Follow Raagdesh

twitter google_plus linkedin facebook mail
Sep 21
यह राजनीति नहीं, राखनीति है!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 0 

सेकुलर पार्टियाँ मुज़फ़्फरनगर में ख़ुद अपने नेताओं को 'सेकुलर' क्यों नहीं रख पायीं? इसलिए कि सच यह है कि सेकुलरवाद में उनकी ख़ुद की कोई आस्था नहीं है. और उन्होंने वोटों की फ़सलें काटने के लिए सेकुलरवाद का जो राजनीतिक फ़ार्मूला समय-समय पर पेश किया, उसने एक अलग क़िस्म की साम्प्रदायिकता को पैदा किया, पाला-पोसा और बढ़ाया. जो नेता कल तक साम्प्रदायिक थे, वे पार्टी बदलते ही रातोंरात 'सेकुलर' हो जाते हैं!


muzaffarnagar-riots-and-vote-bank-politics
'राग देश' ईमेल पर मंगाएँ
Muzaffarnagar Riots | क़मर वहीद नक़वी | Communal Politics of Vote Bank |
दंगा आया और चला गया. एक बार फिर हमें नंगा कर गया. लेकिन इस बार जैसा दंगा आज से पहले कभी नहीं देखा. पहली बार इतने मुखौटे उतरे हुए देखे, पहली बार देखे सारे चेहरे कीचड़ सने हुए. पार्टी, झंडा, टोपी, निशान तो बस दिखाने के दाँत रहे, उनके खानेवाले दाँतों ने दंगे की भरपेट दावत उड़ायी. मुज़फ़्फ़रनगर ने सचमुच सारी राजनीतिक पार्टियों के कपड़े उतार दिये. जो चेहरे इतिहास में दंगों के लिए बदनाम रहे हैं, उनकी तो छोड़िये. वह कब आग भड़काने का कोई मौक़ा छोड़ते हैं! लेकिन ओढ़े गये 'सेकुलर' लबादों के नीचे छिपे साम्प्रदायिक भेड़ियों की डरावनी शक्लें पहली बार इस तरह बेनक़ाब हुईं!

All Parties Turned Communal in Muzaffarnagar Riots

हर नेता हुआ हिन्दू-मुसलमान!

क्यों, आख़िर ऐसा क्यों हुआ कि  मुज़फ़्फरनगर (Muzaffarnagar Riots) में हर राजनीतिक दल के नेता अपनी-अपनी पार्टी नहीं, बल्कि अपने-अपने सम्प्रदायों के नाम पर बँट गये? बीजेपी और समाजवादी पार्टी तो ख़ैर वैसे ही दंगों की साज़िश में गहरे तक डूबी मानी जा रही हैं, लेकिन बीएसपी, काँग्रेस और दूसरी पार्टियों के नेता भी क्यों भड़काऊ कारोबार में शामिल हो गये? और तो और, उस इलाक़े में कभी हिन्दू-मुसलिम एकता का अलख जगानेवाले किसान नेता चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के बेटे नरेश टिकैत को क्या हो गया कि वे अपने मरहूम पिता की विरासत को सहेजे नहीं रख पाये? आख़िर ऐसा क्या था कि आज़ादी के बाद पहली बार दंगों के अजगर ने गाँवों को अपनी चपेट में ले लिया, वह भी एक-दो नहीं, 94 गाँवों को?

Secularism and Vote Bank Politics

वोट बैंक से नत्थी सेकुलरवाद

इसीलिए इस दंगे के संकेत बेहद ख़तरनाक हैं. मुज़फ़्फ़रनगर बैरोमीटर है. उसने बता दिया कि देश के राजनीतिक-सामाजिक वायुमंडलीय दबाव की क्या स्थिति है. बरसों से चल रहे राजनीति के बेशर्म तमाशों ने देश के पर्यावरण में जो ज़हर लगातार घोला है, वह बढ़ते-बढ़ते अब यहाँ तक पहुँच गया है कि शहर, गाँव, गली, चौबारे सब पर उसका असर दिख रहा है.एक ओर हिन्दू राष्ट्र की भगवा राजनीति, दूसरी ओर सेकुलर समाज बनाने का संघर्ष. आज़ादी के बाद देश की यात्रा यहाँ से शुरू हुई थी. दो धाराएँ साफ़ थीं, हिन्दुत्व की और सेकुलरिज़्म की. हिन्दुत्व का अपना वोट बैंक था, बहुत छोटा. लेकिन वह धीरे-धीरे बढ़ता गया. क्यों? इसलिए कि हमने सेकुलरवाद को भी वोट बैंक से नत्थी कर दिया. सेकुलरवाद जीवनशैली होनी चाहिए थी, उसे पारदर्शी और ईमानदार होना चाहिए था, लेकिन वह बन गया वोट बैंक की राजनीति का अवसरवादी हथियार. सारी समस्या यही है. सारा ज़हर इसीलिए है.

कल तक साम्प्रदायिक, आज सेकुलर!

क्या विडम्बना है? सेकुलर पार्टियाँ मुज़फ़्फरनगर (Muzaffarnagar Riots) में ख़ुद अपने नेताओं को 'सेकुलर' क्यों नहीं रख पायीं? इसलिए कि सच यह है कि सेकुलरवाद में उनकी ख़ुद की कोई आस्था नहीं है. और उन्होंने वोटों की फ़सलें काटने के लिए सेकुलरवाद का जो राजनीतिक फ़ार्मूला समय-समय पर पेश किया, उसने एक अलग क़िस्म की साम्प्रदायिकता को पैदा किया, पाला-पोसा और बढ़ाया. जो नेता कल तक साम्प्रदायिक थे, वे पार्टी बदलते ही रातोंरात 'सेकुलर' हो जाते हैं! कल्याण सिंह समाजवादी पार्टी में आते हैं तो बाबरी मसजिद गिरा कर भी सेकुलर और वापस बीजेपी में पहुँचते हैं तो फिर से मसजिद ध्वंस पर 'गर्वित' हो जाते हैं. आज़म खाँ जैसे लोग अगर 'सेकुलर' माने जायें तो 'साम्प्रदायिक' किसे कहेंगे भाई? हर 'सेकुलर' पार्टी में ऐसे सैंकड़ों नाम हैं, कहाँ तक गिनायें.

अगर राजीव गाँधी जोखिम ले लेते!

तमाम 'सेकुलर' पार्टियों के सैंकड़ों ऐसे हथकंडे रहे, जिनसे उलटे उन्हें ही मदद मिली जो सेकुलरवाद के शत्रु थे. कौन जानता है कि 1985 में शाहबानो मसले पर तब के काँग्रेसी प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अगर राजनीतिक जोखिम उठाने का साहस दिखाया होता तो आज का भारत कैसा होता? सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को संसद ने क़ानून बना कर बेअसर कर दिया, मुसलमान इससे ख़ुश हो गये, हिन्दुओं में क्षोभ फैलना स्वाभाविक था. उन्हें बहलाने के लिए राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद का ताला खुलवा दिया गया, बाद में कांग्रेस के सहयोग से मन्दिर का शिलान्यास भी हो गया! यह था सेकुलरवाद का एक नमूना! मुसलमानों और हिन्दुओं दोनों को बहलाया गया, तो हुए न पूरी तरह सेकुलर!

बस पेंच यही है. इस सेकुलरवाद ने दोनों ओर की साम्प्रदायिकताओं के मुँह ख़ून लगा दिया. यही सेकुलरवाद की त्रासदी है. आज हर तरफ़ यही खेल है. यह राजनीति नहीं, राखनीति है, जो न रुकी तो एक दिन सब कुछ राख कर देगी. जनता को यह समझना चाहिए!

(लोकमत समाचार, 21 सितम्बर 2013)
 http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi
'राग देश' ईमेल पर मंगाएँ

ADD COMMENT
Most Viewed
muslim-population-myth-and-reality

क्यों बढ़ती है मुसलिम आबादी?

 

तो साल भर से रुकी हुई वह रिपोर्ट अब...
Posted On 24th Jan 2015 2:21 hrs
economic-backwardness-literacy-and-muslim-population-growth

मुसलिम आबादी मिथ, भाग-दो!
मुसलिम आबादी का मिथ - भाग दो! पहला भाग कब आया? शायद 'राग...
Posted On 27th Aug 2016 7:47 hrs
can-demonetisation-curb-black-money

तो क्या ख़त्म हो जायेगा काला धन?
बस एक महीने पहले ही मैंने 'राग देश' में लिखा था कि कुछ...
Posted On 12th Nov 2016 12:35 hrs
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
त्वरित टिप्पणी
तीन तलाक़ और नयी सोशल इंजीनियरिंग तीन तलाक़ पर फ़ैसले के बाद क्या अब एक नयी सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत होगी? और अगर ऐसा हुआ तो क्या देश की राजनीति में हम एक नया मोड़ देखेंगे? ठीक वैसे ही जैसे मंडल के बाद दलित-पिछड़ा राजनीति के बिलकुल नये समीकरण देखे गये थे. हालाँकि पिछले तीन साल में [..] Read More
Follow Us On Facebook

Recent Posts