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Jul 11
व्यापम बाहर नहीं, अन्दर है!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 7 

व्यापम इस बात का सबूत है कि भ्रष्टाचार ऊपर से ले कर नीचे तक कैसे सर्वव्यापी हो चुका है. यानी अब हालत यह है कि आप अपने डाक्टर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट, वैद्य, नर्स, वकील वग़ैरह-वग़ैरह की योग्यता पर भी भरोसा नहीं कर सकते कि उसने जो डिग्री टाँग रखी है, वह उसके वाक़ई लायक़ है भी या नहीं! जो शिक्षक फ़र्ज़ी तरीक़ों से नौकरी पा गये, वे बच्चों को क्या पढ़ा रहे होंगे, समझा जा सकता है.


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सब तरफ़ व्यापम ही व्यापम है! वह व्यापक है, यहाँ, वहाँ, जहाँ नज़र डालो, वहाँ व्याप्त है! साहब, बीबी और सलाम, ले व्यापम के नाम, दे व्यापम के नाम! व्यापम देश में भ्रष्टाचार का नया मुहावरा है, जिसमें कोई एक, दो, दस-बीस, सौ-पचास का भ्रष्टाचारी गिरोह नहीं, हज़ारों हज़ार भ्रष्टाचारी हैं. नेता से लेकर जनता तक, सबने इस गोरखधन्धे में अपनी-अपनी मलाई खाई. सोर्स-सिफ़ारिश, धनबल, बाहुबल, देह शोषण से लेकर क्या नहीं हुआ एडमिशन और नौकरियाँ लेने-देने के फेर में! यह शायद देश में भ्रष्टाचार का ऐसा पहला मामला है, जो आम घरेलू परिवार से लेकर सत्ता के गलियारों और शिखर तक, वकील, डाक्टर, मीडिया, अफ़सर, पुलिस से लेकर क़ानून के दरवाज़ों तक एक समान रूप से व्याप्त हुआ. ऐसे व्यापी व्यापम में कौन नहाया, कौन नहीं नहा पाया, कौन जाने?

चारे से व्यापम तक!

ज़ाहिर-सी बात है कि व्यापम जब बना होगा, तब इस काम के लिए नहीं बना होगा, जिसके कारण आज वह इतना बदनाम हो चुका है. वह बनाया इसलिए गया था कि राज्य के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षाओं के लिए कोई एक मानक हो सके, कोई एक तंत्र हो जो सही तरीक़े से इन परीक्षाओं का संचालन करे. और नतीजा क्या हुआ? इसने भ्रष्टाचार के एक सुसंगठित और विशाल तंत्र को जन्म दे दिया, जिसमें एक-एक कर सब शामिल होते चले गये!
बिहार का चारा घोटाला, उत्तर प्रदेश का एनआरएचएम घोटाला और पुलिस भर्ती घोटाला, हरियाणा का शिक्षक भर्ती घोटाला और मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला, अलग-अलग पार्टियाँ, अलग-अलग सरकारें, अलग-अलग प्रदेश, लेकिन कहानी लगभग वही, तरीक़े भी लगभग वही, चरित्र भी कमोबेश लगभग वही और घोटालों से सत्ता का रिश्ता भी लगभग वही. इनमें चारा घोटाला, एनआरएचएम घोटाला और व्यापम घोटाले में तो रहस्यमय मौतों की कहानी भी लगभग वही. इसमें अब अगर 2 जी, कोयला ब्लाक आवंटन और राष्ट्रमंडल खेल घोटालों को भी जोड़ दें तो तसवीर पूरी हो जाती है! फिर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कौन कुछ करेगा या करना चाहेगा? इसलिए भ्रष्टाचार के छोटे-बड़े मामलों की ख़बरें लगातार आती-जाती रहती हैं, छपती रहती हैं, कुछ मामले तो पहले ही दब-दबा जाते हैं, कुछ पर जाँच शुरू होती है, कुछ में सबूत नहीं मिलते, जिनमें मिल जाते हैं, वे मामले अदालत पहुँचते हैं, उनमें कुछ में ही सज़ा हो पाती है, बाक़ी छूट जाते हैं और राजकाज यथावत चलता रहता है! ज़ाहिर है कि राजनीति चला रहे लोग तो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कुछ करने से रहे. उनके लिए भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प चुनाव दर चुनाव महज़ एक जुमला है!

अन्ना आन्दोलन क्यों हुआ हवा-हवाई?

अन्ना हज़ारे ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बड़ा आन्दोलन छेड़ा. पूरा देश सड़कों पर आ गया. लेकिन हुआ क्या? होना भी क्या था? वह आन्दोलन जनता को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सड़कों पर तो उतार लाया, वह राजनीति को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की बात तो करता था, लेकिन जनता को भ्रष्टाचार से मुक्त करना उसका एजेंडा नहीं था. जनता भ्रष्टाचार से लड़े, घर-घर और गली-गली भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कोई चेतना फैलायी जाये, और भ्रष्टाचार जब तक लोक-संस्कार में वाक़ई अस्वीकार्य न बना दिया जाये, तब तक उसके ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रहे, ऐसा कोई एजेंडा, ऐसी कोई योजना, ऐसा कोई इरादा, ऐसी कोई तैयारी अन्ना आन्दोलन में थी ही नहीं, इसलिए एक लोकपाल की घोषणा के बाद अन्ना चुसे हुए आम जैसे बेकार हो गये! और हुआ क्या? लोकपाल अब तक नहीं आया! कब आयेगा, पता नहीं! और आ भी जायेगा, तो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कुछ कर पायेगा, कह नहीं सकते!

हम सब में थोड़ा-थोड़ा व्यापम!

व्यापम इस बात का सबूत है कि भ्रष्टाचार ऊपर से ले कर नीचे तक कैसे सर्वव्यापी हो चुका है. यानी अब हालत यह है कि आप अपने डाक्टर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट, वैद्य, नर्स, वकील वग़ैरह-वग़ैरह की योग्यता पर भी भरोसा नहीं कर सकते कि उसने जो डिग्री टाँग रखी है, वह उसके वाक़ई लायक़ है भी या नहीं! जो शिक्षक फ़र्ज़ी तरीक़ों से नौकरी पा गये, वे बच्चों को क्या पढ़ा रहे होंगे, समझा जा सकता है. और भ्रष्टाचार यहीं तक नहीं रुकता. आपके खाने में मिलावट है, दवा नक़ली है, सब्ज़ी और फल में कीटनाशक का ज़हर है, दूध सिंथेटिक है, पर्यावरण ख़राब है, नदी ज़हरीली हो गयी, यह सब किसी न किसी के भ्रष्टाचार का ही नतीजा है.
और व्यापम इस बात का भी सबूत है कि भ्रष्टाचार न होने देने के लिए हम जितने नये तंत्र बनाते हैं, उनमें से ज़्यादातर उस भ्रष्टाचार को और ज़्यादा व्यापक, और ज़्यादा संस्थागत बना देते हैं. क्यों? इसलिए कि व्यापम बाहर नहीं, अन्दर है! अन्दर झाँकिए जनाब. हम सबमें थोड़ा-थोड़ा व्यापम है. जिस दिन उसे ख़त्म कर देंगे, बाहर का व्यापम अपने आप ख़त्म हो जायेगा! है कोई अन्ना हज़ारे यह चुनौती लेने के लिए तैयार?
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  • lovely Qamar sir… sorry been too busy with the vagaries of life so got to it very late…
    sharing it 🙂

    • qwn

      Thank you Archana for sharing and for your kind appreciation.

  • inducares

    Bahut achha likhte hain aap.
    Pata nahin hamara hi desh itna bhrasht kyun hai aur kab tak rahega.Hum sab ek daldal mein hain.

    • qwn

      धन्यवाद इन्दु जी.
      सच कहा आपने. बिलकुल दलदल जैसी ही स्थिति है. हर दिन कीचड़ में कुछ और नीचे धँसते जा रहे हैं. और समाधान कहीं दिखता नहीं.

  • डॉ जीवन लाल मुखरैया

    प्रिय पत्रकार जगत के साथी आप
    सब के सत्यानबेषि नजरिये सेआपका देखना बंद कर देने से ही देश यहाँ तक पहुँच गया है समाचार पत्रो में भी T.R.P.बढ़ाने की होड़ लगी है पहले समाचार पत्र देश की अस्मिता और अस्तितब को केन्दर् में रख कर बिश्लेष्णात्मक संपादकीय लिखते थे जिसका पाठक रोज सुबह नाश्ते चाय पानी के समय इंतजार करते थे अब हम समाचार पत्रो में क्या परोस रहे हैं बह बिचरणीय है इस तरफ हमको लौटना होगा देश से बडा क्या है कुछ भी नहीँ ये सोच नागरिको का होता था अब हम सब मुद्रा के कीडे हो गए चाहे देश की अस्मिता लुटे या अस्तितब लुटे बस पैसा हाय पैसा नेतिक चरित्र में भी हम भूला चुके है शिक्षा का स्तर भी इतिहास रास्ट्र नैतिकता और भारतीयता की शिक्षा से कोसो दूर चला गया है ।
    चरित्र जब गिरता है तो व्यापम जैसे मामले बनते है हम धन्यबाद देना चाहेंगे श्री शिवराज सिंह चौहान को की प्रकरण ज्ञान में आने के साथ ही उनने बिना बिलंब किये संज्ञान लेकर जाँच प्रारम्भ की और अभी भी मांग पर C.I.D. janch के लिए सहमति रिकमंदसन कर कर एक साहसिक कदम उठाया जिसे उनकी ईमानदारी निष्ठा की पारदर्शिता प्रमाणित होती है दूसरा पक्ष अब वंद का राग अलाप रहा है बो भी ईद के त्यौहार पर ये क्या हमारा चरित्र हो गया है यह सब निस्पक्ष् भाब मिडिया और समाचार को ऑब्जरब करना चाहिए बस यही मेरे बिचारो का सार तटब है जो आप से शेयर कर रहा हूँ आपके बिचारो को पडा समझा और जाना जनक खुशी हुई की भारत माता अभी बाँझ नहीं हुई है आप जैसे सपूत दिए है ।
    जय हिन्द ।

    • qwn

      धन्यवाद मुखरैया जी. प्रसन्नता हुई कि मेरी बात आपको अच्छी लगी. वैसे व्यापम मामले को लेकर शिवराज सिंह चौहान के निकटवर्ती लोगों पर काफ़ी उँगलियाँ उठ रही हैं. देखते हैं कि अब सीबीआई जाँच से क्या पता चलता है.

  • Hi Sir,
    Very nice Post.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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