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Politics

त्वरित टिप्पणी  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi

Instant Commentary on Political Controversies, Elections, Political Parties and Alliances, Public Life and Conduct of Politicians and Leaders, Political Developments, Analysis of Political News and Events.

महत्त्वपूर्ण राजनीतिक विवाद व मुद्दे, चुनावी राजनीति, राजनीतिक पार्टियाँ व गठबन्धन, राजनेता व उनका सार्वजनिक जीवन, राजनीतिक समाचारों व घटनाओं का विश्लेषण.

तीन तलाक़ और नयी सोशल इंजीनियरिंग

तीन तलाक़ पर फ़ैसले के बाद क्या अब एक नयी सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत होगी? और अगर ऐसा हुआ तो क्या देश की राजनीति में हम एक नया मोड़ देखेंगे? ठीक वैसे ही जैसे मंडल के बाद दलित-पिछड़ा राजनीति के बिलकुल नये समीकरण देखे गये थे. हालाँकि पिछले तीन साल में [..] Read More

क्यों राहुल-अखिलेश को यह साथ पसन्द है?

लखनऊ में रविवार को राहुल-अखिलेश के साझा रोड शो के कुछ राजनीतिक सन्देश बड़े स्पष्ट हैं. एक, यह महज़ उत्तर प्रदेश का चुनावी गठबन्धन नहीं है, बल्कि 2019 का विपक्षी राजनीति का रोडमैप है. यानी गठबन्धन को लम्बा चलना है.

दो, दाँव पर सिर्फ़ एक चुनाव की [..] Read More

क्या इस बजट में ग़रीबों को नक़द पैसा बाँटेगी सरकार?

क्या मोदी सरकार ग़रीबों को नक़द पैसा बाँटनेवाली है? क्या बजट 2017 में सरकार वाक़ई यूनिवर्सल बेसिक इनकम की योजना लाने की तैयारी कर रही है कि हर ग़रीब को हर महीने या हर साल एक बँधी रक़म सरकार से मिलने लगे? मोदी सरकार के अगले बजट में ऐसा कोई धमाका हो सकता है, [..] Read More

राहुल जी, डरो मत, कुछ करो!

काँग्रेस का 'जन वेदना सम्मेलन' देखा. समझ में नहीं आया कि यह किसकी वेदना की बात हो रही है? जनता की वेदना या काँग्रेस की? जनता अगर इतनी ही वेदना में है तो हाल-फ़िलहाल के छोटे-मोटे चुनावों में लगातार बीजेपी को वोट दे कर वह अपनी 'वेदना' बढ़ा क्यों रही है?

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यूपी चुनाव : अखिलेश ‘बबुआ’ या मुखिया?

2017 में उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग का फ़ैसला क्या होगा, यह तो बाद की बात है. फ़िलहाल तो सबकी निगाहें इस पर लगी हैं कि समाजवादी पार्टी के भीतर चल रही टिकटों की लड़ाई का फ़ैसला क्या होगा, कौन जीतेगा? पिता या पुत्र? पार्टी पर किसका वर्चस्व होगा? कोई सुलह [..] Read More

नाप लीजिए, विपक्ष कितने पानी में है?

तिल का ताड़ नहीं, ताड़ का तिल! बात 'भारत बन्द' से शुरू हुई थी, और दो दिन में ही 'आक्रोश दिवस' में बदल गयी. नाप लीजिए कि विपक्ष कितने पानी में है और कहाँ खड़ा है.

नोटबंदी के मसले पर जनता कितनी तकलीफ़ में है, कितने ग़ुस्से में है, है भी या नहीं, 'भारत बन्द' [..] Read More

मोदी जी, काला धन यहाँ है!

तो प्रधानमंत्री ने साफ़ कर दिया है कि काले धन के सफ़ाये को लेकर वह वाक़ई बेहद गम्भीर हैं. नोटबंदी महज़ शोशा नहीं है. अगला निशाना बेनामी सम्पत्तियों पर होगा. और सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा. प्रधानमंत्री का कहना है कि भ्रष्टाचार और काले धन के ख़िलाफ़ [..] Read More

क्यों याद आ रहे हैं आम्बेडकर?

इतिहास के संग्रहालय से झाड़-पोंछ कर जब अचानक किसी महानायक की नुमाइश लगायी जाने लगे, तो समझिए कि राजनीति किसी दिलचस्प मोड़ पर है! इधर आम्बेडकर अचानक उस संघ की आँखों के तारे बन गये हैं, जिसका वह पूरे जीवन भर मुखर विरोध करते रहे, उधर जवाब में 'जय भीम' के साथ [..] Read More

मोदी के कौशल की पहली परीक्षा!

दिल्ली में नरेन्द्र मोदी के कौशल की पहली परीक्षा अब है! उनके राजनीतिक जीवन की शायद अब तक की सबसे बड़ी चुनौती उनके सामने है! और शायद पहली भी! इस मामले में मोदी वाक़ई भाग्यशाली रहे हैं. मुझे नहीं याद पड़ता कि इससे पहले कभी उनके सामने कोई [..] Read More

‘लौहपुरुष’ को ज़ंग लगा कबाड़ क्यों बनाया?

कभी-कभी सोचता हूँ कि आडवाणी जी आजकल क्या सोचते होंगे? वह अतीत और यह वर्तमान! क्या किया और क्या पाया?

और अगर यात्रा के अन्त में यहीं पहुँचना था कि हार्डलाइन हिन्दुत्व के लौहपुरुष को ज़ंग लगा कबाड़ बना कर फेंक दिया जाये, तो देश की छाती चीर [..] Read More
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क्यों बढ़ती है मुसलिम आबादी?
  तो साल भर से रुकी हुई वह रिपोर्ट अब जारी होनेवाली है! ...
Posted On  24th January 2015 2:21
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मुसलिम आबादी मिथ, भाग-दो!
मुसलिम आबादी का मिथ - भाग दो! पहला भाग कब आया? शायद 'राग द...
Posted On  27th August 2016 7:47
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तो क्या ख़त्म हो जायेगा काला धन?
बस एक महीने पहले ही मैंने 'राग देश' में लिखा था कि कुछ ल...
Posted On  12th November 2016 12:35
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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तीन तलाक़ और नयी सोशल इंजीनियरिंग तीन तलाक़ पर फ़ैसले के बाद क्या अब एक नयी सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत होगी? और अगर ऐसा हुआ तो क्या देश की राजनीति में हम एक नया मोड़ देखेंगे? ठीक वैसे ही जैसे मंडल के बाद दलित-पिछड़ा राजनीति के बिलकुल नये समीकरण देखे गये थे. हालाँकि पिछले तीन साल में [..] Read More
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