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Dec 21
‘आप’ आये, तो लोकपाल बन जाये!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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केजरीवाल ने 'आप-आप' कर दिल्ली में ऐसी झाड़ू फेरी कि बीजेपी और काँग्रेस दोनों के दम फूल गये. काँग्रेस तो सब जगह चारों ख़ाने चित थी, लेकिन बीजेपी के अँधड़ को 'आप' ने ऐसा नापा कि पार्टी की घिग्घी बँध गयी और आनन-फ़ानन में लोकपाल पास हो गया! नेहरू जी के ज़माने से कोशिश चल रही थी. केजरीवाल के ज़माने में आ कर पूरी हुई! जो काम पचास साल में कई बार होते-होते रह गया, वह देखते ही देखते पाँच दिनों में हो गया!


India gets Lokpal due to Kejriwal effect- Raag Desh 211213.jpg
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India gets Lokpal | क़मर वहीद नक़वी | Curtsy Kejriwal Impact |

जिसे न दे मौला, उसे दे आसफ़ुद्दौला! किसी ज़माने में लखनऊ के नवाब रहे आसफ़ुद्दौला के बारे में यह बात कही जाती है. लखनऊ का मशहूर बड़ा इमामबाड़ा उन्होंने ही बनवाया था. सही या ग़लत, लेकिन क़िस्सा है कि अवध में उनके ज़माने में बड़ा भयंकर सूखा पड़ा था. लोग दाने-दाने को मुहताज हो गये. तब नवाब आसफ़ुद्दौला ने इमामबाड़ा बनवाने का काम शुरू किया. कहते हैं कि इमामबाड़े का निर्माण कार्य रात में किया जाता था ताकि कभी शान-शौकत में जी चुके शरीफ़ घरों के लोग भी वहाँ इज़्ज़त बचा कर काम कर सकें, दो पैसे कमा सकें और किसी को पता भी न चले कि वे मज़दूरी करने पर मजबूर हैं!

Finally India gets Lokpal in five days after 50 Years of Wait!

दिल्ली में केजरीवाल की झाड़ू ने असर दिखाया!

वह आसफ़ुद्दौला का ज़माना था. आसफ़ुद्दौला ने लोगों को किस बहाने क्या दिया, किसी को पता नहीं चला. आज अरविन्द केजरीवाल के बहाने हम ग़रीबों को लोकपाल (Lokpal) मिल जाता है! क्यों भला? इसलिए कि केजरीवाल की लकीर छोटी करने के लिए अन्ना की लकीर को बड़ा तो करना पड़ेगा न. इस केजरीवाल ने 'आप-आप' कर दिल्ली में ऐसी झाड़ू फेरी कि बीजेपी और काँग्रेस दोनों के दम फूल गये. काँग्रेस तो सब जगह चारों ख़ाने चित थी, लेकिन बीजेपी के अँधड़ को 'आप' ने ऐसा नापा कि पार्टी की घिग्घी बँध गयी और आनन-फ़ानन में लोकपाल पास हो गया! नेहरू जी के ज़माने से कोशिश चल रही थी. केजरीवाल के ज़माने में आ कर पूरी हुई! पूरे पचास साल लग गये! जो काम पचास साल में कई बार होते-होते रह गया, वह देखते ही देखते पाँच दिनों में हो गया! ख़ुशी-ख़ुशी अन्ना का अनशन टूटा. सबने तालियाँ पीटीं, सरकार ने, राहुल ने, काँग्रेस ने, बीजेपी ने कि देखो ऐ मेरे वतन के लोगो, देखो, अन्ना को जैसा लोकपाल चाहिए था, वैसा मिल गया न! किसने दिया? हमने दिया, हमने दिया, हमने दिया!

'Kejriwal effect' forced Congress and BJP to join hands and bring Lokpal!

'आप' के ताप से सबकी कँपकँपी न छूट रही होती तो....

अब केजरीवाल कहते रहें कि यह लोकपाल नहीं, जोकपाल है. कम से कम अन्ना तो खड़े हो कर बोल ही रहे हैं कि नहीं भई, यह वही ख़ालिस रामलीला मैदान वाला असली लोकपाल है, जिसके लिए उन्होंने अनशन किया था, जो भ्रष्टाचार ख़त्म कर देगा, काले धन का काल बनेगा! काले धन का काल बने न बने, झाड़ू का काल ज़रूर बन जाये! चुनाव सिर पर न सवार होते और केजरीवाल के 'आप' के ताप से सबकी कँपकँपी न छूट रही होती तो लोकपाल की गाड़ी फिर छूट गयी होती. वरना ऐसी क्या मुसीबत थी कि लोकपाल के लिए हाथ और कमल को एक-दूसरे से गलबहियाँ करनी पड़ीं. कमल वाले नमो जी ने तो तब तक अपने प्यारे गुजरात में लोकायुक्त को पधारने नहीं दिया जब तक पानी बिलकुल नाक तक नहीं आ गया. फिर केन्द्र में लोकपाल को लेकर इतनी हबड़-तबड़ क्यों? इसलिए कि 'आप' की बिल्ली कहीं मुख्य से प्रधान होने का रास्ता न काट जाये!

दोनों बड़ी पार्टियों में ज़बरदस्त एका दिखा!

मामला साफ़ है. कोई नहीं चाहता कि केजरीवाल के पास भ्रष्टाचार का नाम लेने का भी कोई चाँस रह जाये. इसीलिए दोनों बड़ी पार्टियों में इतना ज़बरदस्त एका दिखा. और यह एका सिर्फ़ लोकपाल ही नहीं, बल्कि दिल्ली में सरकार बनवाने में भी है. दोनों पार्टियाँ चाहती हैं कि कैसे भी, बस एक बार 'आप' सरकार बना ले. उसे हर तरफ़ से घेरा जा रहा है. कैसे भी जाल में फँसे और सरकार बनाये. फिर दोनों पार्टियाँ मिल कर अगले महीने-दो महीने में उसकी सरकार फ़ेल करा दें. ताकि लोकसभा चुनाव से पहले ही किसी प्रकार 'आप' को निकम्मी, अराजक, अविश्वसनीय, हुड़दंगी टोली साबित कर उसे जनता की नज़र से उतार दिया जाये.

It was fear of AAP 'Clean Politics' Campaign, which dissuaded BJP from forming Govt in Delhi! 

'आप' से इतना डर क्यों?

'आप' से इतना डर क्यों? वजह दो हैं. एक तो यह कि जनता पर उसका असर बढ़ रहा है. नये-नये इलाक़ों में 'आप' का रंग दिखने लगा है. उसे इतने वोट मिले न मिलें कि वह अपने बूते कुछ कर पाये, लेकिन इतना तय है कि दिल्ली की तरह वह कई इलाक़ों में जमे-जमाये समीकरण और बने-बनाये गणित की ऐसी-तैसी कर सकती है. दूसरी वजह इससे भी बड़ी है. 'आप' जितने समय तक भी देश के राजनीतिक पटल पर है, तब तक वह सबके लिए नैतिकता की लक्ष्मण रेखा बनी रहेगी. इतना बड़ा सिरदर्द आख़िर ये घुटी घाघ पार्टियाँ कैसे झेलती रहेंगी. साफ़ हवा में इनका दम जो घुटता है और हाथ-पैर चलने बन्द हो जाते हैं. अगर ऐसा न होता, तो दिल्ली में सबसे बड़ी पार्टी हो कर भी बीजेपी ने क्यों सरकार बनाने के लिए ज़रा भी लार नहीं टपकायी? वह चुपचाप रामनामी ओढ़ कर बैठी रही कि विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त और जोड़-तोड़ से सरकार नहीं बनायेंगे. राजनीति में ऐसी पवित्रता और शुचिता के संकल्प तो पहली बार ही हमने देखे. वरना तो इसी बीजेपी ने पिछले आठ सालों में झारखंड में सत्ता के लिए क्या-क्या करतब नहीं किये और इसी पार्टी ने छह फ़ीसदी वोटों के लालच में उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले मायावती की पार्टी से भ्रष्टाचार के लिए निकाले गये नेता जी को बाजे-गाजे के साथ कैसे पार्टी में शामिल किया था, यह कौन नहीं जानता!

इसीलिए 'आप' से सबको डर लगता है. क्योंकि यह ख़ुद खेल पाये या न पाये, बाक़ी सबके लिए खेल के नियम बदल देती है. इसीलिए सब मिल कर 'आप' को निहत्था करना चाहते हैं. चलो! इस बहाने ही सही, देश को लोकपाल तो मिला! और केजरीवाल चाहे जो कहें, कम से कम यह लोकपाल निहत्था तो नहीं लगता.

(लोकमत समाचार, 21 दिसम्बर 2013)
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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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