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 | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi

Naqvi Ki Pathshala

यह Times Trainee Journalist Scheme की ही प्रेरणा है कि मुझे पत्रकारिता के छात्रों से बातें करना, और जो मैं उन्हें सिखा सकता हूँ, वह सिखा देना बहुत प्रिय है. 1995 में 'आज तक' के शुरुआती दिनों में मैंने पाया कि ज़्यादातर टीवी पत्रकारों को स्क्रिप्ट लिखने में बड़ी [..] Read More

कहाँ होती है असली ख़बर?

एक पत्रकार में सबसे बड़ा गुण क्या होना चाहिए? बाक़ी बातें तो ठीक हैं कि विषय की समझ होनी चाहिए, ख़बर की पकड़ होनी चाहिए, भाषा का कौशल होना चाहिए आदि-आदि. लेकिन मुझे लगता है कि एक पत्रकार को निस्सन्देह एक सन्देहजीवी प्राणी होना चाहिए, उसके मन में [..] Read More

कैसे नाम पड़ा ‘आज तक’

'आज तक' का नाम कैसे पड़ा 'आज तक?' बड़ी दिलचस्प कहानी है. बात मई 1995 की है. उन दिनों मैं 'नवभारत टाइम्स,' जयपुर का उप-स्थानीय सम्पादक था. पदनाम ज़रूर उप-स्थानीय सम्पादक था, लेकिन 1993 के आख़िर से मैं सम्पादक के तौर पर ही अख़बार का काम देख रहा था.

एक दिन एस. पी. [..] Read More

‘टाइम्स समूह’ तक कैसे पहुँचा मैं?

अगर उस दिन विजय ने मुझे बुला कर वह विज्ञापन न दिखाया होता तो मैं आज वह न होता, जो हूँ! विजय ने ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई नहीं की थी. हाईस्कूल से पहले ही पढ़ाई छोड़ दी थी. मेरे ही मुहल्ले में रहता था. उन दिनों आज की तरह कालोनियों का ज़माना नहीं था. मुहल्ले में सब [..] Read More

उम्र 19 नहीं, बन गये सम्पादक!

लिखने का शौक़ तो 13-14 साल की उम्र से ही लग गया था. वाराणसी के अख़बारों में रविवार को बच्चों के पृष्ठ पर कविताएँ छपने से इस सिलसिले की शुरुआत हुई. कई कविताएँ छपीं और जब बच्चों के पन्ने के लिए हुई कुछ लेख प्रतियोगिताओं में पहला स्थान पा लिया, तो हौसला बढ़ा. [..] Read More

  
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Posted On  27th August 2016 7:47
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तो क्या ख़त्म हो जायेगा काला धन?
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Posted On  12th November 2016 12:35
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
त्वरित टिप्पणी
राहुल जी, डरो मत, कुछ करो! काँग्रेस का 'जन वेदना सम्मेलन' देखा. समझ में नहीं आया कि यह किसकी वेदना की बात हो रही है? जनता की वेदना या काँग्रेस की? जनता अगर इतनी ही वेदना में है तो हाल-फ़िलहाल के छोटे-मोटे चुनावों में लगातार बीजेपी को वोट दे कर वह अपनी 'वेदना' बढ़ा क्यों रही है?

 [..] Read More
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