देने वाले हर आदमी की पहचान और पते का रिकार्ड है, तो फ़र्ज़ी चेक दे देने की घटनाएँ असम्भव बनायी जा सकती हैं.

खेती और राजनीतिक चन्दे पर भी नज़र डालिए!

इसी तरह खेती के ज़रिए आय कर में लाखों-करोड़ों रुपये तक की छूट ली जा रही है. अगर वाक़ई क्रान्तिकारी क़दम उठना है, तो यहाँ उठना चाहिए. एक सीमा तय होनी चाहिए, जिसके ऊपर कृषि आय पर टैक्स लगे. राजनीतिक दल एक रुपये का भी चन्दा आधार कार्ड से लें. तो टैक्स चोरी के ऐसे तमाम तरीक़े जब तक हैं, तब तक काली कमाई छिपाने के आसान रास्ते बने रहेंगे, तो कोई क्यों काली कमाई न करे? फिर जब तक भ्रष्टाचार रहेगा, काला धन भी रहेगा. घूस तो काले पैसे से ही दी जायेगी!

तो सरकार ने अभी जो किया, उससे क्या होगा? सरकार का कहना है कि इससे काले धन के साथ-साथ जाली नोटों और आतंकवाद को मिलनेवाली मदद बन्द होगी. यह बात सही है. जाली नोटों और आतंकवादियों को मदद पर कुछ दिनों के लिए ज़रूर लगाम लगेगी, लेकिन कितने दिन तक? यह सिलसिला फिर क्यों नहीं शुरू होगा?

फ़ायदा किसे होगा?

फिर इसका फ़ायदा किसे होगा? एक तो बैंकों को. सारी मुद्रा बैंकों में वापस लौटेगी. एनपीए और डूबे क़र्ज़ों से जूझ रहे बैंकों में जब यह सारी मुद्रा वापस लौटेगी तो उनकी पूँजी की हालत रातोंरात सुधर जायेगी. सरकार ने अभी बैंकों को तीस हज़ार करोड़ की नयी पूँजी दी है. अब चौदह लाख करोड़ उनके पास वापस पहुँचेगा और उसका बड़ा हिस्सा काफ़ी समय तक उनके पास बना रहेगा, तो उनकी बैलेन्स शीट कैसी दिखेगी, अन्दाज़ लगा लीजिए.

फ़ायदा सरकार को भी होगा. जानकारों का अनुमान है कि जो काला धन पकड़ में आयेगा, उस पर इनकम टैक्स और जुर्माने के तौर पर सरकार को दो हज़ार अरब रुपये तक मिल सकते हैं और इस साल राजकोषीय घाटे में बड़ी कमी आ सकती है.

दूसरा कौन है, जिसे फ़ायदा होगा? वह हैं क्रेडिट कार्ड और डिजिटल भुगतान के लिए ई-वालेट कम्पनियाँ, जिनके बड़े-बड़े विज्ञापन पहले ही दिन से अख़बारों में छपने लगे हैं.

बीजेपी को भी फ़ायदे की उम्मीद

वैसे ख़बरें तो छपी हैं कि बीजेपी को भी उम्मीद है कि आनेवाले विधानसभा चुनाव में उसे भी इसका फ़ायदा होगा. काले धन और भ्रष्टाचार को जोड़ कर उसने कम से कम उत्तर प्रदेश में अपने दो विरोधियों बसपा और सपा के हमले को भोथरा करने की रणनीति बनायी है. पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक, तीन तलाक़ और यूनिफ़ार्म सिविल कोड जैसे तीर तो उसने तरकश में पहले से ही रखे हुए हैं.

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है. बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी के एक बयान का. 2014 में जब चिदम्बरम काल में यूपीए सरकार ने 2005 से पहले के करेन्सी नोट बन्द करने का फ़ैसला किया था, तो बीजेपी ने तीखी आलोचना की थी. कहा था कि यह काले धन पर लोगों को भ्रमित करने की कोशिश है, और इससे अशिक्षित और ग़रीब आदमी बुरी तरह प्रभावित होगा. लेखी की जगह आज चिदम्बरम वही बोल रहे हैं. समय-समय का फेर है! और हमारी राजनीति का सच भी!

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इसी विषय पर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर का लेख, जो रविवार १३ नवम्बर को 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' में छपा. उनका कहना है कि आम तौर पर 2 % से भी कम काला धन नक़द रूप में रहता है, बाक़ी सब सोने, रियल एस्टेट या शेयर या उद्योगों में निवेश के रूप में रहता है. उनका विश्लेषण है कि इस 'मुद्रा बदलाव' के बाद देश में 'स्वर्ण मुद्रा' का युग आने वाला है, क्योंकि मौजूदा कार्रवाई से सचेत हो कर भविष्य में लोग अपना 'नक़द काला धन' सोने के सिक्कों में ही रखेंगे.

लेख इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है.
    Less black in cash means more gold by Swaminathan S Anklesaria Aiyar

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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