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Dec 13
तो फिर शिवकुमार ही क्यों डरे?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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बलात्कार के ख़िलाफ़ जो ठोस क़दम उठने चाहिए, वह कभी उठेंगे ही नहीं. क्योंकि सरकारें ठोस क़दम उठा कर नहीं, बल्कि सिर्फ़ काग़ज़ों पर चलती हैं. क्योंकि यहाँ सब चलता है! जनता भी काग़ज़ पढ़ती है और अपनी राह चल देती है! दहेज और भ्रूण हत्याएँ रोकने के लिए भी कठोर क़ानून हैं. लेकिन अपने दिल पर हाथ रख कर बताइएगा कि कभी आपको इन क़ानूनों से कोई डर लगा? नहीं न! तो फिर शिवकुमार ही क्यों डरे?

बलात्कार: क़ानून बनाने के अलावा सरकार ने क्या किया?

--- क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi काग़ज़ का आविष्कार न हुआ होता, तो सरकारें कैसे चलतीं? दिलचस्प सवाल है! कल्पना कीजिए. आप भी शायद इसी नतीजे पर पहुँचेंगे कि काग़ज़ के बिना सरकार चल ही नहीं सकती! काग़ज़ ने सरकार के काम को कितना आसान बना दिया है! काग़ज़ न होता तो भला काग़ज़ी ख़ानापूरी कैसे होती? और काग़ज़ी ख़ानापूरी न होती, तो सरकारें कैसे चलतीं? ख़ासकर अपने देश की सरकारें! वैसे लोग कह रहे हैं कि काग़ज़ का दौर जल्दी ही ख़त्म होनेवाला है. सब डिजिटल हो रहा है. तो क्या हुआ? डिजिटल दौर में सरकार अपने लिए 'डिजिटल काग़ज़' बना लेगी! क्योंकि वह काग़ज़ के बिना चल ही नहीं सकती!

थोड़ा लिखा, बहुत समझना!

पहले के ज़माने में भोजपत्र हुआ करते थे, जिन पर लोग लिखा करते थे. बड़े-बड़े ग्रन्थ लिखे गये भोजपत्र पर. पुराने मिस्र में पपायरस हुआ करता था. एक पेड़ की छाल से बनता था, raagdesh-uber-cab-rape-caseजिसका इस्तेमाल लोग लिखने, चित्र बनाने के काम में करते थे. आज भी मिस्र के बाज़ारों में आप इसे ख़रीद सकते हैं. राजा के आदेश बिलकुल पक्के रहें, इसके लिए कभी-कभी ताम्र पत्र पर भी लिख दिये जाते थे. लेकिन लिखने के ये सब उपकरण तब अपने समय के हिसाब से बहुत महँगे हुआ करते थे, बड़ी मेहनत और समय भी लगता था इन्हें तैयार करने में, इसलिए राजाओं, महाराजाओं, सम्राटों, बादशाहों, नवाबों के दौर में सरकारी आदेश कम लिखे जाते थे, और जो लिखे भी जाते थे, वह भी बहुत थोड़े में, बहुत छोटे. सरकार थोड़ा लिखती थी, जनता ज़्यादा समझती थी! अभी कुछ साल पहले तक, जब तक लोग पोस्टकार्ड पर चिट्ठियाँ लिखते थे, तो चिट्ठी अमूमन इसी जुमले के साथ पूरी की जाती थी, थोड़ा लिखा बहुत समझना! हमारे बचपन में शायद एक आने का पोस्टकार्ड हुआ करता था. वही बहुत महँगा लगता था. इसलिए लोग थोड़ा लिखा करते थे, लेकिन पढ़नेवाला उसे 'ज़्यादा' समझ लिया करता था! राजा से लेकर रंक तक, एक वह भी दौर था, थोड़ा लिखा बहुत समझना!

बलात्कार और काग़ज़ के क़ानून

आज काग़ज़ का ज़माना है. बड़ी-बड़ी फ़ैक्टरियों में बनता है. सस्ता भी है. आसानी से बन भी जाता है, भले ही पेड़ों को ख़त्म करके बनता हो! इसलिए सब ख़ूब लिख रहे हैं, ख़ूब किताबें छप रही हैं, ख़ूब अख़बार छप रहे हैं, ख़ूब सरकारी क़ानून बन रहे हैं, दफ़्तरों में, पुलिस थानों में, रिसर्च संस्थानों में, अदालतों में फ़ाइलों पर फ़ाइलों के ढेर हैं, बहुत लिखा जा रहा है. तो अब जुमला उलट गया लगता है, बहुत लिखा थोड़ा समझना या कुछ नहीं समझना! दिल्ली में फिर एक बलात्कार पर हंगामा है. दो साल पहले 'निर्भय' कांड ने देश को झकझोर दिया था. पूरा देश सड़कों पर आ गया. कड़ा क़ानून बने. सरकार हिल गयी. कड़ा क़ानून बन गया. काग़ज़ ने अपना काम कर दिया. लेकिन किसी ने कुछ नहीं समझा. कोई नहीं डरा. बलात्कार होते रहे. मुम्बई में एक पत्रकार के बलात्कार से देश फिर सन्न रह गया. लेकिन कहीं कुछ नहीं बदला. नेताओं के ऊँटपटाँग बयान आते रहे. लड़कों से बलात्कार ग़लती से हो जाता है. ईश्वर भी बलात्कार नहीं रोक सकता है. बलात्कार 'इंडिया' में होता है, 'भारत' में नहीं. उधर, खाप पंचायतें अपना 'आइक्यू' दिखाती रहीं, लड़कियाँ जीन्स न पहनें, मोबाइल फ़ोन न रखें. लेकिन बलात्कार नहीं रुके, न शहरों में, न गाँवों में. और गाँवों में बलात्कार हुए तो अकसर पंचायतें बलात्कारी को 'दो थप्पड़' लगा कर [embed]https://www.youtube.com/watch?v=VZHCOzmyxJI[/embed] मामले को निपटा देने के फ़ैसले सुनाती रहीं. मोदी जी आये. चुनाव प्रचार में वह भी बहुत दहाड़े थे, और उनका प्रचार अभियान भी बहुत दहाड़ा था कि माँ-बहनों की सुरक्षा चाहिए तो लाओ मोदी सरकार! तो सरकार तो आ गयी. सात महीने भी हो गये. माँ-बहनों की सुरक्षा के लिए इन सात महीनों में सरकार ने कौन-कौन-से क़दम उठाये, किसी को पता हो तो बताये.

बलात्कारी बैठे ठाले डरने लगेंगे क्या?

अब दिल्ली फिर एक बलात्कार से दहल उठी है. जो आरोपी है, उसके ख़िलाफ़ बलात्कार और छेड़छाड़ के कई मामले अब सामने आ रहे हैं. आरोप है कि वह कई महिलाओं से बलात्कार कर चुका है. ज़ाहिर है कि उसे किसी का डर नहीं था, न क़ानून का, न पुलिस का, न अदालत का. वह यहाँ दिल्ली में टैक्सी चलाता था. यहाँ 'निर्भय' कांड पर क्या हुआ, उसने देखा, अदालत का क्या फ़ैसला आया, यह भी उसे मालूम ही होगा, मुम्बई के शक्ति मिल कांड में अदालत का क्या फ़ैसला आया, यह भी उसे मालूम ही होगा. फिर भी उसे कोई डर नहीं था. उसे लगा कि वह पकड़ा नहीं जायेगा. बलात्कार के मामले में वह तीन साल पहले भी पकड़ा गया था. लेकिन बच निकला. ज़ाहिर है कि बलात्कार का कड़ा क़ानून बन गया, सब कुछ हो गया, लेकिन उसका डर किसे? लाख टके का सवाल यही है. डर क्यों नहीं है? इसलिए कि सरकार ने काग़ज़ी कार्रवाई पूरी कर दी, और बैठ गयी. क़ानून बन गया भाई, हम जो कर सकते थे, कर दिया, बस. बलात्कारियों को फाँसी होने लगेगी, उम्र क़ैद होने लगेगी, तो बलात्कारी डरने लगेंगे. अरे, डरेंगे तब न जब उन्हें पकड़े जाने का डर हो! लोग कड़े क़ानून से डरें, इसके लिए सरकार ने क्या किया? क्या लोगों में क़ानून का डर बैठाने के लिए कोई प्रचार अभियान कहीं चलाया गया? पुलिस मुस्तैद रहे, लोगों में डर हो कि पुलिस उन्हें पकड़ भी सकती है, इसके लिए सरकार ने क्या किया? बलात्कार के जो मामले पुलिस तक पहुँचें, उनकी सही तरीक़े से जाँच हो, इसके लिए कहाँ, किस सरकार ने क्या किया? बलात्कार पीड़ित और उसके परिवार को मुक़दमे के दौरान आरोपी डरा-धमका न सकें, इसके लिए सरकार ने क्या किया?

क़ानून के सिवा कुछ नहीं बदला

क़ानून बनाने के अलावा सरकार ने क्या किया? कुछ भी नहीं. तो जब क़ानून के सिवा कहीं कुछ न बदला हो, तो हालात में सुधार कैसे हो सकता है? जब कोई अगला बलात्कार होगा, फिर हंगामा मचेगा, फिर कुछ एलान हो जायेंगे और फिर कुछ काग़ज़ी ख़ानापूरी हो जायेगी और देश चलता रहेगा! अब शिवकुमार को ही सरकार का डर नहीं तो अमेरिकी कम्पनी उबर को या उस जैसी दूसरी कम्पनियों को क्यों किसी का डर हो? जो अब तक अपने 'पढ़े-लिखे' और 'नेट सैवी' ग्राहकों को एक 'नक़ली सुरक्षा' का धोखा बेच रही थीं. क्योंकि इन्हें मालूम है कि यहाँ जब तक कोई कांड न हो, न कोई जाँच होगी, न पड़ताल! और न यहाँ किसी का कभी ध्यान जायेगा कि नये-नये पनप रहे बिज़नेस माडलों के लिए नये नियम और नयी निगरानी की व्यवस्था ज़रूरी है. इसलिए इन कम्पनियों को भला काहे की चिन्ता? पिछले महीने ही एक महिला ने उबर को इसी शिव कुमार के ख़िलाफ़ बाक़ायदा एक मेल भेजी. किसी ने उस मेल को पढ़ा ही नहीं! क्योंकि कम्पनी को सीधा मतलब अपने कमीशन से था, जो उसे ड्राइवरों से मिलता है! अब सरकार की नज़र इस तरह की टैक्सी कम्पनियों पर गयी है. उन पर रोक लगायी जा रही है. कुछ दिन में कुछ नये नियम बन जायेंगे, टैक्सी कम्पनियाँ फिर से काम करने लगेंगी. सब कुछ सामान्य हो जायेगा. सब कुछ यथावत चलने लगेगा. बलात्कार होते रहेंगे, क्योंकि बलात्कार के ख़िलाफ़ जो ठोस क़दम उठने चाहिए, वह कभी उठेंगे ही नहीं. क्योंकि सरकारें ठोस क़दम उठा कर नहीं, बल्कि सिर्फ़ काग़ज़ों पर चलती हैं. क्योंकि यहाँ सब चलता है! जनता भी काग़ज़ पढ़ती है और अपनी राह चल देती है! दहेज और भ्रूण हत्याएँ रोकने के लिए भी कठोर क़ानून हैं. लेकिन अपने दिल पर हाथ रख कर बताइएगा कि कभी आपको इन क़ानूनों से कोई डर लगा? नहीं न! तो फिर शिवकुमार ही क्यों डरे? (लोकमत समाचार, 13 दिसम्बर 2014) http://raagdesh.com
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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