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Jan 25
टोपी पहनाने की चौंसठ कलाओं का गणतंत्र!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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चौंसठ साल के हमारे गणतंत्र में नेता नये हों या पुराने, टोपी पहनें या न पहनें, लेकिन टोपी पहनाने की चौंसठ कलाओं में सब पारंगत हो चुके हैं. यह राजनीति भी अजब चीज़ होती है! यहाँ लोग अलग-अलग दिशाओं से अलग-अलग चेहरे लेकर आते हैं, अलग-अलग भाषा वाले, अलग-अलग बातें बोलते हुए आते हैं, लेकिन राजनीति के हौदे में गिरते ही सब एक ही कीचड़ में सन जाते हैं!


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आपको याद है, कोई नेता जी हुआ करते थे? अरे वही, जिन्होंने कहा था, 'तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा.' याद आ गया न! लेकिन अपने देश के सांसदों को तो अब कुछ याद नहीं. कौन नेता जी? आज तो इत्ते बड़े-बड़े नेता हैं देश में! छप्पन इंच की छाती वाले नेता से लेकर चार लाख के दाम वाली साइकिल चलाने वाले नेता तक, इत्ती बड़ी-बड़ी जेबों वाले नेता यहाँ हैं कि बेचारे कुबेर महाराज भी उनके घरों में पानी भरें, लेकिन उनकी जेबें न भर पायें! जेब तो जेब, बहुतों की हिस्ट्रीशीट से तो पुलिस थाने अटे पड़े हैं. हत्या, बलात्कार, डकैती के बड़े-बड़े तमग़ों से शोभायमान!

अब इतने बड़े लोगों को छोटी-छोटी बातें भला कहाँ याद रहती हैं? इसलिए न उन्हें आज़ादी याद है, न आज़ादी की लड़ाई, न आज़ादी के लिए मर-मिटने वाले दीवाने, न आज़ाद हिन्द फ़ौज, न नेता जी सुभाष चन्द्र बोस. इसलिए दो दिन पहले जब संसद परिसर में नेता जी की जयन्ती मनी, तो देश के मौजूदा क़रीब पौने आठ सौ सांसदों में से सिर्फ़ एक लालकृष्ण आडवाणी ही वहाँ नेता जी की तसवीर पर फूल चढ़ाने पहुँचे! और कुल तीन और पूर्व सांसद पहुँचे. यह है अपने देश की गौरव-गाथा!

यही गणतंत्र है भैया! वोट है तो जहान है

असल में ये आज़ाद हिन्द फ़ौज वाले नेता जी आज किसी को एक वोट भी नहीं दिला सकते! किसी जाति-धरम वाले वोट बैंक से बेचारे का कोई लेना-देना नहीं. उनकी जयन्ती मने, न मने, किसे फ़र्क़ पड़ता है? वरना बाक़ी कई नेताओं की जयन्तियाँ तो बड़े धूमधाम से मना करती हैं. सबके सब हाज़िरी लगाते हैं. ग़ैर-हाज़िर रहे और कहीं छप-छपा गया तो बैठे-बिठाये वोट बैंक बिदक सकता है! यही गणतंत्र है भैया! वोट है तो जहान है. नहीं है तो आप धूल-धक्कड़ खाती पुरानी तसवीर में टँगे पड़े रहो!

जितना ज़्यादा प्रेम दिखेगा, उतने ज़्यादा वोट

वोट है तो छप्पन इंच वाली छाती वाले मोदी जी के दिल में अचानक पटेल-प्रेम का सागर ठाठें मारने लगा. चुनावी मौसम में अकसर ऐसे प्रेम-रोगों के बैक्टीरिया पनप ही उठते हैं. और कहते हैं कि इश्क़ और मुश्क़ छिपाये न छिपे. और यह वोट वाला प्रेम तो होता ही है दिखाने के लिए. जितना ज़्यादा प्रेम दिखेगा, उतने ज़्यादा वोट मिलेंगे! अब बड़ा वोट चाहिए तो प्रेम भी बड़ा ही होना चाहिए न! और प्रेम बड़ा कैसे दिखे? एक ही तरीक़ा है कि अपने प्राणप्यारे की एक बड़ी लम्बी-चौड़ी मूर्ति बनवा दो! अमेरिकावालों से भी बड़ी. अब इतनी बड़ी मूर्ति होगी तो लोहा भी तो सारे देश से आये! गाँव-गाँव से आये! लोहा आये, वोट लाये! जय हो गणतंत्र की!

एक श्रीमान ईमानदार मुख्यमंत्री हैं. सादा जीवन, उच्च विचार वाले! राजनीति में पारदर्शिता होनी चाहिए. जो भी दोषी हो, बिना भेदभाव न्याय होना चाहिए. विचार तो सचमुच उच्च हैं. लेकिन उच्च विचार अकसर इतने ऊँचे होते हैं कि कोई उन्हें छू भी नहीं पाता. बस आप उन्हें देख सकते हैं, सुनहरे-सुनहरे, चमकीले-चमकीले अक्षरों में दूर ऊँचाई पर लिखे हुए. उन्हें ऊँचाई पर रखा ही इसलिए जाता है कि लोग अपने गन्दे हाथों से इन उच्च विचारों को छू न सकें, वरना बेचारे विचार गन्दे हो जायेंगे!

क़ानून मंत्री का क़ानून

उनके एक मंत्री हैं. बीस दिन में ही वह अपनी अल्लम-ग़ल्लम बातों के लिए काफ़ी नाम कमा चुके हैं. अपना मंत्रीपना दिखाते-दिखाते इन क़ानून मंत्री जी ने पुलिस को कुछ नया ही क़ानून पढ़ाना चाहा. क़ानून की किताब छोड़िए, क़ानून मंत्री का क़ानून मानिए! सबने देखा कि क्या हुआ, कैसे हुआ? मुख्यमंत्री जी ईमानदारी का चश्मा लगाते हैं. इसलिए उन्हें कुछ नहीं दिखा. शहर में बाक़ी बेईमान लोग रहते होंगे, इसलिए उन बेचारों को जो भी दिखा होगा, ग़लत ही दिखा होगा क्योंकि ईमानदारी का चश्मा है ही नहीं उन कमनसीबों के पास! सो मंत्री जी अपनी कुर्सी पर बदस्तूर क़ाबिज़ हैं.

अब कुछ सिरफिरे पूछ रहे हैं कि विधानसभा चुनाव में जब 'आप' के एक उम्मीदवार ने एक मामूली से पारिवारिक झगड़े की बात छिपा ली थी तो उस बेचारे को बीच चुनाव में क्यों बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था? इसीलिए न कि दुनिया को दिखाया जाय कि पार्टी नैतिक मर्यादाओं को लेकर कितनी सख़्त है! तब किसी ने माँग नहीं की थी कि उस उम्मीदवार को हटाओ. आज चारों तरफ़ से माँग है कि मंत्री को हटाओ. लेकिन घोषणा हो चुकी है कि मंत्री जी नहीं हटेंगे. मंत्री-उम्मीदवार न्याय का यह भेदाभेद अबूझ है न!

अपने गणतंत्र की यह आम परम्परा

वैसे अपने गणतंत्र की यह आम परम्परा है. नेताओं पर आरोप लगते ही रहते हैं. लीपपोत कर, ढाँक-तोप कर, ऐसे या वैसे, कैसे भी नेता पर लगे आरोपों को टरका ही दिया जाता है. अब तक हज़ारों ऐसे मामले उछले और बिसरे, आये और गये. किसे क्या फ़र्क़ पड़ा? दिल्ली की 'ईमानदार' सरकार ने भी वही किया, जो बाक़ी की कोई भी सरकारें करती हैं. बस फ़र्क़ यही है कि बाक़ी की सरकारें अपने मंत्री को बचाने के लिए धरने पर नहीं बैठतीं, सीधे लीपपोत का रास्ता चुनती हैं. 'आप' ने भी लीपपोत का रास्ता चुना, लेकिन वाया धरना! फ़र्क़ बस यही है.

चौंसठ साल के हमारे गणतंत्र में नेता नये हों या पुराने, टोपी पहनें या न पहनें, लेकिन टोपी पहनाने की चौंसठ कलाओं में सब पारंगत हो चुके हैं. यह राजनीति भी अजब चीज़ होती है! यहाँ लोग अलग-अलग दिशाओं से अलग-अलग चेहरे लेकर आते हैं, अलग-अलग भाषा वाले, अलग-अलग बातें बोलते हुए आते हैं, लेकिन राजनीति के हौदे में गिरते ही सब एक ही कीचड़ में सन जाते हैं! ज़रूर कुछ तो मजबूरी होती ही होगी! हम ही शायद नासमझ हैं या फिर समझ कर भी नहीं समझते कि मजबूरी में क्या-क्या नहीं करना पड़ता है?
(लोकमत समाचार, 25 जनवरी 2014)
© 2014 http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

email: qwnaqvi@raagdesh.com

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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