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Dec 11
राजनीति का ‘भक्ति काल’
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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ममता बनर्जी, मायावती, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, लालूप्रसाद यादव, चन्द्रबाबू नायडू, उमर अब्दुल्ला, अरविन्द केजरीवाल को ज़रा एक मिनट के लिए दृश्य से हटा दें और फिर देखें कि इनकी पार्टियों की तसवीर कैसी दिखती है? ये नेता न हों तो ये पार्टियाँ किस बूते आगे बढ़ेंगी, चुनाव लड़ और जीत सकने लायक़ बचेंगी. इन नेताओं को छोड़ दें तो न इन पार्टियों के पास नेता दिखते हैं, न मुद्दे और न पार्टी के टिके रहने का कोई आधार.


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नरेन्द्र मोदी अगर भारत को 'ईश्वर की देन' हैं (जैसा वेंकैया नायडू मानते हैं), तो जयललिता अपने समर्थकों के लिए 'आदि परा शक्ति' थीं! यानी महादेवी का अवतार! अगर पिछले ढाई साल में हमने 'भक्त' नाम की एक नयी और विराट प्रजाति का उदय देखा है, जिसके लिए मोदी 'महामानव' हैं, तो जयललिता की बीमारी और उनके निधन पर पूरे तमिलनाडु में भावनाओं का उद्दाम ज्वार भी उमड़ते देखा. हालाँकि 'मोदीभक्तों' और जयललिता को पूजनेवालों में बड़ा संरचनात्मक अन्तर है!

जयललिता : 'अम्मा' और पालनहार!

जयललिता अपने समर्थकों के लिए महज़ एक राजनेता नहीं थी, सिर्फ़ एक मुख्यमंत्री नहीं, जो उनके वोट से चुनी गयी थी. बल्कि वह 'अम्मा' थी, वह उनकी आस्था थी, पालनहार थी, रसोई के नमक से लेकर उनके खाने-पीने तक हर बात का ख़याल रखनेवाली महादेवी थी. इसलिए लोगों के दिलों में जयललिता की जो जगह थी, उससे बहुत-से राजनेताओं को बड़ी ईर्ष्या हो सकती है.

कहा जा सकता है कि किसी लोकप्रिय जननेता के साथ जनता का ऐसा जुड़ाव हो तो ग़लत क्या है? महीन-सी बात है. लोकप्रियता और भक्ति में अन्तर है. अपने काम से, कौशल से, प्रतिभा से, उपलब्धियों से भी कोई मनुष्य लोकप्रिय हो सकता है, लेकिन 'भक्ति' को किसी 'महामानव' की ज़रूरत पड़ती है. मानव अपने ही जैसे मानव की भक्ति नहीं करता! कर ही नहीं सकता. और लोकप्रियता घटती-बढ़ती रहती है, लेकिन 'भक्ति' हो गयी तो हो गयी क्योंकि 'भक्त' अपने आराध्य में दोष नहीं देखना चाहता.

आम्बेडकर ने तब क्या कहा था?

इसीलिए दिक़्क़त किसी राजनेता या जननेता की लोकप्रियता से नहीं, बल्कि 'भक्ति' से है. और यह 'भक्ति' कोई आज की या हाल के बरसों की बात नहीं है. बाबासाहेब आम्बेडकर ने 1949 में संविधान सभा में अपने एक भाषण में राजनीति में 'भक्ति' का सवाल उठाया था. क्या कहा था आम्बेडकर ने और क्यों कहा था? आम्बेडकर ने कहा था कि धर्म में भक्ति भले ही आत्मा को मोक्ष प्रदान करती हो, लेकिन राजनीति में भक्ति दुर्दशा और अन्ततः तानाशाही ही लाती है. आम्बेडकर ने गाँधी को कभी न 'महात्मा' माना और न कहा.

यक़ीनन आम्बेडकर ग़लत नहीं थे. आज़ादी के पहले से चल रहे राजनीति के 'भक्ति काल' का ही नतीजा है कि पार्टियाँ गौण हो चुकी हैं, संगठन के उपकरण लुप्त हो चुके हैं, मूल्य, मुद्दे, आदर्श, सिद्धाँत, विचारधारा समय और सुविधा के हिसाब से ओढ़ने-बिछाने या तह करके रख देने के चीज़ हो गयी है. पार्टियाँ अपने-अपने 'महामानवों' की जेब में सिमट कर रह गयी हैं. जितनी पार्टियाँ, उतने 'महामानव', उतने 'महानायक!'

सब पार्टियाँ एकल नेता वाली

ज़रा आसपास नज़र उठा कर देखिए. सब एकल नेता पार्टियाँ हो चुकी हैं. सबकी सब व्यक्ति केन्द्रित. पार्टियों में नम्बर एक के बाद दूसरे नम्बर पर कौन नेता है? और नम्बर एक और नम्बर दो के आभामंडल में कितना अन्तर है? अभी जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं. पार्टी एकदम से संकट में फँसी, एक शून्य में घिरी दिखती है. वरना ऐसा क्या था कि पनीरसेल्वम को आधी रात में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी पड़ती!

ममता बनर्जी, मायावती, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, लालूप्रसाद यादव, चन्द्रबाबू नायडू, उमर अब्दुल्ला, अरविन्द केजरीवाल को ज़रा एक मिनट के लिए दृश्य से हटा दें और फिर देखें कि इनकी पार्टियों की तसवीर कैसी दिखती है? ये नेता न हों तो ये पार्टियाँ किस बूते आगे बढ़ेंगी, चुनाव लड़ और जीत सकने लायक़ बचेंगी. इन नेताओं को छोड़ दें तो न इन पार्टियों के पास नेता दिखते हैं, न मुद्दे और न पार्टी के टिके रहने का कोई आधार. और कम से कम अरविन्द केजरीवाल ईमानदारी से स्वीकार करते हैं कि उनकी पार्टी की कोई विचारधारा नहीं है, जो जनता के हित में है, वही विचारधारा.

बीजेपी, कांग्रेस और बाक़ी सब!

बीजेपी में नेताओं की कमी नहीं, लेकिन नरेन्द्र मोदी के बिना बीजेपी कहाँ? वह भारत के लिए 'ईश्वर की देन' हों न हों, इस पर सबकी अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन बीजेपी के लिए तो वह वाक़ई 'ईश्वर की देन' ही साबित हुए हैं. लेकिन मोदी के बाद बीजेपी में ऐसा कौन है, जो पार्टी को ऐसी सफलता दिला सकने का माद्दा रखता हो? काँग्रेस, समाजवादी पार्टी, द्रमुक, टीआरएस और अकाली दल जैसी पार्टियाँ अगर एक व्यक्ति नहीं, तो एक परिवार पर केन्द्रित हैं.

लोकतंत्र व्यक्तियों का या परिवारों का तंत्र नहीं होता. लेकिन कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़ कर समूचे देश में लोकतंत्र के प्रतीक या तो कुछ व्यक्ति हैं या कुछ परिवार! यही वह दुर्दशा है, जिसके ख़तरे से आम्बेडकर 1949 में देश की संविधान सभा को आगाह करा रहे थे. तब किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया. तब से चली आ रही उसी दीर्घ 'भक्ति-परम्परा' का नतीजा है कि आज सड़सठ साल बाद हम लोकतंत्र को कुछ व्यक्तियों और परिवारों की निजी दुकानदारी में बदलते देख रहे हैं. क्या यह वाक़ई लोकतंत्र की दुर्दशा नहीं है?

मार्केटिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग

इसीलिए समूची राजनीति आज मार्केटिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के नियमों से चलने लगी है. नारे कैसे आकर्षक हों, मुद्दों को किस तरह के रैपर में पेश किया जाये, नेता के कपड़े कैसे हों, चाल-ढाल, संवाद, बॉडी लैंग्वेज, एटीट्यूड कैसा हो, नेता की कैसी चित्ताकर्षक और महान छवि गढ़ी जाये, विरोधियों को कैसे निखट्टू सिद्ध किया जाये, यह सब कारपोरेट मार्केटिंग के तौर-तरीक़ों से तय होने लगा है.

राजनीतिक विमर्श इसमें कहाँ है? वह हो भी नहीं सकता. क्योंकि वह गम्भीर और उबाऊ विषय है. राजनीतिक सन्देशों के अब बिलकुल नये हथकंडे हैं. दक्षिण के नेताओं ने उनका सफल प्रयोग किया. सस्ता चावल, सस्ती बिजली, मुफ़्त टीवी, लैपटॉप से लेकर जाने क्या-क्या. फिर देश के दूसरे हिस्सों में भी इसे अपनाया जाने लगा. जयललिता इसे बढ़ा कर अम्मा नमक, अम्मा पानी और अम्मा कैंटीन तक ले गयीं.

इससे हुआ क्या? जयललिता लोगों के लिए 'आदि परा शक्ति' बन गयीं. लेकिन ग़रीब तो वैसा का वैसा बना रहा. सुविधाएँ लेता रहा, वोट देता रहा, भक्ति में डूबा रहा. उसका क्या बदला?
© 2016 http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

email: qwnaqvi@raagdesh.com
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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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