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Jan 02
ऐसी दिखती है 2016 की तसवीर!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 6 

2016 में क्या-क्या बदल सकता है और क्या नहीं? ख़बरें हैं कि 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कम विदेश यात्राएँ करेंगे और चुनावी रैलियाँ भी काफ़ी कम करेंगे! इस साल सारा ज़ोर काम करने पर रहेगा! इस साल राम मन्दिर की चर्चा कितनी गरम होगी? दूसरे और कौन-से मुद्दे उठ सकते हैं? एक विश्लेषण.


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तो साल बदल गया. जैसा हर साल होता है, हर साल कुछ बदलता है, लेकिन बहुत-कुछ नहीं भी बदलता. जो कभी नहीं बदलता, उस पर बात भी कभी नहीं होती. आख़िर यथावत पर क्या बात की जाये? वह तो जैसा है, वैसा ही रहेगा. ग़रीब हैं तो हैं, ग़रीबी है तो है, करोड़ों लोग बेघर हैं तो हैं, वह तो वैसे ही रहेंगे और विकास का सिनेमा देखते रहेंगे, रैलियों में भीड़ बनते रहेंगे, भाषणों पर तालियाँ बजाते रहेंगे, वोट देते रहेंगे, ज़िन्दगी बदलने की आस में सरकारें बदलते रहेंगे और यथावत जीते रहेंगे, यथावत मरते रहेंगे.

यथावत प्राणी और बुलेट ट्रेन

इन यथावत प्राणियों के लिए सिर्फ़ कैलेंडर बदलता है! वैसे कैलेंडर की भी इनके जीवन में कहाँ जगह है? जिनके पास टाँगने को दीवार भी न हो, वह कैलेंडर का भी क्या करें? पिछले सड़सठ बरसों में इन यथावत की प्राणियों की कुल उपलब्धि क्या हैं? आधार कार्ड, बीपीएल कार्ड, मनरेगा, जन-धन योजना! बुलेट ट्रेन वे टीवी में देखेंगे, और देश की प्रगति पर गर्वित होंगे!

2016 and India - What Lies Ahead

2016 में क्या बदलेगा, क्या नहीं?

तो 2016 आ गया. देश में इस साल क्या-क्या बदल सकता है? और क्या-क्या नहीं बदल सकता? बड़े आराम से कहा जा सकता है कि क्या नहीं बदलेगा—यथावत प्राणियों का हाल, काँग्रेस की अड़बंगी चाल, केजरीवाल और दिल्ली सरकार की लड़ाई, विकास और गुड गवर्नेन्स की शहनाई, मीडिया वालों की सेल्फ़ी दौड़ और भ्रष्टाचार के नये तरीक़ों की खोज और संघ परिवार का एजेंडा!

क्या कम होंगी मोदी की विदेश यात्राएँ?

2016 and India - Modi's Foreign Visits and Election Rallies | और बदलेगा क्या? सुना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ कटौती का एजेंडा बनाया है. ख़बरें हैं कि इस साल वह कम विदेश यात्राएँ करेंगे. पिछले साल उन्होंने 26 देशों की यात्राएँ की थीं. उनके नामधारी सूट के बाद उनकी इतनी ज़्यादा विदेश यात्राएँ राजनीतिक दलों के बीच, मीडिया में और सोशल मीडिया में लगातार चर्चा का विषय रहीं. लेकिन इस बार सुना जा रहा है कि उन्होंने हिदायत दे दी है कि उनकी केवल उतनी ही विदेश यात्राओं का कार्यक्रम बनाया जाये, जो वाक़ई ज़रूरी हों. कहा जा रहा है कि नमो ने इतनी विदेश यात्राएँ दो कारणों से की. एक इस बात को झुठलाने के लिए कि मुख्यमंत्री होने के कारण उन्हें कूटनीतिक कौशल नहीं होगा और दूसरा उन्हें वीसा न दिये जाने के लिए चलाये गये अभियान को ठेंगा दिखाने के लिए. ये दोनों मक़सद वह 2015 में पूरे कर चुके हैं, इसलिए अब तूफ़ानी विदेश दौरों की ज़रूरत नहीं. और सिर्फ़ विदेश यात्राएँ ही नहीं, बल्कि सुनते हैं कि इस बार पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में मोदी जी उतनी ताबड़तोड़ चुनावी रैलियाँ भी नहीं करेंगे, जितनी उन्होंने बिहार में की थीं. चलिए, बिहार की हार से कुछ तो सबक़ सीखा गया!

इस साल काम पर ज़ोर!

2016 and India - Much More Focus on Work and Delivery | यानी 2016 में मोदी जी विदेश दौरों और चुनावी रैलियों को कम कर अपने दफ़्तर को काफ़ी ज़्यादा समय दे पायेंगे. देना भी चाहिए. 2016 के ख़त्म होते-होते मोदी सरकार के 31 महीने पूरे हो चुके होंगे. तब तक उन्हें कम से कम कुछ काम करके तो दिखाना ही होगा, जिसके बड़े-बड़े वादे करके वह सत्ता में आये थे. बीते साल के आख़िरी दिन उन्होंने अपने अफ़सरों को बुला कर कहा कि कृषि, किसान कल्याण, शिक्षा और स्वास्थ्य, रोज़गार, समावेशी विकास, गंगा, स्वच्छ भारत और गुड गवर्नेन्स जैसे आठ प्राथमिकता क्षेत्रों के लिए वह दो हफ़्ते में अपनी कार्ययोजना पेश करें और उसके बाद 2016 में इन पर तेज़ी से अमल किया जाये क्योंकि जनता तो 'काम ही देखती है.'

पाँच राज्यों के चुनाव: क्या तवा गरम होगा?

2016 and India - Elections in Five States | जनता तो काम देखती है, लेकिन मोदी सरकार बनने के बाद से देश में काम पर कब बात हुई. पिछले डेढ़ साल में सारी चर्चा तो संघ के एजेंडे पर ही होती रही. 'लव जिहाद', 'घर-वापसी', 'रामज़ादे-हरामज़ादे', गोमांस, असहिष्णुता, लेखकों की हत्याएँ, पुरस्कार-वापसी और विवादास्पद बयान 2015 में रोज़-रोज़ ख़बरों में छाये रहे. तो इस साल संघ क्या करेगा? चुप बैठेगा? लगता तो नहीं है. राम मन्दिर निर्माण का मुद्दा तो पहले ही उछल चुका है. 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं. तवा अगर अभी से गरम नहीं किया जायेगा, तो दो साल बाद चुनाव में रोटियाँ कैसे सिकेंगी? इसलिए अचानक से विहिप और यदा-कदा बीजेपी के कुछ नेताओं ने जल्दी से जल्दी मन्दिर बनाये जाने की चर्चाएँ शुरू कर दी हैं. फिर अभी पाँच राज्यों के चुनावों में कम से कम असम, पश्चिम बंगाल और केरल में तो हिन्दू-मुसलिम साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ लेने कोशिश की ही जा सकती है, क्योंकि यहाँ मुसलिम मतदाताओं की संख्या काफ़ी है. पश्चिम बंगाल और केरल में दो कट्टर हिन्दुत्ववादी नेताओं को प्रदेश संगठन की कमान देकर बीजेपी साफ़ संकेत दे चुकी है कि उसके इरादे क्या हैं!

2016 and India - What New Issues may Crop Up

नोटों पर छपे किस-किसकी फ़ोटो?

और ख़बरों को देख कर लग रहा है कि कुछ नये मुद्दे भी 2016 में गरमायेंगे. हो सकता है कि अगले कुछ दिनों में देश में इस पर बहस हो रही हो कि करेंसी नोटों पर किस-किसकी फ़ोटो छपे.गाँधी के हत्यारे गोडसे को नायक माननेवाली हिन्दू महासभा ने पिछले साल जनवरी में प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर कहा था कि नोटों पर शिवा जी, महाराणा प्रताप, भीमराव आम्बेडकर की फ़ोटो छापी जानी चाहिए. तब बात आयी-गयी हो गयी थी. लेकिन अभी कुछ दिन पहले यह मामला फिर से उठा है. सोनिया गाँधी की अध्यक्षतावाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति के सदस्य रहे अर्थशास्त्री नरेन्द्र जाधव ने प्रधानमंत्री को प्रस्ताव भेजा है कि नोटों पर आम्बेडकर और स्वामी विवेकानन्द की तसवीरें भी छापी जानी चाहिए. कहा जा रहा है कि दुनिया के तमाम देशों में करेंसी नोटों पर कई अलग-अलग व्यक्तियों की तसवीरें छपती हैं, तो यहाँ क्यों नहीं?

जम्मू-कश्मीर के झंडे का विवाद

और दूसरा एक बड़ा विवादास्पद मुद्दा इस साल जम्मू-कश्मीर से उठ सकता है. वह यह कि वहाँ के राज्यपाल को सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री को वज़ीर-ए-आज़म कहा जाये, जैसा कि 1965 के पहले होता था. जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के एक जज ने पिछले दिनों यह टिप्पणी यह फ़ैसला सुनाते हुए की कि हर सरकारी इमारतों और वाहनों पर जम्मू-कश्मीर का झंडा लगाया जाये और ऐसा न किया जाना जम्मू-कश्मीर के संविधान के विरुद्ध है. वैसे यह कालम छपने के लिए भेज दिये जाने के बाद ख़बर आयी कि जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट की एक बड़ी बेंच ने 1 जनवरी को इस पर रोक लगा दी. लेकिन यह मामला वहाँ गरमा रहा है या गरमाया जा रहा है! शायद लोगों को याद हो कि मार्च 2015 में मुफ़्ती सरकार ने जम्मू-कश्मीर का ध्वज फहराये जाने के बारे में एक सर्कुलर जारी किया था, जिसे बाद में बीजेपी के दबाव में वापस ले लिया था. तभी यह मामला हाइकोर्ट पहुँचा था. कहा नहीं जा सकता कि आगे चल कर यह क्या मोड़ लेगा और मोदी सरकार इससे कैसे निबटेगी? इससे पहले वहाँ गोमांस निषेध को लेकर भी हाइकोर्ट के आदेश पर अच्छा-ख़ासा विवाद हो गया था, जब हाइकोर्ट की जम्मू और श्रीनगर बेंचों ने इस मुद्दे पर अलग-अलग रुख़ अख़्तियार किया था, बाद में हाइकोर्ट की एक बड़ी बेंच ने इस मामले पर विराम लगाया था. दोनों मामले एक ख़तरनाक संकेत हैं. पिछले चुनाव के समय जम्मू और घाटी के बीच जो स्पष्ट विभाजन दिखा था, वह पीडीपी-बीजेपी सरकार बनने के बाद से लगातार बढ़ता जा रहा है और हर स्तर पर बढ़ता दिख रहा है. जम्मू-कश्मीर में इतने बरसों की अथक मेहनत के बाद जो कुछ अर्जित किया गया था, क्या हम उसे गँवाने की तरफ़ तो नहीं बढ़ रहे हैं?

आइएसआइएस, अल क़ायदा और आइएसआइ!

और इन सबके बीच आइएसआइएस और अल क़ायदा की तरफ़ से भी ख़तरे की तलवार लटक रही है. मोदी जी भले लाहौर जा कर नवाज़ शरीफ़ से गले मिल आये हों, लेकिन वहाँ की आइएसआइ के इरादे क्या हैं, कोई नहीं जानता! पंजाब में ख़ालिस्तान आन्दोलन को भड़काने की कोशिशें हाल-फ़िलहाल फिर सामने आयी हैं. कुल मिला कर जितनी बातें अभी हवा में तैरती दिख रही हैं, वह सब ज़हर फैलानेवाली हैं, ख़ुशबू बिखेरनेवाली नहीं. चिन्ता की बात है. लेकिन फ़िलहाल, आज जनवरी की दूसरी तारीख़ को 2016 की तसवीर तो ऐसी ही दिखती है.
http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi
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  • kushal

    नमस्कार नकवी साहब , आपको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं .नववर्ष के शुभ अवसर पर आपका नया लेख “ऐसी दिखती है 2016 की तस्वीर” पढ़ा . क्योंकि में आपके ब्लॉग का पाठक हूँ तो बिन्दुबार मेरी प्रतक्रिया भेज रहा हूँ

    (1) -आपने गरीबी का ज़िक्र किया है . हमारे देश की बड़ी आबादी अभी भी ग़रीबी रेखा के नीचे गुजर बसर करती है और इस विषय पर देश की राज्य और केंद्र सरकार को और ज़्यादा कार्य करने की ज़रुरत है क्योंकि हमारे देश में किसी की सालाना कमाई अगर 100000 (दस लाख ) रूपए है तो उसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के रूप में लगभग अपनी कमाई का 60 (सांठ) प्रतिशत देना पड़ता है जो की काफी अधिक है .देश की आज़ादी के सांठ दशक बीतने की बाद भी हिन्दुस्तान अभी भी सिर्फ विकासशील देश है जबकि और देश हमसे भी कम समय विकसित हो चुके हैं जहां तक इस पिछड़ेपन और ग़रीबी की बात है तो इसकी पीछे वो राजनैतिक दल है जो सबसे ज़्यादा हिन्दुस्तान की सत्ता पर काबिज़ रहा यानी कि कांग्रेस . कांग्रेस ही वो पार्टी है जिसने विभिन्न सम्प्रदायों के बीच में भेदभाव पैदा किया अलग अलग धर्मं के लिए अलग अलग क़ानून अपने राजनैतिक स्वार्थवश बनाये गए और किसी धर्म को ज़्यादा फायदा दिया गया किसी को कम इस कुंठा की वजह से हिन्दुस्तान के लोग धर्म के आधार एक दूसरे पर टकराते रहते हैं इन सबके पीछे कांग्रेस का ही दिमाग है और लोग कट्टरता की और बढ़ते जले गए किन्तु कांग्रेस अपने आप को सेक्युअलर दिखाती रही ,और जब लोग कट्टरता की और बढ़ जाते हैं तो विकास पीछे छूट जाता है रही सही कसर आरक्षण ने पूरी कर दी इसके तहत योग्यता को पीछे रख कर आरक्षण का लाभ देते हुए देश की कमान ऐसी अफसरों और राजनेताओं को सौप दी जो इसके योग्य नहीं थे फिर हम देश के विकसित होने और ग़रीबी खत्म का सिर्फ सपना ही देख सकते हैं

    (2) दूसरे मोदी के विदेशों के दौरे की बारे में आपने लिखा है तो आपको पता ही चल गया होगा कि नरेंद्र मोदी ही ऐसे प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने सबसे अधिक दौरे किये हैं किन्तु दौरों में जो खर्चा हुआ है वो काफी किफायती है यहाँ तक जो दरों के लिए बजट आवंटित होता है उसमें से भी काफी पैसा बचा है और तो और प्रधानमन्त्री बनने के बाद अभी तक एक दिन भी छुट्टी नहीं ली मोदी जी ऐसे प्रधानमंत्री हैं कि वो अपने आप को प्रधानमन्त्री नहीं भारत माता का सेवक समझते है और इसी वजह से दिन रात मेहनत करते हैं अपने लिखा है इस साल काम पर ज़ोर रहेगा तो मैं आपको बताना चाहते हूँ मोदीजी ने प्रधान मंत्री बनते ही काम पर ज़ोर दे दिया था उसीका नतीजा है कि विदेशों में हिन्दुस्तान की साख में इज़ाफ़ा हुआ है

    (3) आपने ISIS और अलकायदा का ज़िक्र भी किया है तो मैं आपको बताना चाहता हूँ कि हिन्दुस्तान का सुरक्षा चक्र बहुत अधिक मज़बूत है हिन्दुस्तान की सेना सबसे बड़ी सेनाओं में गिनी जाती है ये इराक़ या सीरिया नहीं है ये हिन्दुस्तान है यहाँ ऐसा कुछ नहीं होने वाला जैसा कि इराक़ और सीरिया में हुआ है

    हाँ सबसे ज़्यादा हिन्दुतान और हिन्दुस्तानियों को अपने घर में बैठे आस्तीनों के सांपों का है जो हिन्दुस्तान में रह रहे हैं और हिन्दुस्तान में रह कर इसको इस्लामिक देश बनाना चाहते हैं इसके लिए वो ISIS और अलकायदा से भी हाथ मिला चुके हैं तथा कांग्रेस और कुछ कथित सेक्युलर दल ऐसे लोगों का सहयोग कर रहे हैं

    जय हिन्द

    • qwn

      प्रिय कुशल जी,

      आपकी नववर्ष की शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद. आपको भी नववर्ष बहुत-बहुत मंगलमय हो.

  • Happy new year to you and all your loved ones! 🙂

    • qwn

      Thank you Indrani. Wishing you a Very Happy New Year.

  • happy new year sir… 🙂

    • qwn

      Thank you Archana. Wishing you a Very Happy New Year.

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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