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Politics

राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi

Commentary on Politics in India, Democracy and Democratic structure, Elections, Political Parties, their Leaders and Political Developments, Analysis of Political News and Events, Demystifying the Game Politicians play.

भारतीय राजनीति, लोकतंत्र, लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनाव, राजनीतिक दलों व उनके नेताओं और राजनीतिक गतिविधियों पर बेबाक टिप्पणी, राजनीतिक समाचारों व घटनाओं का विश्लेषण, राजनीति और राजनेताओं के खेल पर आर-पार नज़र

कैलेंडर से हटना गाँधी का!

बहुत हो गये गाँधी. अबकी बार मोदी खादी! इस साल खादी भी मोदीमय हो गयी. इस साल गाँधी नहीं, मोदी जी खादी के 'ब्रांड एम्बेसेडर' हैं. ज़माना बदल गया है!

वह हर हर मोदी, घर घर मोदी महज़ एक चुनावी नारा नहीं था, जो चुनाव बीतते ही बीत जाता. वह एक अदम्य आत्ममुग्ध [..] Read More

नोटबंदी, अखिलेश और केजरीवाल!

अबकी बार, तीन सवाल! नोटबंदी, अखिलेश और केजरीवाल. चुनाव तो होते ही रहते हैं, लेकिन कुछ चुनाव सिर्फ़ चुनाव नहीं होते, वह समय के ऐसे मोड़ पर होते हैं, जो समय का नया लेखा लिख जाते हैं, ख़ुद बोल कर समय के कुछ बड़े इशारे कर जाते हैं, कुछ सवालों की पोटलियाँ खोल [..] Read More

जंग तो जीत ही चुके हैं अखिलेश!

राजनीति धारणाओं से चलती है. एक लाइन के इस सूत्र को 2014 में नरेन्द्र मोदी ने धमाकेदार कामयाबी से आज़माया. और किसी ने इसे समझा हो या न समझा हो, अखिलेश यादव ने इस सूत्र को ख़ूब छान-घोट कर पी लिया है, यह पिछले कुछ महीनों की घटनाओं से साफ़ है.

अखिलेश को [..] Read More

नुस्ख़े राजनीति में नोटबंदी के!

नोट गन्दे हैं! नोटों में काला धन रहता है! नोट न हों तो भ्रष्टाचार ख़त्म हो जायेगा! तो जनता नोटों में लेन-देन करना छोड़ दे. कर्मचारियों को वेतन चेक से या ऑनलाइन दिया जाये. लेकिन राजनीतिक दल नोटों में चन्दे लेते रहें? क्यों? राजनीतिक दल अपने ख़र्चे नक़दी [..] Read More

राजनीति का ‘भक्ति काल’

नरेन्द्र मोदी अगर भारत को 'ईश्वर की देन' हैं (जैसा वेंकैया नायडू मानते हैं), तो जयललिता अपने समर्थकों के लिए 'आदि परा शक्ति' थीं! यानी महादेवी का अवतार! अगर पिछले ढाई साल में हमने 'भक्त' नाम की एक नयी और विराट प्रजाति का उदय देखा है, जिसके लिए मोदी 'महामानव' [..] Read More

‘सुविधा’ के अलग-अलग पैमाने!

लगता है कि देश एक टीवी चैनल के स्टूडियो में बदल गया है! जैसे टीवी चैनलों पर बहसें होती हैं, वैसे ही देश में बहसें हो रही हैं. बहसों पर बहस, और बहस, फिर और बहस! बहसें हैं, हो रही हैं, लेकिन कहीं पहुँचती नहीं. बहस शुरू तो होती है, लेकिन ख़त्म नहीं होती, बीच [..] Read More

तेरा धन, न मेरा धन!

काला धन बाहर निकालने के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बार बड़ी दूर का पाँसा फेंका है. राह में जोखिम ही जोखिम हैं. दाँव सही पड़ गया तो 2019 में वह फिर अजेय हो कर दिल्ली की गद्दी पर लौटेंगे. और दाँव कहीं उलटा पड़ गया तो मोदी और बीजेपी का तो जो होना [..] Read More

नागरिको, अग्नि-परीक्षा दो!

जिनके परिवार के लोग मर गये, वह 'ख़ुश' हैं! जिनके यहाँ शादियाँ रुक गयीं, वह भी 'ख़ुश' हैं! और वह भी 'ख़ुश' हैं, जिनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं हैं, जिनका काम-धन्धा, खेती-बाड़ी, रोज़ी-रोज़गार चौपट हुआ पड़ा है, जिन्हें रोटी जुगाड़ना दूभर हो रहा है, वह सब भी 'ख़ुश' [..] Read More

तो क्या ख़त्म हो जायेगा काला धन?

बस एक महीने पहले ही मैंने 'राग देश' में लिखा था कि कुछ लोग पाँच सौ और हज़ार रुपये के नोटों को रद्द कर देने के बचकाने सुझाव दे रहे हैं (काले धन पर गाल बजाते रहिए, 8 अक्तूबर 2016). मुझे क्या पता था कि सरकार ऐसी [..] Read More

‘सिविल कोड नहीं, तो वोट नहीं!’

परतें खुल रही हैं. धीरे-धीरे. यूनिफ़ार्म सिविल कोड पर अब एक नया सुझाव है. शायद लोगों का ध्यान उधर गया नहीं. लेकिन सुझाव बहुत ख़तरनाक है. और उससे भी कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है उसके पीछे छिपी मंशा. संघ के एक बहुत पुराने और खाँटी विचारक हैं, एम. जी. वैद्य. उनका [..] Read More
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Posted On  24th January 2015 2:21
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Posted On  27th August 2016 7:47
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Posted On  12th November 2016 12:35
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
त्वरित टिप्पणी
राहुल जी, डरो मत, कुछ करो! काँग्रेस का 'जन वेदना सम्मेलन' देखा. समझ में नहीं आया कि यह किसकी वेदना की बात हो रही है? जनता की वेदना या काँग्रेस की? जनता अगर इतनी ही वेदना में है तो हाल-फ़िलहाल के छोटे-मोटे चुनावों में लगातार बीजेपी को वोट दे कर वह अपनी 'वेदना' बढ़ा क्यों रही है?

 [..] Read More
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