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Jan 19
क्या इस बजट में ग़रीबों को नक़द पैसा बाँटेगी सरकार?
त्वरित टिप्पणी  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 2 

अगर सरकार यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसी कोई योजना लाती है, तो ग़रीबों के खाते में तुरन्त पैसे आने लगेंगे! इससे एक तो नोटबंदी को लेकर सरकार पर विपक्ष का पूरा हमला ही भोथरा हो जायगा और दूसरे अपनी 'कारपोरेट-मित्र' की छवि को सरकार एक झटके में धो कर 'ग़रीबों की सबसे बड़ी मसीहा' भी बन जायेगी. अब बजट में सचमुच ऐसी कोई घोषणा होगी या नहीं, यह तो दावे के साथ कोई नहीं कह सकता, लेकिन सरकार में 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' यानी UBI पर चर्चा तो बड़ी गम्भीरता से हो रही है.


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क्या मोदी सरकार ग़रीबों को नक़द पैसा बाँटनेवाली है? क्या बजट 2017 में सरकार वाक़ई यूनिवर्सल बेसिक इनकम की योजना लाने की तैयारी कर रही है कि हर ग़रीब को हर महीने या हर साल एक बँधी रक़म सरकार से मिलने लगे? मोदी सरकार के अगले बजट में ऐसा कोई धमाका हो सकता है, इसकी बड़ी अटकलें हैं.

इसी बीच ग़रीबों को पैसा बाँटने के लिए एक और दिलचस्प सुझाव आया है. वह है 'निगेटिव इनकम टैक्स' का. इसे आप आसान भाषा में समझने के लिए 'ग़रीबी टैक्स' भी कह सकते हैं. सुझाव है कि एक एक सीमा से नीचे की आमदनी वालों को सरकार एक निश्चित दर से पैसा दे यानी सरकार उन्हें 'ग़रीबी टैक्स' चुकाए!

बजट 2017 में 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' की अटकलें

अब बजट में सचमुच ऐसी कोई घोषणा होगी या नहीं, यह तो दावे के साथ कोई नहीं कह सकता, लेकिन सरकार में 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' यानी UBI पर चर्चा तो बड़ी गम्भीरता से हो रही है. सम्भावनाओं की पड़ताल हो रही है. सोच-विचार जारी है कि क्या ऐसा हो सकता है? और अगर हो सकता है, तो कैसे? क्या सरकार इतना बोझ उठा पाने की हालत में है? इतना पैसा आयेगा कहाँ से?

यहाँ यह बता दें कि 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' या UBI एक बिलकुल नयी अवधारणा है, जिस पर विकसित देशों में हाल में विचार शुरू हुआ है. इसके तहत यह माना जाता है कि देश के हर नागरिक की कुछ न्यूनतम बुनियादी आमदनी होनी चाहिए और अगर नागरिक ख़ुद उतना नहीं कमा पाते, तो सरकार को उसकी भरपाई करनी चाहिए.

क्या ग़रीबों को मिलेगी न्यूनतम बुनियादी कमाई की गारंटी?

तो मोदी सरकार क्या देश भर में ग़रीबों को कुछ न्यूनतम बुनियादी कमाई की गारंटी देने या 'निगेटिव इनकम टैक्स' जैसा बड़ा क़दम उठा सकती है? जब पिछले पाँच-सात सालों से केन्द्र सरकार अर्थव्यवस्था पर 'सब्सिडी' के भारी भरकम बोझ का रोना रोती रही है, जब ईंधन गैस तक की सब्सिडी लोगों से छुड़वाने के लिए मोदी सरकार बाक़ायदा अभियान चला रही हो, तब क्या करोड़ों लोगों को इतनी बड़ी सब्सिडी देने का बोझ सरकार उठाने के लिए तैयार होगी?

सवाल तो कई हैं, लेकिन नोटबंदी के तुरन्त बाद पेश हो रहा बजट 2017 शायद कई मायनों में 'असाधारण' होना चाहिए. इसके तमाम राजनीतिक कारण मौजूद हैं. नोटबंदी से एक तरह से सरकार की बड़ी किरकिरी हुई, क्योंकि कोई काला धन निकला ही नहीं, जिसके लिए सरकार ने इतनी बड़ी क़वायद की थी. और नोटबंदी से अर्थव्यवस्था का इंजन जिस तरह हाँफ़ रहा है, वह सब भुगत रहे हैं. किसानों, मज़दूरों, ग़रीब तबक़ों और छोटे-मँझोले धन्धों पर बुरा असर पड़ा है, जिससे उबरने में समय लगेगा.

UBI से भोथरा हो जायेगा नोटबंदी पर विपक्ष का हमला!<

नोटबंदी पर सरकार का कहना था कि इससे थोड़े समय की तकलीफ़ होगी, लेकिन आगे चल कर बड़ा फ़ायदा होगा. तो सरकार को लोगों को कुछ ऐसा करके दिखाना है, जिसे 'नोटबंदी के फ़ायदे' के तौर पर पेश किया जा सके. ख़ास कर ग़रीबों के लिए सरकार को कुछ तो बड़ा करना है, क्योंकि नोटबंदी और उसके बाद डिजिटल इकॉनॉमी की बात करते हुए सरकार की तरफ़ से बार-बार कहा गया कि इससे जो पैसा सरकार को मिलेगा, वह ग़रीबों के काम आयेगा.

ग़रीब तबक़ा तभी से सरकार से बड़ी उम्मीद लगाये है. तो अगर सरकार यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसी कोई योजना लाती है, तो ग़रीबों के खाते में तुरन्त पैसे आने लगेंगे! इससे एक तो नोटबंदी को लेकर सरकार पर विपक्ष का पूरा हमला ही भोथरा हो जायगा और दूसरे अपनी 'कारपोरेट-मित्र' की छवि को सरकार एक झटके में धो कर 'ग़रीबों की सबसे बड़ी मसीहा' भी बन जायेगी.

मोदी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं पाँच राज्यों के चुनाव

पाँच राज्यों में चुनाव हैं. नोटबंदी के झमेले में घिरी सरकार के लिए इन चुनावों में भारी जीत दर्ज करना बहुत ही अहम है. पिछले ढाई साल में विकास का ऐसा कोई कारनामा हुआ नहीं, जिसकी भव्य मार्केटिंग हो सकती हो. नोटबंदी से सरकार को बड़ी उम्मीद थी. वह पूरी नहीं हुई.

तो बजट में ग़रीबों के लिए कुछ बड़ा ही करना होगा. करना तो मध्य वर्ग और कारपोरेट के लिए भी बड़ा ही होगा, इसीलिए पिछले बजटों में अब तक फूँक-फूँक कर क़दम रखनेवाली मोदी सरकार शायद इस बार कुछ बड़े आर्थिक सुधारों का जोखिम ले, क्योंकि सरकार के पास अब समय कम है. दो साल बाद ही उसे अगले चुनावों का सामना करना है.

'यूनिवर्सल बेसिक इनकम': क्या-क्या विकल्प हो सकते हैं?

'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' को लेकर फ़िलहाल तरह-तरह की चर्चाएँ हैं. एक सुझाव यह है कि यह सिर्फ़ ढाई करोड़ बेरोज़गारों पर लागू हो और उन्हें पाँच हज़ार रुपये सालाना दिया जाये. इस पर ख़र्च बैठेगा 12 हज़ार करोड़ रुपये. और हर बेरोज़गार को मिलेंगे हर महीने 416 रुपये. लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि इससे क्या होगा. इसलिए दूसरा सुझाव यह है कि 'अत्यन्त ग़रीब' की श्रेणी में आनेवाले 20 करोड़ लोगों को हर महीने 1500 रुपये दिये जायें. अगर ऐसा किया जाय तो सरकार पर हर साल तीन लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. इतनी बड़ी रक़म कहाँ से आयेगी?

क्या है 'निगेटिव इनकम टैक्स' की अवधारणा?

उधर, दो प्रमुख अर्थशास्त्रियों सुरजीत भल्ला और अरविन्द विरमानी ने 'निगेटिव इनकम टैक्स' का सुझाव देते हुए एक नयी 'इनकम टैक्स क्रान्ति' की बात कही है. भल्ला और विरमानी का फ़ार्मूला वाक़ई देखने में तो बड़ा 'क्रान्तिकारी' लगता है. उन्होंने इनकम टैक्स के सारे आँकड़ों को जोड़ घटा कर निष्कर्ष निकाला है सरकार को जो टैक्स मिलता है, उसका कम से कम दोगुना टैक्स चोरी कर लिया जाता है. दूसरी तरफ़ दस, बीस, तीस प्रतिशत के मौजूदा तीन टैक्स स्लैब की दरें भले ही हैं, लेकिन सब मिला कर सरकार को इनकम टैक्स की औसतन दर 12 प्रतिशत के आसपास ही बैठती है.

ग़रीबों को 12 % टैक्स दे सरकार!

इसलिए उनका सुझाव है कि ढाई लाख तक कर-मुक्त आय की मौजूदा सीमा को बरक़रार रखा जाय और इसके ऊपर की जितनी भी आमदनी हो, उस पर केवल 12 प्रतिशत की एक ही दर से इनकम टैक्स लिया जाय. इससे टैक्स चोरी रुकेगी, क्योंकि काले धन को सफ़ेद करने के लिए दस-बारह प्रतिशत पैसा तो लोगों को यों ही ख़र्च करना पड़ता है. तो फिर लोग टैक्स चुराने की झंझट में क्यों पड़ेंगे? दूसरी तरफ़, जिन लोगों की कमाई ढाई लाख से जितनी कम है, उसका 12% सरकार उन्हें चुकाए.

कैसे जोड़ा जाय 'ग़रीबी टैक्स?'

मसलन जो बेरोज़गार है, जिसकी कोई आमदनी नहीं, उसे ढाई लाख का 12% यानी 30 हज़ार रुपये सालाना सरकार दे. इसी तरह अगर किसी की सालाना कमाई डेढ़ लाख है, तो वह ढाई लाख से एक लाख कम हुई. उसे एक लाख का 12% यानी 12 हज़ार दिया जाय, जिसकी कमाई सालाना दो लाख है, वह ढाई लाख से पचास हज़ार कम है, इसलिए उसे पचास हज़ार का 12% यानी छह हज़ार दिया जाय.

उनका हिसाब है कि इस तरह से 'निगेटिव इनकम टैक्स' देने के लिए सरकार को 2.9 लाख करोड़ रुपये की ज़रूरत पड़ेगी और टैक्स दर 12% करने से टैक्स चुकानेवालों की जो संख्या बढ़ेगी, उससे इतना राजस्व बढ़ जायगा कि इस 2.9 लाख करोड़ की भरपाई आसानी से हो जायगी.

लेकिन हर व्यक्ति को भरना होगा आमदनी रिटर्न!

इसका एक बड़ा फ़ायदा यह भी होगा कि इनकम टैक्स रिटर्न सबको भरना पड़ेगा. क्योंकि ग़रीबों को भी अगर सरकार से पैसा लेना है, तो अपनी आमदनी का रिटर्न भर कर ही तो वह क्लेम फ़ाइल कर सकेंगे!

इससे एक फ़ायदा यह भी होगा कि अगर सरकार से पैसा लेना है, तो हर आदमी को बैंकिंग और डिजिटल लेन-देन को अपनाना भी पड़ेगा. इस तरह डिजिटल इकॉनॉमी का लक्ष्य बहुत जल्दी पाया जा सकता है.

लेकिन 'निगेटिव इनकम टैक्स' का सुझाव इतनी जल्दी में तो अमल में नहीं लाया जा सकता, उस पर काफ़ी सोच-विचार की ज़रूरत है. फिर इसके तहत दाख़िल हुए करोड़ों लोगों के रिटर्न को प्रोसेस करने के लिए इनकम टैक्स विभाग को भारी संख्या में कर्मचारियों की ज़रूरत पड़ेगी.

तो ऐसा हो सकता है कि फ़िलहाल, यूनिवर्सल बेसिक इनकम को किसी न किसी रूप में लागू किया जाय और कभी बाद में 'निगेटिव इनकम टैक्स' जैसी व्यवस्था की तरफ़ बढ़ा जाय. दूसरी तरफ़, संकेत हैं कि बैंकों से नक़द निकासी पर सरकार टैक्स भी लगा सकती है. कुल मिला कर अगला बजट दिलचस्प होगा, ऐसा लगता है.

hindi.firstpost.com के लिए 19 जनवरी 2017 को लिखी गयी यह टिप्पणी यहाँ भी पढ़ी जा सकती है.

© 2017 http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

email: qwnaqvi@raagdesh.com
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  • S.Goel

    Exemption limit should be raised to 5 lacs and after that a flat rate of 12% seems like a good idea.Regarding Universal Basic Income limit it to 2 persons per family if implemented.

  • Amit Agarwal

    बहुत विचारपूर्ण और शानदार लिखा है, नक़वी साहब.. हमेशा की तरह!

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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