Follow Raagdesh

twitter google_plus linkedin facebook mail

Politics

राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi

Commentary on Politics in India, Democracy and Democratic structure, Elections, Political Parties, their Leaders and Political Developments, Analysis of Political News and Events, Demystifying the Game Politicians play.

भारतीय राजनीति, लोकतंत्र, लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनाव, राजनीतिक दलों व उनके नेताओं और राजनीतिक गतिविधियों पर बेबाक टिप्पणी, राजनीतिक समाचारों व घटनाओं का विश्लेषण, राजनीति और राजनेताओं के खेल पर आर-पार नज़र

यह 2019 की अँगड़ाई है!

यह 2017 की लड़ाई नहीं, असल में 2019 की अँगड़ाई है! हाँ, यह ज़रूर है कि उत्तर प्रदेश का घमासान इसकी पहली प्रयोगशाला होगा. प्रयोग सफल रहा, तो मामला आगे तक जायेगा. वरना बात वहीं की वहीं रफ़ा-दफ़ा हो जायेगी. तीन तलाक़ से छिड़ी बहस के गहरे राजनीतिक अर्थ हैं, जिसे [..] Read More

चुन लीजिए, आपको क्या चाहिए!

सवाल तीखा है. मौज़ूँ है. सही है. लेकिन जवाब कहाँ से आयेगा? बिहार के कुख्यात बाहुबली शहाबुद्दीन की ज़मानत पर पूरा देश बड़े ग़ुस्से में है. होना भी चाहिए. ऐसी बेशर्मी से क़ानून की धज्जियाँ उड़ें तो काहे का क़ानून और काहे की सरकार? माफ़िया-राजनीति-सत्ता [..] Read More

‘आप’ की झाड़ू, ‘आप’ पर!

अबकी चलेगी झाड़ू! दिल्ली में तो चली, ख़ूब चली, इतनी चली कि सारी की सारी पार्टियाँ साफ़ हो गयीं. कमाल की बात थी वह. आम आदमी पार्टी यानी 'आप' राजनीति की सफ़ाई करने का नारा लगा कर आयी थी. तो पार्टियों को तो साफ़ कर दिया उसने. लोगों को लगा कि बस अब राजनीति की [..] Read More

राजनीति का धर्म क्या है?

राजनीति का धर्म क्या है? संविधान का धर्म क्या है? देश की संसद का धर्म क्या है? विधानसभाओं का धर्म क्या है? न्यायपालिका का धर्म क्या है? बहस उठी है हरियाणा विधानसभा में जैन मुनि तरुण सागर जी के प्रवचन से. दो सवाल हैं. देश चाहे कोई भी हो और धर्म चाहे कोई भी [..] Read More

काँग्रेस : बस ‘टीना’ में ही जीना!

ब्राह्मण शरणम् गच्छामि! सुना है कि 'वोट गुरू' प्रशान्त किशोर ने उत्तर प्रदेश के लिए काँग्रेस को यह नयी दीक्षा दी है. काँग्रेस उत्तर प्रदेश में 1989 से जो 'लापता' हुई, तो अब तक 'बेपता' है. काँग्रेस ने कभी ख़ुद को भी ढूँढने की कोशिश नहीं की, तो वोटर को भला क्या [..] Read More

धर्म-निरपेक्ष कि पंथ-निरपेक्ष?

पिछले हफ़्ते बड़ी बहस हुई. सेकुलर मायने क्या? धर्म-निरपेक्ष या पंथ-निरपेक्ष? धर्म क्या है? पंथ क्या है? अँगरेज़ी में जो 'रिलीजन' है, वह हिन्दी में क्या है—धर्म कि पंथ? हिन्दू धर्म है या हिन्दू पंथ? इसलाम धर्म है या इसलाम पंथ? ईसाई धर्म है या ईसाई पंथ? बहस [..] Read More

घेलुआ और 2019 के टोटके!

प्रशान्त किशोर (Prashant Kishor) इन दिनों भारी 'डिमांड' में हैं. सुना है कि अब ममता बनर्जी उन्हें अपने चुनाव की कमान देना चाहती हैं! वह 2016 की तैयारी में लग गयी हैं. जिताऊ फ़ार्मूला आख़िर किसे नहीं चाहिए! और वह भी प्रशान्त किशोर जैसा धुरन्धर 'चुनवैय्या!' [..] Read More

संघ क्यों चाहता है आरक्षण की समीक्षा?

सुना है संघ के पास आरक्षण का कोई नया समाधान है! लेकिन वह समाधान है क्या, इस पर बिहार चुनाव तक फ़िलहाल बिलकुल चुप्पी रहेगी. संघ के एक बड़े नेता इंद्रेश कुमार का ऐसा बयान अख़बारों में छपा है! तो चुनाव बीत जाये, फिर पता चलेगा कि संघ ने [..] Read More

बिहार में किसकी हार?

बिहार में किसकी हार? सवाल अटपटा लगा न! लोग पूछते हैं कि चुनाव जीत कौन रहा है! लेकिन यहाँ सवाल उलटा है कि चुनाव हार कौन रहा है? बिहार के धुँआधार का अड़बड़ पेंच यही है! चुनाव है तो कोई जीतेगा, कोई हारेगा. लेकिन बिहार में इस बार जीत से कहीं बड़ा [..] Read More

आरक्षण के ख़िलाफ़ हवाई घोड़े!

क्या यह महज़ संयोग ही है कि हार्दिक पटेल ने आरक्षण का मुद्दा तभी उठाया, जब जातिगत जनगणना के पूरे आँकड़े मोदी सरकार दबाये बैठी है? सवाल पर सोचिए ज़रा! जातिगत जनगणना के शहरी आँकड़े तो अभी बिलकुल गुप्त ही रखे गये हैं, और आरक्षण का बड़ा ताल्लुक़ शहरी [..] Read More
Most Viewed
muslim-population-myth-and-reality

क्यों बढ़ती है मुसलिम आबादी?
  तो साल भर से रुकी हुई वह रिपोर्ट अब जारी होनेवाली है! ...
Posted On  24th January 2015 2:21
economic-backwardness-literacy-and-muslim-population-growth

मुसलिम आबादी मिथ, भाग-दो!
मुसलिम आबादी का मिथ - भाग दो! पहला भाग कब आया? शायद 'राग द...
Posted On  27th August 2016 7:47
can-demonetisation-curb-black-money

तो क्या ख़त्म हो जायेगा काला धन?
बस एक महीने पहले ही मैंने 'राग देश' में लिखा था कि कुछ ल...
Posted On  12th November 2016 12:35
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
त्वरित टिप्पणी
क्या इस बजट में ग़रीबों को नक़द पैसा बाँटेगी सरकार? क्या मोदी सरकार ग़रीबों को नक़द पैसा बाँटनेवाली है? क्या बजट 2017 में सरकार वाक़ई यूनिवर्सल बेसिक इनकम की योजना लाने की तैयारी कर रही है कि हर ग़रीब को हर महीने या हर साल एक बँधी रक़म सरकार से मिलने लगे? मोदी सरकार के अगले बजट में ऐसा कोई धमाका हो सकता है, [..] Read More
Follow Us On Facebook

Recent Posts