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May 20
अनेक, नेक और कुछ बेनेक शुरुआतें!
त्वरित टिप्पणी  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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हमारे लिए बेचैनी के कुछ और बड़े कारण हैं. तमाम लोकतांत्रिक उपकरणों को लगातार कमज़ोर किया जा रहा है. जिस लोकपाल पर इतना हल्ला-ग़ुल्ला मचा, वह ठंडे बस्ते में पड़ा है.  सूचना के अधिकार के प्रति मोदी सरकार की उदासीनता उल्लेखनीय है. लोगों को याद होगा कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी का रुख़ लोकायुक्त की नियुक्ति के बारे में क्या रहा था! पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी ने जिस प्रकार न्यायपालिका को जिन शब्दों में चेतावनी दी, वह सबके सामने है. विह्सिल ब्लोअर बिल में सरकार जिस तरह के संशोधन करना चाहती है, उसके बाद भ्रष्टाचार की शिकायत करना किसी के लिए अपने गले में ख़ुद फंदा डालने जैसा हो जायेगा. चर्चा है कि एक उद्योगपतियों की एक संस्था के एक कार्यक्रम में कुछ लोगों ने इस पर चिन्ता जतायी कि सरकार अभी तक कुछ ठोस नहीं कर पायी तो उसे सन्देश भिजवाया गया कि यह बात प्रधानमंत्री को पसन्द नहीं आयी. इसी तरह नागरिक समूहों और एनजीओ को लेकर सरकार की नापसन्दगी बताती है कि मोदी की अधिनायकवादी सोच अब सिर उठाने लगी है. मोदी सरकार की यह शुरुआत कहीं से उसकी नेकनीयती नहीं दर्शाती.


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'साल एक, शुरुआत अनेक'- और 'मोदी सरकार, विकास लगातार'-- अपनी पहली सालगिरह की मार्केटिंग मोदी सरकार इन नारों के साथ करनेवाली है! सरकार एक साल में अपनी तीन सौ उपलब्धियों की लम्बी-चौड़ी सूची भी पेश करने वाली है. 365 दिन और तीन सौ उपलब्धियाँ! औसतन हर दिन एक नयी उपलब्धि! उपलब्धियों की इस 'भव्य' कहानी की पच्चीस करोड़ पुस्तिकाएँ बाँटे जाने की योजना है. दूरदर्शन पर बीस बड़े मंत्रियों के इंटरव्यू के साथ सघन प्रचार अभियान की तैयारी है. सत्ता के गलियारों से जुड़े लोगों का कहना है कि किसी सरकार की मार्केटिंग की इतनी भारी-भरकम क़वायद उन्होंने आज से पहले कभी नहीं देखी!

तो यह भी एक नयी शुरुआत है! भव्य प्रचार की शुरुआत! वैसे यह एक 'स्मार्ट' रणनीति है, ख़ास कर इसलिए कि पिछले तीन-चार महीनों से देश-विदेश के अख़बारों में, निवेशकों, उद्योगपतियों और नीति-विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर आम तौर पर चिन्ता होने लगी थी कि नरेन्द्र मोदी ने बातें तो बहुत कीं, लेकिन कोई बड़ा तीर नहीं मार पाये. किसानों और ग़रीबों में भी सरकार की बड़ी नकारात्मक 'कारपोरेट-परस्त' छवि बनी. ज़ाहिर है कि इस छवि को ध्वस्त करने के लिए इससे बेहतर तरीक़ा और क्या हो सकता है कि लोगों को ऐसे 'भव्य रस' में सराबोर कर दिया जाये कि वह हाल में अपने भीतर उपजी निराशाओं पर ही शक करने लगें!

सरकार का प्रचार अपनी जगह, लेकिन सच में कैसा बीता सरकार का पहला साल? क्या वाक़ई यह तीन सौ उपलब्धियों का साल रहा, अनेक शुरुआतों का साल रहा या महज़ निराशाओं भरा साल रहा, जैसा कि विपक्ष आरोप लगाता है? आप मुझसे पूछिए तो मैं कहूँगा कि मोदी सरकार के एक साल में मेरे लिए कोई अचम्भे वाली कोई बात नहीं निकली. जैसा सोचा था, ठीक-ठीक वैसा ही हुआ. इसी अख़बार में तेरह-चौदह महीने पहले यानी लोकसभा चुनाव से भी पहले लिखे मेरे लेखों में जो अन्दाज़े लगाये गये थे, चीज़ें कमोबेश वैसी ही घटित हुईं.

मोदी सरकार ने अपनी शुरुआत बड़ी भव्य की. सार्क प्रमुखों को शपथ-ग्रहण में बुलाया. तब शायद कम लोग समझ पाये होंगे कि अगले एक साल में मोदी के एजेंडे में विदेश नीति कितनी अहम होनेवाली है. और फिर कुछ ही दिनों बाद, ख़बर कह लीजिए या अफ़वाहें कह लीजिए, यह बात फैली कि किस तरह मोदी को सब पता लग जाता है कि उनका कौन मंत्री किस तरह के कपड़ों में एयरपोर्ट जा रहा है, कौन मंत्री मुम्बई में किस उद्योगपति के साथ अभी डिनर पर जानेवाला है और किसका रिश्तेदार ट्राँसफ़र-पोस्टिंग में दिलचस्पी ले रहा है. उसके बाद से किसी मंत्री के बारे में ऐसी कोई ख़बर नहीं आयी! और फिर यह चर्चाएँ सामने आयीं कि बड़े-बड़े अफ़सरों ने दिल्ली के मश्हूर गोल्फ़ क्लब से अपनी सदस्यता रद्द करा दी है! यह दिल्ली में मोदी सरकार की शुरुआत थी!

इसलिए अब अगर ऐसी चर्चाएँ सामने आती हैं कि सरकार का सारा काम प्रधानमंत्री कार्यालय से चलता है, सारी फ़ाइलें वहीं जाती हैं, इसलिए बहुत-से फ़ैसले अटके रहते हैं, मोदी अकसर अफ़सरों से सीधे बात कर फ़ैसले कर लेते हैं, मंत्रियों को कुछ पता नहीं रहता, तो इसमें हैरानी की क्या बात? यह तो मोदी के काम करने की ख़ास अधिनायकवादी शैली है!

इसलिए मोदी सरकार के काम का आकलन बाक़ी सरकारों के पैमाने पर नहीं हो सकता. मोदी सरकार को हमें दो पैमानों पर देखना होगा, एक सरकार का कामकाज जो उससे अपेक्षित है और दूसरा लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रक्रियाओं के बारे में सरकार का आचरण और इरादे! जहाँ तक कामकाज की बात है, पूरे साल मोदी की विदेश यात्राएँ ही छायी रहीं. इसमें मोदी के तीन एजेंडे थे. एक, विदेशी निवेश लाना ताकि देश में आर्थिक विकास की गाड़ी फिर से दौड़ सके, दो, भारत की विदेश नीति को थोड़ा दमख़मदार दिखाना और तीन, विश्व मंच पर अपने आपको नेहरू से भी बड़े विश्व नेता के रूप में स्थापित करना. और इसीलिए पूरे साल किसी न किसी रूप में नेहरू-पटेल-सुभाष विवाद को हवा दी जाती रही. बहरहाल, अपने दूसरे और तीसरे एजेंडे में मोदी काफ़ी हद तक सफल रहे, लेकिन आर्थिक एजेंडे पर ज़्यादा बात अभी बन नहीं पायी.

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हालाँकि इसमें शक नहीं कि मोदी ने पिछले एक साल में कई महत्त्वाकाँक्षी योजनाओं की नेक शुरुआत की. 'मेक इन इंडिया', 'डिजिटल इंडिया', 'स्किल इंडिया', मुम्बई दिल्ली औद्योगिक कारीडोर, 'स्मार्ट सिटी' वग़ैरह, लेकिन सच यह है कि इतनी विदेश यात्राओं के बाद न तो कोई बड़ा प्रवासी भारतीय निवेशक और न कोई बड़ा विदेशी निवेशक अभी इन योजनाओं में निवेश का जोखिम लेने को तैयार है. इसका कारण यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का इंजन अभी तक लगभग जाम है. कृषि विकास दर 3.7% से गिर कर 1.1% प्रतिशत पर आ गयी है, कारपोरेट क्षेत्र के नतीजे भी उत्साहवर्धक नहीं रहे हैं, देश की पाँच सौ शीर्ष कम्पनियों में से एक तिहाई की हालत यह है कि अपने क़र्ज़ का ब्याज चुका पाना भी उन्हें भारी पड़ रहा है, बैंक एनपीए और डूबे क़र्ज़ों की समस्या से जूझ रहे हैं, इसलिए औद्योगिक क़र्ज़ की विकास दर सिकुड़ कर महज़ 3.5 फ़ीसदी रह गयी है. सरकार ने अर्थव्यवस्था की दशा-दिशा बदलने के लिए कोई बड़ा क्रान्तिकारी उपाय नहीं किया, हालाँकि चालू खाते और राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखने के लिए कई ख़र्चों में कटौती की, जिसकी मार स्वास्थ्य, शिक्षा, लोककल्याण की तमाम योजनाओं और मनरेगा पर पड़ी. ज़ाहिर है कि इसका ख़ामियाज़ा ग़रीबों को ही भुगतना पड़ा.

अर्थव्यवस्था में सुधार न हो पाना सरकार की सबसे बड़ी चुनौती भी है और चिन्ता भी क्योंकि मोदी बड़े-बड़े करिश्मों की उम्मीद जगा कर सत्ता में आये थे, इसीलिए अब लोगों की बेचैनी बढ़ रही है. लेकिन हमारे लिए बेचैनी के कुछ और बड़े कारण हैं. एक तो यह कि तमाम लोकतांत्रिक उपकरणों को लगातार कमज़ोर किया जा रहा है. जिस लोकपाल पर इतना हल्ला-ग़ुल्ला मचा, वह ठंडे बस्ते में पड़ा है. सांविधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और उनकी सशक्त उपस्थिति में सरकार की दिलचस्पी नहीं दिखती. इन संस्थाओं में ज़्यादातर में ख़ाली हुए पदों पर भर्तियाँ नहीं हुईं. सूचना के अधिकार के प्रति मोदी सरकार जिस प्रकार की उदासीनता दिखा रही है, वह उल्लेखनीय है. लोगों को याद होगा कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी का रुख़ लोकायुक्त की नियुक्ति के बारे में क्या रहा था! पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी ने जिस प्रकार न्यायपालिका को जिन शब्दों में चेतावनी दी, वह सबके सामने है. विह्सिल ब्लोअर बिल में सरकार जिस तरह के संशोधन करना चाहती है, उसके बाद भ्रष्टाचार की शिकायत करना किसी के लिए अपने गले में ख़ुद फंदा डालने जैसा हो जायेगा. चर्चा है कि एक उद्योगपतियों की एक संस्था के एक कार्यक्रम में कुछ लोगों ने इस पर चिन्ता जतायी कि सरकार अभी तक कुछ ठोस नहीं कर पायी तो उसे सन्देश भिजवाया गया कि यह बात प्रधानमंत्री को पसन्द नहीं आयी. इसी तरह नागरिक समूहों और एनजीओ को लेकर सरकार की नापसन्दगी बताती है कि मोदी की अधिनायकवादी सोच अब सिर उठाने लगी है. मोदी सरकार की यह शुरुआत कहीं से उसकी नेकनीयती नहीं दर्शाती.

दूसरी तरफ़, शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, कला और इतिहास के क्षेत्र में खुल कर संघ के एजेंडे पर काम शुरू हो गया है. क़रीब-क़रीब सभी महत्त्वपूर्ण संस्थाओं से नामी-गिरामी विशेषज्ञों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है और उनकी जगह संघ कार्यकर्ताओं को लाया जा रहा है. मोदी सरकार पर संघ की कितनी पकड़ है, इसका अन्दाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार के एक साल के कामकाज की समीक्षा के लिए अमित शाह और राजनाथ सिंह समेत कई लोगों से संघ-प्रमुख लम्बी-लम्बी बैठकें कर रहे हैं. हालाँकि कुछ आर्थिक मुद्दों पर मोदी और संघ की नीतियों में बड़ा फ़र्क़ है और वे कोई बीच का रास्ता निकाल ही लेंगे, लेकिन बाक़ी तमाम मुद्दों पर तो तमाम आलोचनाओं के बावजूद सरकार संघ के रास्ते पर ही चल रही है. मोदी सरकार की यह नयी शुरुआत भी लोकतंत्र के बजाय कहीं और जाती है.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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