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Dec 17
नोटबंदी क्या एक ‘अनाड़ी’ फ़ैसला था?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 3 

'लेस-कैश इकॉनॉमी' बनाने का काम पुरानी करेन्सी में नहीं हो सकता था क्या? बड़ी आसानी से हो सकता था. आप पुरानी करेन्सी के और नये नोट जारी ही न करते, बैंकों में लौटनेवाली सारी करेन्सी को वापस चलन में डालने से धीरे-धीरे रोकते रहते, तो कुछ दिनों में चलन में करेन्सी कम हो ही जाती. 'कैशलेस' लेनदेन को बढ़ावा देना था, तो देते. ख़ूब देते. यह भी उतना कठिन काम नहीं था. बस एक क़ानून बनाना था और एक सीमा तय करनी थी कि इस रक़म के ऊपर का कोई लेनदेन नक़द में नहीं होगा. इसके लिए नोटबंदी की क्या ज़रूरत  थी?


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घबराइए नहीं. नक़दी की कड़की ख़त्म होनेवाली है! सरकार ने एलान कर दिया है कि जो पुराने नोट बाज़ार में वास्तविक रूप से चलन में थे, उनके आधे मूल्य के नये नोट दिसम्बर के अन्त तक बैंकों में पहुँच जायेंगे. और जो कुल करेन्सी बन्द हुई है, उसके तीन-चौथाई मूल्य की नयी करेन्सी जनवरी के दूसरे हफ़्ते तक आ जायेगी. <

जनवरी के दूसरे हफ़्ते तक क्यों? इसलिए कि नोटबंदी को लेकर अब बीजेपी और संघ में घंटियाँ बजने लगी हैं. ख़बरें हैं कि संघ के अपने संगठन 'लघु उद्योग भारती' ने छोटे और मँझोले उद्योगों के सर्वेक्षण के बाद 'चिन्ताजनक' रिपोर्ट दी है. इसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश से आये बीजेपी सांसदों के एक दल ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को बताया कि अगर मध्य जनवरी तक नक़दी की समस्या दूर नहीं हुई, तो उत्तर प्रदेश चुनाव में लुटिया डूब सकती है.

तो अब आप समझ ही गये होंगे कि आख़िर जनवरी के दूसरे हफ़्ते तक तीन-चौथाई करेन्सी की भरपाई की बात क्यों कही जा रही है? हालाँकि इतनी जल्दी इतने सारे नये नोट कैसे छप पायेंगे, यह समझ में नहीं आता. नोट छापनेवाले प्रेसों के पिछले दो बरसों के आँकड़ों को देखें तो वह साल भर में उतने नोट भी नहीं छाप पाये, जितने का लक्ष्य उन्हें दिया गया था. बहरहाल, सरकार कह रही है, तो भरोसा तो करना ही पड़ेगा!

हर दिन बदलती सरकार की भाषा

लेकिन अब तो समझ में नहीं आता कि सरकार की किस बात पर भरोसा करें? सरकार की भाषा तो हर दिन बदलती रही है, नोटबंदी को लेकर नियम तो हर दिन बदलते रहे हैं. कल जो कहा था, वह आज माना जायगा या नहीं, किसी को पता नहीं. नोटबंदी क्यों हुई? पहले कहा गया कि काला धन निकलेगा. फिर 'कैशलेस इकॉनॉमी' का जुमला आया. फिर कहा गया कि नहीं, नहीं, आपने ग़लत समझा था. 'कैशलेस इकॉनॉमी' की बात कही तो गयी थी, लेकिन मतलब 'लेस-कैश इकॉनॉमी' यानी कम नक़दी की अर्थव्यवस्था से था! चलिए मान लिया कि 'लेस-कैश इकॉनॉमी' की बात थी. लेकिन फिर यह बात समझ में नहीं आयी कि 'लेस-कैश इकॉनॉमी' के लिए आख़िर नोटबंदी की ज़रूरत क्या थी?

पुरानी करेन्सी में क्यों नहीं 'लेस-कैश इकॉनॉमी?'

'लेस-कैश इकॉनॉमी' बनाने का काम पुरानी करेन्सी में नहीं हो सकता था क्या? बड़ी आसानी से हो सकता था. आप पुरानी करेन्सी के और नये नोट जारी ही न करते, बैंकों में लौटनेवाली सारी करेन्सी को वापस चलन में डालने से धीरे-धीरे रोकते रहते, तो कुछ दिनों में चलन में करेन्सी कम हो ही जाती. 'कैशलेस' लेनदेन को बढ़ावा देना था, तो देते. ख़ूब देते. यह भी उतना कठिन काम नहीं था. बस एक क़ानून बनाना था और एक सीमा तय करनी थी कि इस रक़म के ऊपर का कोई लेनदेन नक़द में नहीं होगा. चेक या डिमांड ड्राफ़्ट या क्रेडिट-डेबिट कार्ड या ऑनलाइन ही होगा. इसके लिए नोटबंदी की ज़रूरत नहीं थी, बल्कि इलेक्ट्रानिक लेनदेन के लिए इंफ़्रास्ट्रक्चर बनाने की ज़रूरत थी, जो अभी देश में है ही नहीं.

ज़ाहिर है कि नोटबंदी 'लेस-कैश इकॉनॉमी' के लिए की ही नहीं गयी थी क्योंकि उसके लिए ऐसा करने की ज़रूरत ही नहीं थी. नोटबंदी इसलिए की गयी थी कि काला धन पकड़ में आ जाये. लेकिन हुआ उलटा और धन-धुलाई के नये-पुराने कारख़ाने धड़ल्ले से चल पड़े. मजबूरन सरकार ने लोगों को अब मौक़ा दिया है कि वह मार्च 2017 तक अपनी काली कमाई घोषित कर दें. यानी बात साफ़ है. नोटबंदी से वह हुआ नहीं, जैसा सोच कर उसे लागू किया गया था.

ये सारी बातें क्यों नहीं सोची गयीं?

अब नोटबंदी के चालीस दिन बाद जब काफ़ी कुछ नतीजे हमारे सामने हैं, तो यह सवाल पूछा जाना जायज़ है कि नोटबंदी क्या एक 'अनाड़ी' फ़ैसला था? क्या इस 'ऐतिहासिक अभूतपूर्व' मिशन पर काम करनेवाली 'चुनिन्दा टीम' ने कुछ आगा-पीछा सोचा था? आख़िर किसी ने यह कैसे नहीं सोचा कि नोटबंदी के बाद काले धन की धुलाई के लिए लोग क्या-क्या कर सकते हैं. धन धोने के लिए लोग वही पुराने तरीक़े अपना रहे हैं, जो वह बरसों से करते आ रहे हैं. तब यह क्यों नहीं सोचा गया कि बैंकिंग का भ्रष्ट तंत्र इस धन-धुलाई में अपनी कमाई क्यों नहीं करेगा?

2013 में कोबरापोस्ट ने 22 सरकारी और निजी बैंकों में स्टिंग ऑपरेशन कर दिखाया था कि कैसे वे सब बेधड़क धन-धुलाई में लगे थे. तो नोटबंदी में वह धन-धुलाई में सहायक नहीं होंगे, यह अगर नहीं सोचा गया, तो इसे अनाड़ीपन के अलावा और क्या कहा जायेगा?

और अगर नोटबंदी का मक़सद काला धन पकड़ने के साथ-साथ 'कैशलेस' या 'लेस-कैश' इकॉनॉमी की तरफ़ बढ़ना था, तो ऐसा किस आधार पर सोचा गया? देश के बड़े हिस्से में बैंकिंग नेटवर्क है नहीं, सवा अरब की आबादी में सिर्फ़ 37 करोड़ लोगों के पास इंटरनेट मोबाइल है. कह सकते हैं कि इतने लोग तो डिजिटल लेनदेन कर ही सकते हैं. हाँ, कर तो सकते हैं, लेकिन बाधा क्या है? आगे देखते है.

क्रेडिट-डेबिट कार्ड के आँकड़े

अभी देखते हैं क्रेडिट-डेबिट कार्ड के इस्तेमाल के आँकड़े. देश में केवल ढाई करोड़ क्रेडिट कार्ड और उससे 27 गुना यानी क़रीब 69 करोड़ डेबिट कार्ड हैं. लेकिन ख़रीदारी में इनका हिस्सा बिलकुल उलटा है. रिज़र्व बैंक के आँकड़े बताते हैं कि 95% ख़रीदारी क्रेडिट कार्ड से होती है और डेबिट कार्ड से सिर्फ़ पाँच प्रतिशत. डेबिट कार्ड को लोग बस एटीएम की तरह इस्तेमाल करते हैं. हालाँकि कई लोग ऐसे हैं, जिनके पास कई-कई क्रेडिट और डेबिट कार्ड हैं. इसलिए क्रेडिट-डेबिट कार्ड रखनेवालों की वास्तविक संख्या कहीं कम है. फिर भी ज़रा सोचिए कि अगर ये सारे लोग कार्ड से ख़रीदारी करने लगें तो मौजूदा इंफ़्रास्ट्रक्चर क्या उसका बोझ उठाने लायक़ है? क़तई नहीं. अभी पिछले रविवार की शाम को इसका नमूना देखने को मिला, जब देश के कई बड़े शहरों में दो घंटे तक कार्ड से भुगतान बाधित रहा, क्योंकि इंफ़्रास्ट्रक्चर लेनदेन के अचानक बढ़ गये दबाव को झेल नहीं पाया.

ई-वालेट की परेशानी

यही हाल ई-वालेट का है. ग्राहक बढ़ गये, लेकिन ई-वालेट कम्पनियों की क्षमता उतना बोझ सँभाल पाने की है ही नहीं, तो रोज़ तरह-तरह की शिकायतें सुनने को मिल रही हैं. कभी भुगतान नहीं होता, कभी वालेट से पैसा 'ग़ायब' हो जाता है. ज़ाहिर है कि डिजिटल लेनदेन की देश में कोई तैयारी थी नहीं. इसलिए नोटबंदी का मक़सद डिजिटल या कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देना कैसे हो सकता था?

और कार्ड से लेनदेन के लिए 'प्वाइंट ऑफ़ सेल' मशीनों की ज़रूरत होती है. अनुमानित तीन करोड़ व्यापारिक प्रतिष्ठानों में से सिर्फ़ तेरह लाख के पास 'प्वाइंट ऑफ़ सेल' मशीनें हैं. कहाँ तेरह लाख, कहाँ तीन करोड़! इन सब तक मशीनें पहुँचाने का काम किस गति से कुछ महीनों में हो सकता है? बरसों का काम है यह भी.

और जिन दुकानदारों ने हाल में यह मशीनें ले भी ली हैं, वह भी एक सीमा के आगे उसका इस्तेमाल नहीं करते. क्यों? इसलिए कि कार्ड से वह उतनी ही बिक्री दिखाते हैं, जो वह पिछले सालों में नक़द बिक्री के तौर पर दिखाते रहे हैं. उन्हें डर है कि कार्ड से अगर ज़्यादा बिक्री कर ली, तो पिछले कई सालों के उनके खातों को उसी आधार पर आँका जायेगा और उन्हें भारी टैक्स चुकाना पड़ेगा.

कार्ड का इस्तेमाल : डर पिछले हिसाब का

व्यापारी सरकार पर कैसे भरोसा करें कि उनका पिछला हिसाब नहीं खोला जायेगा? प्रधानमंत्री अपने एक भाषण में ख़ुद कह चुके हैं कि ज़रूरत पड़ी तो आज़ादी के बाद से अब तक का हिसाब खँगाला जायेगा. हालाँकि सरकार ने आख़िर अब जा कर यह बात महसूस की और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 16 दिसम्बर को बीजेपी सांसदों से बात करते हुए एलान किया कि किसी व्यापारी का कोई पुराना हिसाब नहीं देखा जायगा. ज़ाहिर है कि अगर डिजिटल लेनदेन की बात शुरू में सोची गयी थी, तो यह बात भी तभी सोच ली गयी होती!

इन्दिरा ने क्यों नहीं की नोटबंदी?

प्रधानमंत्री ने इसी बैठक में यह बात भी कही कि 1971 में इन्दिरा गाँधी के सामने भी नोटबंदी का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन चुनावी राजनीति के चलते उन्होंने उसे नकार दिया और अगर इन्दिरा ने तब वह क़दम उठा लिया होता, तो देश की आज यह हालत नहीं होती! अजीब तर्क है. क्योंकि उसके सात साल बाद 1978 में जनता पार्टी की सरकार ने तो यह क़दम उठाया ही था. तो उससे देश की हालत क्यों नहीं बदली? इन्दिरा नोटबंदी करतीं तो हालत बदल जाती, मोरारजी ने की तो नहीं बदली! बात कुछ समझ में नहीं आयी. 1946 में भी नोटबंदी हुई, तब भी हालत नहीं बदली!

70 साल पहले क्या लिखा था 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने?

बल्कि सत्तर साल पहले, 25 जनवरी 1946 को 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के सम्पादकीय को देख लीजिए. तब लिखा गया था कि 'इस (यानी नोटबंदी) क़दम की आलोचना का मुख्य आधार यह है कि अधिकतर काला धन तो पहले ही सोने, शेयरों, बाँडों, हीरे-जवाहरात और ज़मीन-जायदाद में खपाया जा चुका है, तो बड़े काले धन वालों ने तो बचाव के रास्ते पहले ही ढूँढ लिये हैं.' क्या यही बात आज सच नहीं है? अगर लोग 1946 में करेन्सी में काला धन नहीं रख रहे थे, तो वह आज क्यों रखेंगे? इतने बेवक़ूफ़ हैं क्या? फिर सारे सरकारी आँकड़े बताते हैं कि अब तक जितना भी काला धन पकड़ा गया है, उसमें करेन्सी का हिस्सा बेहद मामूली रहा है. तो करेन्सी बन्द करने से बहुत काला धन कैसे निकलेगा?

लब्बोलुबाब यह है कि काला धन और टैक्स चोरी ख़त्म होना बहुत ज़रूरी है, ख़ासकर हर वह आदमी ऐसा चाहता है जो सरकार को हर साल लाखों रुपये टैक्स देता हो. इसी तरह डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देना भी ज़रूरी है. लेकिन यह दोनों काम केवल नोटबंदी जैसे 'धमाके' करने से नहीं हो सकते. नोटबंदी से बस अर्थव्यवस्था को थपेड़े लगते हैं, जो हम सब देख रहे हैं.

विश्वास का संकट

नोटबदल और हर दिन नियम बदलने से विश्वास का संकट ज़रूर खड़ा हो गया है. बैंक भी अब शिकायत कर रहे हैं कि नोटबंदी की 'विफलता' के लिए उन्हें 'खलनायक' बताया जा रहा है. और तो और लोगों को भरोसा नहीं कि दो हज़ार का नया नोट कितने दिन चलेगा? तरह-तरह की अफ़वाहें हैं. उधर पुराने-नये नोटों की पकड़-धकड़, छापों-धावों से नये 'इंस्पेक्टर राज' का माहौल बनने लगा है, हालाँकि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ताज़ा भाषण में साफ़ किया कि वह ऐसा क़तई नहीं चाहते.

ग़रीब मज़दूरों से लेकर छोटे-मँझोले उद्योग धन्धों में लगे लोग बेहाल हैं. और ऊपर से तुर्रा यह कि अमीरों के ख़िलाफ़ ग़रीबों को उकसाने की कोशिशें ख़ुद प्रधानमंत्री ने की. इन सबके बीच एटीएम और बैंकों की लाइनों में लगे लोग इस सवाल का जवाब ढूँढ रहे हैं कि आख़िर नोटबंदी का यह तमाशा किस काम का था?
© 2016 http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

email: qwnaqvi@raagdesh.com


नोटबंदी के एक महीने पहले इस स्तम्भकार ने लिखा था कि नोटबंदी एक बचकाना सुझाव है:

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  • Nitin Dangwal

    I liked the writeup. But I do think that demonetization deserves more praise even in spite of the execution-wise challenges that we have seen. It is not just about the cash-less economy. The system needed a wipe out. A shaking of its roots. And that’s what we have got. More people should come under tax bracket. That’s the whole idea.

    • qwn

      Thank you Nitin for reading it. The basic issue with demonetisation is that it is a conceptually wrong idea to do it to flush out black money. Because only a minuscule part of black money resides in the form of currency notes. So even if it would have been implemented perfectly, it couldn’t have achieved desired result for two reasons. One, as I said that only transitory black money (which is waiting to be invested in real estate, stock market, gold etc.) resides in currency notes and secondly, corruption in our system (or in anywhere in the world) helps in a big way to launder such black money. We have seen it happening in 1946 and again in 1978. Why one should repeat same mistake again and again?
      One must understand that only foolish or naive people keep large amount of black money in currency notes. Keeping money in notes for a longer duration is foolish idea because a currency note can not appreciate with the passage of time because of inflation, it always depreciates while all other assets appreciate and grow in value.

  • Shakendra Singh

    जब मार्केट में पैसा ही नहीं होगा, तो लोग रिश्वत कैसे लेंगे/देंगे?
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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