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Desh-Duniya

राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi

News Analysis of Current Events in India and the World, Issues concerning with Secularism, Human Rights and Social Equality, Geo-Political issues like War against Terrorism and Religious Radicalism, Socio-Economic factors impacting and shaping world around us.

देश-विदेश की समसामियक घटनाओं व समाचारों का विश्लेषण, धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकार, सामाजिक बराबरी, भू-राजनीतिक मुद्दों जैसे आतंकवाद व धार्मिक चरमपंथ के विरुद्ध संघर्ष, व हमारे आसपास की दुनिया को प्रभावित करनेवाले सामाजिक-आर्थिक कारकों पर टिप्पणी.

ताकि रोज़ का यह टंटा ख़त्म हो!

बात गम्भीर है. ख़ुद प्रधानमंत्री ने कही है, तो यक़ीनन गम्भीर ही होगी! पर इससे भी गम्भीर बात यह है कि प्रधानमंत्री की इस बात पर ज़्यादा बात नहीं हुई. क्योंकि देश तब कहीं और व्यस्त था. उस आवेग में उलझा हुआ था, जिसके बारूदी गोले प्रधानमंत्री की अपनी ही [..] Read More

किसकी जेब के आठ लाख करोड़?

न हंगामा है, न ग़ुस्सा. न चिन्ता है, न क्षोभ. 'ग्रेट इंडियन बैंक डकैती' हो गयी तो हो गयी. लाखों करोड़ रुपये लुट गये, तो लुट गये. ख़बर आयी और चली गयी. न धरना, न प्रदर्शन, न नारे, न आन्दोलन. न फ़ेसबुकिया रणबाँकुरे मैदान में उतरे. न किसी ने पूछा कि क़र्ज़ों का यह [..] Read More

निशानची बहसों के दौर में!

वसन्त आ गया है. मौसम सुहाना है. लेकिन देश तप रहा है. मन तप रहे हैं. तपतपाये हुए हैं. तपतपाये जा रहे हैं. पूरा देश मानो टीवी की डिबेट और फ़ेसबुक की टाइमलाइन हो गया हो! टीवी में स्क्रीन पर लपलपाती आग की लपटें और खाँचों में कटी और बँटी खिड़कियों से चीख़ते, [..] Read More

विकास की बाँसुरी, फ़ासिस्ज़्म के तम्बू!

रोहित वेमुला ने आत्महत्या क्यों की? वह कायर था? अवसाद में था? ज़िन्दगी से हार गया था? उसके मित्रों ने उसकी मदद की होती, तो उसे आत्महत्या से बचाया जा सकता था? क्या उसकी आत्महत्या के ये कारण थे? नहीं, बिलकुल नहीं.

देश की त्रासदी है रोहित की आत्महत्या

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पाकिस्तान : यह माजरा क्या है?

क्या पाकिस्तान बदल रहा है? पठानकोट के बाद पाकिस्तान की पहेली में यह नया सवाल जुड़ा है. लोग थोड़ा चकित हैं. कुछ-कुछ अजीब-सा लगता है. आशंकाएँ भी हैं, और कुछ-कुछ आशाएँ भी! यह हो क्या रहा है पाकिस्तान में? मसूद अज़हर को पकड़ लिया, जैश पर धावा बोल दिया, सेना और [..] Read More

माल्दा, मुसलमान और कुछ सवाल!

माल्दा एक सवाल है मुसलमानों के लिए! बेहद गम्भीर और बड़ा सवाल. सवाल के भीतर कई और सवालों के पेंच हैं, उलझे-गुलझे-अनसुलझे. और माल्दा अकेला सवाल नहीं है. हाल-फ़िलहाल में कई ऐसी घटनाएँ हुईं, जो इसी सवाल या इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द हैं. इनमें बहुत-से सवाल [..] Read More

ऐसी दिखती है 2016 की तसवीर!

तो साल बदल गया. जैसा हर साल होता है, हर साल कुछ बदलता है, लेकिन बहुत-कुछ नहीं भी बदलता. जो कभी नहीं बदलता, उस पर बात भी कभी नहीं होती. आख़िर यथावत पर क्या बात की जाये? वह तो जैसा है, वैसा ही रहेगा. ग़रीब हैं तो हैं, ग़रीबी है तो है, करोड़ों लोग बेघर हैं तो हैं, [..] Read More

यह कैसा ‘बचकाना न्याय’ है?

लोग अब ख़ुश हैं. अपराध और अपराधियों के ख़िलाफ़ देश की सामूहिक चेतना जीत गयी. किशोर न्याय (Juvenile Justice) पर एक अटका हुआ बिल पास हो चुका है. अब कोई किशोर अपराधी उम्र के बहाने क़ानून के फंदे से नहीं बच पायेगा. किसी अटके हुए बिल ने आज तक देश की 'सामूहिक चेतना' को ऐसा [..] Read More

न्याय क्या सबके लिए बराबर है?

बड़ी-बड़ी अदालतें हैं. बड़े-बड़े वकील हैं. बड़े-बड़े क़ानून हैं. और बड़े-बड़े लोग हैं. इसलिए छोटे-छोटे मामले अकसर ही क़ानून की मुट्ठी से फिसल जाते हैं! साबित ही नहीं हो पाते! और लोग चूँकि बड़े होते हैं, इतने बड़े कि हर मामला उनके लिए छोटा हो ही जाता है! [..] Read More

क्या चाहिए आपको, लोकतंत्र या धर्म-राज्य?

सिर्फ़ बीस दिन हुए थे. शायद ही ऐसा पहले कभी हुआ हो. देश में कोई नयी सरकार बनी हो और महज़ बीस दिनों में ही यह या इस जैसा कोई सवाल उठ जाये! तारीख़ थी 14 जून 2014, जब 'राग देश' के इसी स्तम्भ में यह सवाल उठा था—2014 का सबसे बड़ा सवाल, मुसलमान!

और यह सवाल सरकार बनने के [..] Read More

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Posted On  24th January 2015 2:21
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मुसलिम आबादी मिथ, भाग-दो!
मुसलिम आबादी का मिथ - भाग दो! पहला भाग कब आया? शायद 'राग द...
Posted On  27th August 2016 7:47
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तो क्या ख़त्म हो जायेगा काला धन?
बस एक महीने पहले ही मैंने 'राग देश' में लिखा था कि कुछ ल...
Posted On  12th November 2016 12:35
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
त्वरित टिप्पणी
क्या इस बजट में ग़रीबों को नक़द पैसा बाँटेगी सरकार? क्या मोदी सरकार ग़रीबों को नक़द पैसा बाँटनेवाली है? क्या बजट 2017 में सरकार वाक़ई यूनिवर्सल बेसिक इनकम की योजना लाने की तैयारी कर रही है कि हर ग़रीब को हर महीने या हर साल एक बँधी रक़म सरकार से मिलने लगे? मोदी सरकार के अगले बजट में ऐसा कोई धमाका हो सकता है, [..] Read More
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